सनातन धर्म में धन, ऐश्वर्य, सौभाग्य और सुख-समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी मां महालक्ष्मी की आराधना के लिए “ॐ जय लक्ष्मी माता” (Om Jai Laxmi Mata) सर्वोपरि और सबसे सिद्ध स्तुति मानी जाती है। विशेष रूप से दीपावली, शुक्रवार, वरलक्ष्मी व्रत और शरद पूर्णिमा के अवसर पर हर सनातनी घर व देवालय में यह आरती अत्यंत श्रद्धा से गाई जाती है। इस आरती की रचना 19वीं सदी के प्रख्यात संत व समाज सुधारक पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी जी ने की थी। आज की युवा पीढ़ी इसके पारंपरिक शब्दों के गूढ़ भाव से भली-भांति परिचित हो सके, इसलिए यहाँ आरती का एक-एक कठिन शब्द, शब्दार्थ और माता को संबोधित सरल भावार्थ प्रस्तुत किया गया है।
📌 आरती परिचय व पौराणिक तथ्य (Aarti Fact Sheet)
- आरती का नाम: ॐ जय लक्ष्मी माता (Laxmi Ji Ki Aarti)
- रचयिता: पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (रचना काल: लगभग 1860-1870 ई.)
- प्रधान आराध्या: भगवती महालक्ष्मी (भगवान श्री विष्णु की अर्धांगिनी)
- भाषा शैली: संस्कृतनिष्ठ सरल हिंदी व ब्रज-अवधी भाव
- आरती का श्रेष्ठ समय: प्रातः पूजन, संध्या वेला में गोधूलि मुहूर्त व शुक्रवार की सांझ
- आध्यात्मिक महत्व: इस आरती का भावपूर्वक नित्य गायन करने से घर से दरिद्रता, गृह-क्लेश और आर्थिक संकटों का नाश होता है तथा ‘स्थिर लक्ष्मी’ का वास होता है।
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
(ॐ: परब्रह्म परमात्मा का मूल एकाक्षर नाद | जय: विजय व जयकार | लक्ष्मी: लक्ष्य + मी = जो जीवन के समस्त भौतिक और आध्यात्मिक लक्ष्यों की प्राप्ति कराती हैं | माता: समस्त चराचर जगत की स्नेहमयी जननी)
तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता ॥ ॐ जय लक्ष्मी माता… ॥
(निसदिन: निस = रात, दिन = दिवस; अर्थात् अहर्निश, लगातार बिना रुके | सेवत: सेवा-आराधना व वंदन करना | हर: संहारकर्ता भगवान शिव (हर-हर महादेव) | विष्णु: पालनकर्ता श्री हरि नारायण | विधाता: सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी)
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता ।
(उमा: भगवान शिव की शक्ति मां पार्वती | रमा: श्री हरि विष्णु की शक्ति मां लक्ष्मी | ब्रह्माणी: ब्रह्मा जी की शक्ति मां सरस्वती | जग-माता: तीनों महाशक्तियां वास्तव में एक ही आदिशक्ति के तीन रूप हैं, जो संपूर्ण विश्व का पालन करती हैं)
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥ ॐ जय लक्ष्मी माता… ॥
(ध्यावत: ध्यान लगाना, साधना करना | नारद ऋषि: देवऋषि नारद | गाता: अपनी वीणा पर आपके दिव्य गुणों का नित्य संकीर्तन करना)
दुर्गा रूप निरंजनि, सुख सम्पति दाता ।
(दुर्गा रूप: दुर्गम संकटों को हरने वाला शौर्य व पराक्रम स्वरूप | निरंजनि: निर + अंजन = माया, मलिनता और दोषों से सर्वथा रहित, विशुद्ध दिव्य स्वरूप | सुख सम्पति दाता: सांसारिक शांति, आरोग्य, धन और आध्यात्मिक संपदा प्रदान करने वाली)
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता ॥ ॐ जय लक्ष्मी माता… ॥
(ध्यावत: मन से चिंतन व उपासना करना | ऋद्धि: आत्मिक व भौतिक समृद्धि, बुद्धि का विकास | सिद्धि: किसी भी कार्य में पूर्ण सफलता व कुशलता पाना | धन: मान-सम्मान, उत्तम स्वास्थ्य और आर्थिक वैभव)
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता ।
(पाताल-निवासिनि: पाताल से लेकर आकाश तक समस्त ब्रह्मांड के कण-कण और रत्नाकर समुद्र में वास करने वाली | शुभदाता: जीवन में केवल मंगल, कल्याण और शुभता प्रदान करने वाली)
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भव-निधि की त्राता ॥ ॐ जय लक्ष्मी माता… ॥
(कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी: मनुष्य के सत्कर्मों के शुभ फल को उजागर करने वाली | भव-निधि: भव = संसार, निधि = सागर; अर्थात् यह कठिन संसार रूपी महासागर | त्राता: रक्षा करने वाली या पार उतारने वाली नौका)
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता ।
(रहतीं: स्थिर लक्ष्मी के रूप में वास करना | सद्गुण: सत्-गुण = प्रेम, दया, परोपकार, सत्य, पवित्रता और शांति)
सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता ॥ ॐ जय लक्ष्मी माता… ॥
(सब संभव: असंभव कार्य भी सुगम बन जाते हैं | मन नहीं घबराता: किसी भी संकट या अभाव का भय नहीं रहता, आत्मविश्वास जागृत होता है)
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता ।
(यज्ञ न होते: हवन, दान, परोपकार और धार्मिक अनुष्ठान बिना साधन व धन के संपन्न नहीं हो सकते | वस्त्र न कोई पाता: तन ढकने हेतु वस्त्र और आजीविका की बुनियादी जरूरतें)
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता ॥ ॐ जय लक्ष्मी माता… ॥
(खान-पान का वैभव: अन्नपूर्णा रूप में घर में भरपूर अन्न, भोग, ऐश्वर्य और संपन्नता | सब तुमसे आता: सब कुछ आपकी ही अनुकंपा का फल है)
शुभ-गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता ।
(शुभ-गुण मंदिर: समस्त पवित्र और मंगलकारी गुणों का साक्षात धाम/मंदिर | क्षीरोदधि-जाता: क्षीर + उदधि = दूध का महासागर (क्षीरसागर), जाता = उत्पन्न होने वाली; अर्थात् समुद्र मंथन के समय क्षीरसागर से प्रकट हुई रत्नस्वरूपा)
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता ॥ ॐ जय लक्ष्मी माता… ॥
(रत्न चतुर्दश: समुद्र मंथन से निकले 14 दिव्य रत्न (जैसे अमृत, कल्पवृक्ष, कामधेनु, कौस्तुभ मणि आदि) | तुम बिन कोई नहीं पाता: आप उन 14 रत्नों में सबसे परम और मुख्य रत्न हैं जिनके बिना बाकी रत्नों का कोई मूल्य नहीं)
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता ।
(महालक्ष्मी: अष्टलक्ष्मी स्वरूपिणी परमेश्वरी | नर गाता: कोई भी स्त्री या पुरुष जो पूर्ण श्रद्धा से आरती का गान करता है)
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता ॥ ॐ जय लक्ष्मी माता… ॥
(उर: हृदय / अंतःकरण | आनन्द समाता: हृदय परम शांति और असीम उल्लास से भर जाता है | पाप उतर जाता: पूर्वजन्मों और वर्तमान के सभी संचित पाप व कष्ट क्षीण हो जाते हैं)
पौराणिक संदर्भों के अनुसार, समुद्र मंथन के समय देवी लक्ष्मी के क्षीरसागर से प्राकट्य और भगवान श्री विष्णु के वरण की प्रामाणिक कथा सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथ विष्णु पुराण (Wikipedia) तथा श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में सविस्तार वर्णित है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. ‘ॐ जय लक्ष्मी माता’ आरती के मूल रचयिता कौन हैं?
इस प्रसिद्ध आरती की रचना 19वीं सदी के महान संत, विद्वान और ‘ॐ जय जगदीश हरे’ के रचयिता पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी जी ने की थी। उन्होंने इसे सरल और लोक-प्रचलित हिंदी में पिरोया ताकि जन-जन तक माता की स्तुति पहुंच सके।
2. आरती में देवी को ‘क्षीरोदधि-जाता’ क्यों कहा गया है?
‘क्षीरोदधि’ का अर्थ है क्षीरसागर (दूध का समुद्र) और ‘जाता’ का अर्थ है उत्पन्न होने वाली या पुत्री। पौराणिक कथा के अनुसार जब देवों और असुरों ने समुद्र मंथन किया था, तब देवी लक्ष्मी क्षीरसागर से कमल पुष्प पर आसीन होकर प्रकट हुई थीं, इसलिए उन्हें क्षीरोदधि-जाता कहा जाता है।
3. ‘कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी’ पंक्ति का वास्तविक अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है कि मां लक्ष्मी कर्म के सिद्धांत को प्रकाशित (जागृत) करती हैं। जो व्यक्ति ईमानदारी, परिश्रम और धर्म के मार्ग पर चलकर कर्म करता है, मां लक्ष्मी उसके पुरुषार्थ को फलित कर उसे स्थायी समृद्धि और यश प्रदान करती हैं।
4. मां लक्ष्मी की आरती में दीपक किस तेल या घी का होना चाहिए?
मां लक्ष्मी की आरती के लिए गाय के शुद्ध देसी घी का दीपक सर्वोत्तम माना गया है। यदि घी उपलब्ध न हो, तो तिल के तेल का दीपक भी जलाया जा सकता है। इसमें कलावे (मौली) की लाल बत्ती का प्रयोग अत्यंत शुभ माना जाता है।
5. क्या गणेश जी की आरती के बिना लक्ष्मी जी की आरती अधूरी मानी जाती है?
जी हां, सनातन परंपरा में लक्ष्मी जी के साथ प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश जी की पूजा अनिवार्य है। बुद्धि और विवेक (गणेश जी) के बिना धन (लक्ष्मी जी) का सही उपयोग नहीं हो सकता, इसलिए पहले गणेश जी की आरती की जाती है और उसके उपरांत ही लक्ष्मी जी की आरती करनी चाहिए।
6. घर में ‘स्थिर लक्ष्मी’ का वास बनाए रखने के क्या नियम हैं?
घर में स्वच्छता, स्त्रियों का आदर, संध्या के समय घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाना, कटु वचन न बोलना और नित्य संध्याकाल में इस आरती का भावपूर्ण गायन करने से लक्ष्मी जी स्थायी रूप से वास करती हैं।
✨ मां महालक्ष्मी की कृपा घर-घर पहुंचाएं!
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डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई आरती, शब्दार्थ और धार्मिक व्याख्याएं सनातन धर्मग्रंथों (विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत), वैदिक मान्यताओं और प्रामाणिक भक्ति परंपरा पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य धार्मिक साहित्य के वास्तविक मर्म से पाठकों को अवगत कराना है।
