॥ राजा दशरथ कृत श्री शनि स्तोत्र: सटीक शब्दार्थ एवं भावार्थ सहित ॥
ज्योतिष और धर्मग्रंथों में भगवान शनिदेव के प्रकोप, साढ़ेसाती, ढैय्या और महादशा के दुष्प्रभावों को शांत करने के लिए ‘दशरथ कृत शनि स्तोत्र’ (Dashratha shani stotram) को संसार का सबसे अचूक और शक्तिशाली स्तोत्र माना गया है। जब शनिदेव की वक्र दृष्टि से पृथ्वी पर 12 वर्षों तक भयानक अकाल पड़ने का संकट आया था, तब अयोध्या नरेश चक्रवर्ती राजा दशरथ ने स्वयं शनिदेव का सामना किया और इस पावन स्तुति से उन्हें प्रसन्न किया। यहाँ इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक का कठिन शब्दार्थ और सरल भावार्थ प्रस्तुत है।
इस दिव्य स्तोत्र के रचयिता भगवान श्री राम के पूज्य पिता महाराज दशरथ हैं। इसका पौराणिक उल्लेख पद्म पुराण (उत्तरखंड) में मिलता है। कथा के अनुसार, जब शनिदेव ‘रोहिणी नक्षत्र’ का भेदन (रोहिणी शकट भेदन) करने जा रहे थे, जिससे पृथ्वी पर भीषण अकाल और प्रलय की आशंका थी, तब राजा दशरथ अपने दिव्य रथ पर सवार होकर शनि लोक पहुँचे। राजा के अदम्य साहस और इस भक्तिमय स्तुति से प्रसन्न होकर शनिदेव ने न केवल रोहिणी भेदन रोका, बल्कि वरदान दिया कि जो भी मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसे कभी मेरी पीड़ा नहीं सहनी पड़ेगी।
नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।
शब्दार्थ: कृष्णाय = (श्याम वर्ण / काले रंग वाले) | नीलाय = (नीलमणि के समान नीली कांति वाले) | शितिकण्ठ निभाय च = (भगवान शिव के नीलकंठ के समान स्वरूप वाले)
नमः कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नमः॥
शब्दार्थ: कालाग्निरूपाय = (प्रलयकालीन प्रलयकारी अग्नि के समान तेजस्वी) | कृतान्ताय = (साक्षात यमराज / काल स्वरूप न्यायकर्ता)
भावार्थ (हे शनिदेव): श्याम वर्ण और नीलमणि के समान नील कांति वाले तथा भगवान नीलकंठ (शिव) के समान आभा धारण करने वाले हे शनिदेव! आपको सादर प्रणाम है। प्रलयकाल की अग्नि के सदृश तेजस्वी और यमराज के समान न्याय करने वाले हे कृतांत रूपी प्रभु! आपको बारंबार नमस्कार है।
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
शब्दार्थ: निर्मांस देहाय = (कठोर तपस्या के कारण मांसहीन / अत्यंत कृशकाय शरीर वाले) | दीर्घश्मश्रुजटाय = (लंबी दाढ़ी-मूंछ और विशाल जटाओं को धारण करने वाले)
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते॥
शब्दार्थ: विशालनेत्राय = (गहरी और बड़ी दृष्टि वाले नेत्र) | शुष्कोदर = (सूखे व धंसे हुए पेट वाले) | भयाकृते = (दुष्टों के मन में भय उत्पन्न करने वाला भयानक रूप)
भावार्थ (हे शनिदेव): घोर तप के कारण कृशकाय (मांसहीन) शरीर वाले और लंबी दाढ़ी, मूंछ तथा विशाल जटा धारण करने वाले आपको प्रणाम है। पापियों में भय जगाने वाले स्वरूप, सूखे पेट वाले और विशाल व गंभीर नेत्रों वाले हे शनिदेव! आपको मेरा नमन है।
नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नमः।
शब्दार्थ: पुष्कलगात्राय = (विशाल और लंबे अंग वाले) | स्थूलरोम्णे = (कठोर और घने रोमों / बालों वाले)
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते॥
शब्दार्थ: दीर्घाय = (दीर्घकाय / लंबे कद वाले) | शुष्काय = (शुष्क काया वाले) | कालदंष्ट्र = (काल रूपी भयानक दाढ़ों वाले)
भावार्थ (हे शनिदेव): विशाल अंगों वाले, घने व मोटे रोमों वाले आपको नमस्कार है। लंबी देह धारण करने वाले, सूखे अंगों वाले और समय आने पर काल के समान दाढ़ें दिखाने वाले न्यायप्रिय देव! आपको बारंबार प्रणाम है।
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः।
शब्दार्थ: कोटराक्षाय = (गहरी गुफा के समान अंदर धंसी हुई आंखों वाले) | दुर्निरीक्ष्याय = (जिनकी ओर सीधे देखना या जिनकी दृष्टि सहना असंभव हो)
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥
शब्दार्थ: घोराय रौद्राय = (अत्यंत उग्र और रुद्र स्वरूप वाले) | भीषणाय कपालिने = (भय उत्पन्न करने वाले और कपाल धारण करने वाले)
भावार्थ (हे शनिदेव): कोटर के समान गहरी व धंसी हुई आंखों वाले और असहनीय दृष्टि वाले हे शनिदेव! आपको प्रणाम है। घोर, रौद्र, अत्यंत भीषण और कपाल धारी देव! मैं आपके चरणों में नमन करता हूँ।
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।
शब्दार्थ: सर्वभक्षाय = (समय आने पर सब कुछ भक्षण / नष्ट करने वाले काल रूप) | बलीमुख = (बली की भांति पराक्रमी मुख वाले)
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च॥
शब्दार्थ: सूर्यपुत्र = (भगवान सूर्य के पुत्र) | भास्करेऽभयदाय = (सूर्य के समान ओजस्वी और शरणागत को अभयदान देने वाले)
भावार्थ (हे शनिदेव): सब कुछ ग्रास बना लेने वाले महाकाल स्वरूप और प्रचंड पराक्रमी मुख वाले आपको नमन है। हे भगवान सूर्य के तेजस्वी पुत्र और शरणागत साधकों को भय से मुक्ति देने वाले कृपालु देव! आपको मेरा नमस्कार है।
अधोदृष्टे नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।
शब्दार्थ: अधोदृष्टे = (नीचे की ओर दृष्टि रखने वाले) | संवर्तक = (प्रलय काल की विनाशक अग्नि के समान शक्ति वाले)
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तु ते॥
शब्दार्थ: मन्दगते = (धीमी गति से चलने वाले / शनैः शनैः चलने वाले ‘शनैश्चर’) | निस्त्रिंशाय = (न्याय करते समय अत्यंत कठोर व निर्दयी दिखने वाले)
भावार्थ (हे शनिदेव): अपनी दृष्टि सदा नीचे रखने वाले और प्रलयकालीन संवर्तक रूपी प्रभु! आपको नमन है। धीमी गति से गोचर करने वाले ‘मंदगति’ और न्याय करते समय पूर्णतः निष्पक्ष व कठोर रहने वाले हे शनिदेव! आपको प्रणाम है।
तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च।
शब्दार्थ: तपसा दग्धदेहाय = (कठोर तपस्या से तपाए हुए दिव्य शरीर वाले) | नित्यं योगरताय = (सदा ध्यान और समाधि में लीन रहने वाले)
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः॥
शब्दार्थ: क्षुधार्ताय = (सदा तप और साधना की भूख रखने वाले) | अतृप्ताय = (अतृप्त / वैराग्य भाव में रहने वाले)
भावार्थ (हे शनिदेव): अपनी कठोर तपस्या की अग्नि से अपने शरीर को तपाने वाले और निरंतर समाधि व योग में लीन रहने वाले परम योगी! आपको नमन है। सदा साधना में लीन रहने वाले और वैराग्य से परिपूर्ण हे शनिदेव! आपको बारंबार नमस्कार है।
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे।
शब्दार्थ: ज्ञानचक्षुः = (दिव्य ज्ञान और अंतर्दृष्टि रूपी नेत्रों वाले) | कश्यपात्मज सूनवे = (महर्षि कश्यप के वंशज / सूर्यपुत्र)
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्॥
शब्दार्थ: तुष्टो = (प्रसन्न होने पर) | ददासि वै राज्यं = (राजा बना देना / साम्राज्य देना) | रुष्टो = (क्रोधित होने पर) | हरसि तत्क्षणात् = (उसी क्षण सब कुछ छीन लेना)
भावार्थ (हे शनिदेव): ज्ञान रूपी दिव्य नेत्रों वाले और कश्यप कुल के सूर्यपुत्र शनिदेव! आपको प्रणाम है। आपकी महिमा अद्भुत है; जब आप प्रसन्न होते हैं तो रंक को भी पल भर में राजा बना देते हैं, और जब आप रुष्ट होते हैं तो सम्राट का राज्य भी एक क्षण में छीन लेते हैं।
देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगाः।
शब्दार्थ: देवासुरमनुष्याश्च = (देवता, असुर और मनुष्य) | सिद्धविद्याधरोरगाः = (सिद्ध पुरुष, विद्याधर और नाग/सर्प)
त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः॥
शब्दार्थ: त्वया विलोकिताः = (आपकी क्रोधी व वक्र दृष्टि पड़ते ही) | नाशं यान्ति समूलतः = (जड़ सहित समूल नष्ट हो जाना)
भावार्थ (हे शनिदेव): देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, गंधर्व अथवा पाताल के नाग—कोई भी हो, यदि किसी पर आपकी कुपित व वक्र दृष्टि पड़ जाए, तो वह समूल नष्ट हो जाता है। आपकी न्यायपूर्ण दृष्टि से कोई भी पापी बच नहीं सकता।
प्रसादं कुरु मे देव वरार्होऽहमुपागतः।
शब्दार्थ: प्रसादं कुरु = (मुझ पर कृपा व प्रसन्नता कीजिए) | वरार्होऽहमुपागतः = (वरदान पाने की आशा से आपकी शरण में आया हूँ)
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबलः॥
शब्दार्थ: सौरिर्ग्रहराजो = (सूर्यपुत्र शनिदेव, जो ग्रहों के राजा हैं) | महाबलः = (अत्यंत पराक्रमी व बलशाली)
भावार्थ (हे शनिदेव): राजा दशरथ प्रार्थना करते हैं—हे देव! मुझ पर प्रसन्न होइए, मैं प्रजा के कल्याण हेतु वरदान पाने की अभिलाषा से आपकी शरण में आया हूँ। महाराज दशरथ द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर महाबली सूर्यपुत्र शनिदेव अत्यंत प्रसन्न हुए।
अबोचत्तं वरं ब्रूहि प्रीतोऽहं तव पार्थिव।
शब्दार्थ: अबोचत्तं = (शनिदेव ने प्रसन्न होकर कहा) | पार्थिव = (हे पृथ्वीपति राजा दशरथ!)
न मत्तो भविता पीडा नराणां ये पठन्ति वै॥
शब्दार्थ: न मत्तो भविता पीडा = (मेरी ओर से उन्हें कोई कष्ट या पीड़ा नहीं होगी) | ये पठन्ति = (जो इस स्तोत्र का नित्य पाठ करेंगे)
भावार्थ (शनिदेव का वरदान): शनिदेव ने कहा—हे राजन! मैं तुम्हारी भक्ति और इस स्तुति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहो वर मांगो। जो भी मनुष्य तुम्हारे द्वारा रचित इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा, उसे मेरी साढ़ेसाती, ढैय्या अथवा महादशा में कोई कष्ट नहीं होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्र. 1: राजा दशरथ ने शनि स्तोत्र की रचना किस परिस्थिति में की थी?
उ: जब ज्योतिषियों ने महाराज दशरथ को बताया कि शनिदेव कृत्तिका से रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश (रोहिणी भेदन) करने वाले हैं, जिससे पृथ्वी पर 12 वर्षों तक भयानक अकाल और हाहाकार मच जाएगा, तब राजा दशरथ प्रजा की रक्षा हेतु दिव्य रथ पर सवार होकर शनिदेव के सम्मुख गए और इस स्तुति से उन्हें शांत किया।
प्र. 2: दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करने से क्या लाभ होता है?
उ: स्वयं शनिदेव के वरदान के अनुसार, इस स्तोत्र का नित्य या प्रत्येक शनिवार को पाठ करने वाले साधक को शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या, महादशा, कोर्ट-कचहरी के विवाद, शारीरिक व्याधि और आर्थिक संकटों से तुरंत राहत मिलती है।
प्र. 3: शनि स्तोत्र का पाठ किस दिन और किस समय करना सर्वश्रेष्ठ है?
उ: इस स्तोत्र का पाठ शनिवार के दिन सूर्यास्त के बाद (संध्याकाल) पीपल के वृक्ष के नीचे या घर के पूजा स्थान पर सरसों के तेल का दीपक जलाकर, पश्चिम दिशा की ओर मुख करके करना सबसे फलदायी माना जाता है।
प्र. 4: क्या दशरथ कृत शनि स्तोत्र और शनि चालीसा दोनों का पाठ कर सकते हैं?
उ: हाँ, बिल्कुल! शनिवार के दिन पहले राजा दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करें और उसके बाद श्री शनि चालीसा का पाठ करने से शनिदेव की असीम कृपा और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
प्र. 5: श्लोक में शनिदेव को ‘पिप्पलाद’ या ‘मंदगति’ क्यों कहा गया है?
उ: नवग्रहों में शनि ग्रह की चाल सबसे धीमी है; वे एक राशि को पार करने में लगभग ढाई वर्ष का समय लेते हैं। इसी धीमी गति के कारण शास्त्रों में उन्हें ‘शनैः शनैः चरति इति शनैश्चर’ यानी ‘मंदगति’ कहा जाता है।
प्र. 6: इस स्तोत्र के पाठ के दौरान क्या सावधानियां रखनी चाहिए?
उ: पाठ करते समय मन में पूर्ण सात्विकता रखें, झूठ बोलने या किसी को धोखा देने से बचें, नीले या काले वस्त्र पहन सकते हैं, और शनिवार के दिन मांसाहार व मदिरा का पूरी तरह त्याग रखें।
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निष्कर्ष
राजा दशरथ कृत श्री शनि स्तोत्र केवल शनिदेव के भय से मुक्ति का साधन नहीं है, बल्कि यह न्याय, त्याग और कर्म के प्रति आत्मनिरीक्षण की प्रेरणा देता है। शनिदेव क्रूर नहीं बल्कि निष्पक्ष न्यायधीश हैं। जो साधक अहंकार का त्याग कर सच्चे हृदय से इस स्तोत्र का पाठ करता है, शनिदेव उसके जीवन से सभी अंधकार, दरिद्रता और संकटों को मिटाकर उसे स्थायित्व और आत्मिक शांति का वरदान देते हैं।
⚖️ ॐ शं शनैश्चराय नमः ⚖️
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस लेख में वर्णित प्रसंग पद्म पुराण, पौराणिक इतिहास और पारंपरिक ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य श्रद्धालुओं को धार्मिक ज्ञान और श्लोकों के गूढ़ अर्थ से अवगत कराना है।