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विष्णु भगवान की आरती - भगवान श्री हरि विष्णु चतुर्भुज रूप क्षीरसागर में शेषनाग शय्या पर

विष्णु भगवान की आरती: ॐ जय जगदीश हरे का संपूर्ण अर्थ व दर्शन

सनातन परंपरा में विष्णु भगवान की आरती केवल स्तुति गान नहीं, बल्कि क्षीरसागर में योगनिद्रा में लीन सृष्टि के परम आधार और पालनकर्ता श्री हरि के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण की यात्रा है। जगत् के नियामक और चराचर के रक्षक श्रीमन नारायण की यह स्तुति साधक के अंतर्मन में ज्ञान, वैराग्य और अनन्य भक्ति का दीप प्रज्वलित करती है। जब भक्त निष्काम भाव से इस महा-आरती का गायन करता है, तब उसके कायिक, वाचिक और मानसिक तीनों प्रकार के ताप शांत होकर परम शांति में विलीन हो जाते हैं।

संसार चक्र के विविध कष्टों, त्रिगुणमयी माया के आवरणों और जन्म-मरण के भय से मुक्ति पाने के लिए आदि-अनादि परमेश्वर की यह स्तुति कलिकाल में अमृत तुल्य मानी गई है। शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए चतुर्भुज नारायण की यह आरती हृदय के अंधकार को मिटाकर जीवन में परम आनंद व धर्म की प्रतिष्ठा करती है।

Table of Contents

श्री हरि विष्णु आरती : सार संक्षेप व तथ्य

  • रचना संवत / वर्ष: संवत् 1927 (ईस्वी सन् 1870)
  • रचनाकार / संत: परम भक्त व साहित्यकार पं. श्रद्धाराम शर्मा (फिल्लौरी)
  • रचना स्थल: फिल्लौर (लुधियाना के समीप), पंजाब
  • विग्रह स्वरूप: चतुर्भुज नारायण (शंख, चक्र, गदा, पद्म धारक, पीताम्बरधारी)
  • दार्शनिक तत्व: क्षीरसागर शयन (शांत चित्त), शेषनाग शय्या (काम व काल पर विजय), लक्ष्मी सेवा (धर्मानुगामी ऐश्वर्य)
  • मुख्य फल: सुख-संपत्ति की प्राप्ति, क्लेश-विनाश, मन का विश्राम और मोक्ष प्राप्ति

विष्णु भगवान की आरती : प्रामाणिक पाठ, कठिन शब्दार्थ व दार्शनिक भावार्थ

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

कठिन शब्दार्थ: जगदीश = जगत् के स्वामी/ईश्वर; संकट = कायिक, वाचिक, मानसिक कष्ट; क्षण में = पलक झपकतें ही।

भावार्थ: हे संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी श्री जगदीश्वर! आपकी जय हो। जो भी अनन्य भाव से आपकी शरण में आता है, आप उसके जन्म-जन्मांतर के संचित पापों और भौतिक कष्टों को पल भर में दूर कर देते हैं। हे नाथ! मेरी भी रक्षा कीजिए।

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

कठिन शब्दार्थ: ध्यावे = ध्यान/स्मरण करना; बिनसे = विनष्ट/नष्ट होना; तन = शरीर।

भावार्थ: हे प्रभु! जो निष्काम और एकाग्र चित्त से आपका स्मरण करता है, उसके मन के सारे संशय, विषाद और शोक विलीन हो जाते हैं। उसके अंतःकरण और घर में सात्विक सुख-शांति व धर्मयुक्त समृद्धि का आगमन होता है तथा समस्त शारीरिक व मानसिक रोग दूर हो जाते हैं।

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

कठिन शब्दार्थ: शरण गहूं = शरण ग्रहण करना/आश्रय लेना; आस = आशा, भरोसा।

भावार्थ: हे नारायण! आप ही मेरे सच्चे माता-पिता और सृष्टिकर्ता हैं। नश्वर संसार के संबंधों में मैं किसके द्वार जाऊं? आपके अतिरिक्त तीनों लोकों में ऐसा कोई समर्थ सहारा नहीं है जिससे मैं अपने कल्याण की याचना कर सकूं।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

कठिन शब्दार्थ: पूरण परमात्मा = सर्वव्यापी परिपूर्ण ईश्वर; अंतरयामी = सबके हृदय के भावों को जानने वाले।

भावार्थ: हे अच्युत! आप सर्वत्र व्याप्त पूर्ण ब्रह्म हैं, जो प्रत्येक जीव के हृदय में साक्षी रूप से विद्यमान होकर अंतर्मन की गति जानते हैं। प्रकृति और काल से परे आप ही अनादि, अनंत पारब्रह्म और सबके एकमात्र परमेश्वर हैं।

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

कठिन शब्दार्थ: करुणा के सागर = अपार दया के स्वामी; खल = कुटिल/दोषयुक्त; कामी = वासनाग्रस्त; भर्ता = पालन-पोषण करने वाले प्रभु।

भावार्थ: हे कृपानिधान! आप अगाध दया के समुद्र हैं और संपूर्ण सृष्टि का पोषण करने वाले हैं। मैं अज्ञान से भरा, विकारों और कामनाओं में उलझा हुआ एक तुच्छ सेवक हूं। हे मेरे स्वामी! मेरे दुर्गुणों पर ध्यान न देकर केवल अपनी अहैतुकी कृपा मुझ पर बरसाइए।

तुम हो एक अगोचर, सब के प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुम को मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

कठिन शब्दार्थ: अगोचर = इंद्रियों की पहुंच से परे; प्राणपति = जीवन के आधार/प्राणवायु के स्वामी; कुमति = मंदबुद्धि या दूषित मति वाला।

भावार्थ: हे प्रभु! आप इन चर्मचक्षुओं और सीमित इंद्रियों से नहीं देखे जा सकते, आप तो समस्त प्राणियों के प्राणों के स्वामी हैं। मेरी बुद्धि संकीर्ण और अज्ञानी है, मैं किस विधि और साधना से आपका साक्षात्कार करूँ? केवल आपकी दया ही मुझे आप तक पहुंचा सकती है।

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

कठिन शब्दार्थ: दीनबंधु = असहायों के मित्र; दुखहर्ता = दुःखों का हरण करने वाले; ठाकुर = स्वामी/रक्षक।

भावार्थ: हे दीनों के सच्चे सखा और दुखों का नाश करने वाले मेरे ईश्वर! मैं आपके पावन चरणों के द्वार पर असहाय होकर पड़ा हूं। अपना अभयहस्त मेरे शीश पर रखकर मुझे इस भवसागर से उबार लीजिए।

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

कठिन शब्दार्थ: विषय विकार = काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि मानसिक दोष; पाप हरो = पूर्वकृत दुष्कर्मों को क्षमा करो।

भावार्थ: हे देवाधिदेव! मेरे मन से काम, क्रोध, लोभ और वासना रूपी समस्त विकारों को नष्ट कर दीजिए। मेरे अंतर्मन में संतों की निष्काम सेवा और आपके चरणों के प्रति अनन्य, निश्चल श्रद्धा-भक्ति का संचार कीजिए।

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

कठिन शब्दार्थ: अर्पण = समर्पित करना; क्या लागे मेरा = मेरा इसमें कोई व्यक्तिगत स्वामित्व नहीं है।

भावार्थ: यह शरीर, मन, बुद्धि, प्राण और समस्त भौतिक संपदा वास्तव में आपकी ही दी हुई धरोहर है। मैं आपकी ही वस्तु आपको कृतज्ञतापूर्वक समर्पित करता हूं, इसमें मेरा अहंकार और स्वामित्व कुछ भी नहीं है।

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श्री विष्णु आरती का प्राकट्य इतिहास और दार्शनिक रहस्य

आज भारत के लगभग हर सनातनी घर और मंदिर में गाई जाने वाली महा-आरती “ॐ जय जगदीश हरे” की रचना 19वीं सदी के महान संत, दार्शनिक व सनातन धर्म-प्रचारक पं. श्रद्धाराम शर्मा (फिल्लौरी) द्वारा सन् 1870 के आसपास की गई थी। उस दौर में जब समाज में सांस्कृतिक व भाषाई संक्रमण का काल चल रहा था, तब पं. श्रद्धाराम जी ने जन-जन के हृदय में ईश्वर के प्रति समर्पण जगाने के लिए अत्यंत सहज, लयबद्ध और दार्शनिक रूप से परिपक्व ब्रज-मिश्रित खड़ी बोली में इस आरती की रचना की।

दार्शनिक दृष्टि से यह आरती जीव और ब्रह्म के संबंध को व्याख्यायित करती है। आरती का अंतिम पद—“तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा”—श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्मयोग और ईशावास्योपनिषद् के प्रथम मंत्र (ईशा वास्यमिदं सर्वम्) का प्रत्यक्ष निचोड़ है। भगवान विष्णु का क्षीरसागर में शयन चित्त की परम स्थिरता का प्रतीक है, शेषनाग की शय्या काल व वासनाओं पर नियंत्रण दर्शाती है, और माता लक्ष्मी द्वारा चरण-सेवा यह संदेश देती है कि जहां सत्य, धर्म और अनासक्ति होती है, वहां समस्त रिद्धि-सिद्धि स्वतः नतमस्तक रहती हैं। इस पावन परंपरा के विस्तृत संदर्भ श्रीमद्भागवत महापुराण एवं श्रीमद्भागवतम ग्रंथ परंपरा (Vedabase) में प्रमाण सहित प्राप्त होते हैं।

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विष्णु भगवान की आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQ)

1. भगवान विष्णु की आरती करने का सबसे उत्तम समय कौन सा माना जाता है?

भगवान विष्णु की आरती के लिए प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त व सूर्योदय की वेला तथा सायंकाल गोधूलि वेला सर्वोत्तम मानी गई है। विशेष रूप से गुरुवार, एकादशी तिथि और पूर्णिमा के दिन की गई आरती विशेष फलदायी होती है।

2. ‘ॐ जय जगदीश हरे’ आरती की रचना किसने और कब की थी?

इस अमर आरती की रचना 19वीं सदी के प्रख्यात विद्वान एवं सनातन प्रचारक पंडित श्रद्धाराम शर्मा (फिल्लौरी) ने संवत् 1927 (सन् 1870 ईस्वी) में पंजाब के फिल्लौर में की थी।

3. आरती करते समय थाल को किस दिशा और क्रम में घुमाना चाहिए?

आरती की थाल को सदैव दक्षिणावर्त (Clockwise यानी घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, भगवान के चरणों में चार बार, नाभि कमल पर दो बार, मुखारविंद पर एक बार और अंत में संपूर्ण विग्रह पर सात बार आरती घुमाने का नियम है।

4. विष्णु आरती में किस दीपक और बत्ती का उपयोग श्रेष्ठ माना गया है?

भगवान विष्णु की पूजा में शुद्ध देसी गाय के घी का दीपक या तिल के तेल का दीपक श्रेष्ठ है। इसमें रुई की बत्ती या मौली (कलावा) की बत्ती का प्रयोग करना चाहिए। संभव हो तो पंचमुखी या कपूर आरती भी की जा सकती है।

5. क्या भगवान विष्णु की आरती बिना तुलसी दल के पूर्ण मानी जाती है?

नहीं, भगवान विष्णु की कोई भी पूजा या भोग तुलसी दल के बिना अपूर्ण माना जाता है। आरती के उपरांत जो पंचामृत या नैवेद्य अर्पित किया जाता है, उसमें तुलसी पत्र अवश्य होना चाहिए।

6. आरती के अंतिम पद “तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा” का दार्शनिक मर्म क्या है?

यह पंक्ति उपनिषदों के ‘आत्मनिवेदन’ और पूर्ण शरणागति का द्योतक है। इसका अर्थ है कि यह देह, प्राण, संपत्ति और सामर्थ्य सब प्रभु की ही अमानत है। जब साधक ‘मैं’ और ‘मेरा’ का अहंकार त्यागकर सब कुछ ईश्वर को अर्पित करता है, तभी उसे वास्तविक मोक्ष की अनुभूति होती है।

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डिस्क्लेमर: इस आलेख में प्रस्तुत आरती के श्लोक, शब्दार्थ, पौराणिक इतिहास और पूजन विधियां प्रामाणिक धार्मिक ग्रंथों, संत परंपराओं और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। व्यक्तिगत साधना व अनुष्ठान के लिए अपने कुलगुरु या योग्य ज्योतिर्विद का मार्गदर्शन अवश्य लें।

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