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वैकुंठ लोक में एकादशी माता और भगवान श्री विष्णु की पावन Ekadashi Aarti के लिए दिव्य स्वरूप

ॐ जय एकादशी माता आरती (Ekadashi Aarti Lyrics): संपूर्ण पाठ, पौराणिक इतिहास, शब्दार्थ

सनातन धर्म में सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ ‘एकादशी व्रत’ के समापन और पूजन के लिए “ॐ जय एकादशी माता” (Ekadashi Aarti) का गायन अनिवार्य माना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार एकादशी कोई साधारण तिथि नहीं, बल्कि साक्षात भगवान श्री हरि विष्णु के शरीर से प्रकट हुई एक महाशक्ति हैं जिन्होंने मुर नामक असुर का वध किया था। साल की सभी 24 एकादशियों (और अधिकमास की 26 एकादशियों) पर यह पावन आरती गाई जाती है। आज की युवा पीढ़ी इसके प्राचीन और पौराणिक शब्दों के मर्म को भली-भांति समझ सके, इसलिए यहाँ आरती का एक-एक कठिन शब्द, शब्दार्थ और एकादशी माता को संबोधित सरल भावार्थ प्रस्तुत किया गया है।

📌 आरती परिचय व पौराणिक तथ्य (Fact Sheet)

  • आरती का नाम: ॐ जय एकादशी माता (Ekadashi Mata Ki Aarti)
  • प्रधान आराध्या: एकादशी देवी (भगवान श्री विष्णु की योगमाया शक्ति)
  • पौराणिक स्रोत: पद्म पुराण (उत्पत्ति एकादशी प्रसंग)
  • भाषा शैली: संस्कृतनिष्ठ पारंपरिक सरल हिंदी व स्तुति काव्य
  • आरती का समय: एकादशी के दिन प्रातः व संध्या पूजन, और द्वादशी को पारण के समय
  • धार्मिक मान्यता: इस आरती का भावपूर्वक पाठ करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है और साधक समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष पाता है।

ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता।

(ॐ: परब्रह्म का मूल प्रणव नाद | जय: जय-जयकार व वंदन | एकादशी: ग्यारहवीं तिथि व भगवान विष्णु के दिव्य तेज से प्रकट हुई देवी | माता: समस्त भक्तों को तारने वाली स्नेहमयी जननी)

विष्णु की पूजा जो कोई नर-नारी करता, मनवांछित फल पाता ॥ ॐ जय एकादशी माता… ॥

(नर-नारी: कोई भी साधक स्त्री या पुरुष | मनवांछित फल: मन की समस्त सात्विक मनोकामनाओं और इच्छाओं की पूर्ति)

सरल भावार्थ: हे एकादशी माता! आपकी सदा जय हो। जो भी स्त्री या पुरुष एकादशी व्रत धारण कर जगतपालक भगवान श्री विष्णु और आपकी श्रद्धापूर्वक आराधना करता है, उसे जीवन में अपनी समस्त मनोकामनाओं का अभीष्ट फल प्राप्त होता है।

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी।

(नाम गिनाऊं: साल की सभी 24 एकादशियों के पावन नामों का स्मरण | भक्ति प्रदान करनी: जो सांसारिक भटकाव मिटाकर प्रभु चरणों की निष्काम भक्ति देती हैं)

गण गौरव की देनी माता, संतन सुख देनी ॥ ॐ जय एकादशी माता… ॥

(गण गौरव: समाज, कुल और लोक-परलोक में मान-सम्मान व प्रतिष्ठा | देनी माता: देने वाली देवी | संतन सुख देनी: साधु-संतों, तपस्वियों और सच्चे भक्तों को आंतरिक शांति देने वाली)

सरल भावार्थ: हे देवी! आपके प्रत्येक स्वरूप का नाम स्मरण मात्र ही चित्त में अनन्य भगवद्-भक्ति भर देता है। आप अपने शरणागत भक्तों को समाज और देवलोक में परम गौरव प्रदान करती हैं और संतों व निष्कपट साधकों को आत्मिक सुख देने वाली हैं।

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की, उत्पन्ना विश्व तारिणी जन्मी।

(मार्गशीर्ष: अगहन मास | कृष्णपक्ष: चंद्रमा के घटने का पखवाड़ा | उत्पन्ना: उत्पन्ना एकादशी (जब देवी का प्राकट्य हुआ) | विश्व तारिणी जन्मी: पूरे विश्व के जीवों को भवसागर से तारने के लिए प्रकट हुईं)

शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई ॥ ॐ जय एकादशी माता… ॥

(शुक्ल पक्ष: चंद्रमा के बढ़ने का पखवाड़ा | मोक्षदा: मोक्षदा एकादशी (जिस दिन गीता जयंती भी मनाई जाती है) | मुक्तिदाता: जन्म-मरण के चक्र और पापों से मुक्ति दिलाने वाली)

सरल भावार्थ: हे मां! मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष में आप ‘उत्पन्ना एकादशी’ के रूप में संसार का उद्धार करने हेतु प्रकट हुईं, और इसी माह के शुक्ल पक्ष में आप ‘मोक्षदा एकादशी’ बनकर भक्तों को मोक्ष और मुक्ति का परम वरदान देने पधारीं।

पौष के कृष्णपक्ष की सफला, दूजी है पुत्रदा आई।

(सफला: सफला एकादशी = सभी रुके हुए कार्यों को सफल व सिद्ध करने वाली | पुत्रदा: पौष पुत्रदा एकादशी = संतान सुख, उत्तम वंश और संतान की रक्षा करने वाली)

माघ मास में षट्तिला, जया संग सुखदाई ॥ ॐ जय एकादशी माता… ॥

(षट्तिला: तिल के 6 प्रकार के प्रयोग से पाप नाश करने वाली एकादशी | जया संग: जया एकादशी = पिशाच योनि व नीच योनियों से मुक्ति दिलाने वाली | सुखदाई: परम सुख और शांति देने वाली)

सरल भावार्थ: पौष मास में आप कार्यों को सिद्ध करने वाली ‘सफला’ और संतान का सुख देने वाली ‘पुत्रदा’ बनकर आती हैं। माघ मास में आप ‘षट्तिला’ और ‘जया’ बनकर भक्तों के बड़े से बड़े संकटों को हरकर सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं।

फाल्गुन कृष्णपक्ष विजया, आमलकी है आई।

(विजया: विजया एकादशी = शत्रुओं, मुकदमों और विपत्तियों पर विजय दिलाने वाली | आमलकी: आमलकी (आंवला) एकादशी = भगवान विष्णु और आंवले के वृक्ष के पूजन से आरोग्य व अमरत्व देने वाली)

चैत्र कृष्ण में पापमोचिनी, कामदा संग आई ॥ ॐ जय एकादशी माता… ॥

(पापमोचिनी: भयंकर से भयंकर पापों और शापों से मुक्ति (मोचन) दिलाने वाली | कामदा: समस्त मनोकामनाओं (कामनाओं) को पूर्ण करने वाली)

सरल भावार्थ: हे कल्याणी! फाल्गुन में आप कठिन परिस्थितियों पर विजय दिलाने वाली ‘विजया’ और आरोग्य प्रदाता ‘आमलकी’ हैं। चैत्र मास में आप जन्म-जन्मांतर के पाप धोने वाली ‘पापमोचिनी’ और हर मनोकामना सिद्ध करने वाली ‘कामदा’ बनकर हमारा उद्धार करती हैं।

वैशाख कृष्ण में बरूथिनी, मोहिनी अति भली।

(बरूथिनी: कवच के समान संकटों से रक्षा करने वाली | मोहिनी: भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार की स्मृति और मोह-माया से पार उतारने वाली पावन तिथि)

ज्येष्ठ कृष्ण में अपरा, निर्जला सबमें बली ॥ ॐ जय एकादशी माता… ॥

(अपरा: अपार धन, पुण्य और यश देने वाली | निर्जला: बिना जल पिए रखा जाने वाला भीमसेनी व्रत | सबमें बली: 24 एकादशियों में सर्वाधिक तपस्वी व महापुण्यदायी एकादशी)

सरल भावार्थ: वैशाख में आप रक्षा-कवच स्वरूपा ‘बरूथिनी’ और मन को पवित्र करने वाली ‘मोहिनी’ हैं। ज्येष्ठ मास में आप अपार यशदायिनी ‘अपरा’ और बिना अन्न-जल के रखी जाने वाली समस्त एकादशियों की शिरोमणि महाबली ‘निर्जला एकादशी’ हैं।

आषाढ़ कृष्ण में योगिनी, देवशयनी शुभकारी।

(योगिनी: कुष्ठ रोग व दैहिक व्याधियों को शांत करने वाली | देवशयनी शुभकारी: चातुर्मास का आरंभ, जब श्री हरि क्षीरसागर में योगनिद्रा में शयन करते हैं)

श्रावण कृष्ण में कामिका, पवित्रा अति प्यारी ॥ ॐ जय एकादशी माता… ॥

(कामिका: पितरों के कष्ट हरने वाली व इच्छित फल देने वाली | पवित्रा: अंतःकरण को गंगाजल की भांति पवित्र और संतान सुख देने वाली)

सरल भावार्थ: आषाढ़ मास में आप असाध्य रोगों का नाश करने वाली ‘योगिनी’ और चातुर्मास की शुरुआत कराने वाली पावन ‘देवशयनी’ हैं। सावन मास में आप पितरों को तृप्त करने वाली ‘कामिका’ और आत्मा को पावन करने वाली ‘पवित्रा’ स्वरूपिणी हैं।

भाद्रपद कृष्ण में अजा, पद्मा संग सुखदाई।

(अजा: अजा एकादशी = राजा हरिश्चंद्र को खोया राज्य वापस दिलाने वाली | पद्मा: परिवर्तिनी एकादशी = जब भगवान विष्णु करवट बदलते हैं)

आश्विन कृष्ण में इंदिरा, पापांकुशा मन भाई ॥ ॐ जय एकादशी माता… ॥

(इंदिरा: श्राद्ध पक्ष में पितरों को सीधे स्वर्ग भेजने वाली एकादशी | पापांकुशा: पाप रूपी मतवाले हाथी पर अंकुश (नियंत्रण) लगाने वाली)

सरल भावार्थ: भाद्रपद में आप नष्ट हुआ वैभव वापस दिलाने वाली ‘अजा’ और श्री हरि की करवट बदलने वाली ‘पद्मा’ हैं। आश्विन में आप पितरों को सद्गति देने वाली ‘इंदिरा’ और पापों पर अंकुश लगाने वाली ‘पापांकुशा’ बनकर भक्तों का उद्धार करती हैं।

कार्तिक कृष्ण में रमा, देवउठनी आई।

(रमा: दीपावली से पूर्व मां लक्ष्मी की विशेष कृपा बरसाने वाली | देवउठनी: प्रबोधिनी एकादशी = जब 4 माह बाद श्री हरि जागते हैं और तुलसी विवाह व मांगलिक कार्य आरंभ होते हैं)

मलमास में पद्मिनी, परमा मंगलदाई ॥ ॐ जय एकादशी माता… ॥

(मलमास: अधिकमास / पुरुषोत्तम मास | पद्मिनी व परमा: अधिकमास में आने वाली दो दुर्लभ एकादशियां जो कोटि गुना अधिक पुण्य फल प्रदान करती हैं)

सरल भावार्थ: कार्तिक मास में आप धन-वैभव देने वाली ‘रमा’ और श्री हरि को जगाने वाली ‘देवउठनी’ हैं। अधिकमास आने पर आप ‘पद्मिनी’ और ‘परमा’ बनकर साधकों को अनंत गुना पुण्य और अमर लोक का मार्ग दिखाती हैं।

एकादशी की आरती, जो कोई नर गावै।

(नर गावै: जो भी साधक या व्रतधारी नियम और एकाग्रता से इसका गायन करता है)

जनम-जनम के पाप मिटैं, परम धाम वो पावै ॥ ॐ जय एकादशी माता… ॥

(पाप मिटैं: कई जन्मों के संचित कर्म-दोष नष्ट होना | परम धाम: भगवान विष्णु का अविनाशी वैकुंठ धाम)

सरल भावार्थ: जो भी मनुष्य एकादशी माता की इस स्तुति और आरती का नित्य या व्रत के दिन भावपूर्वक गायन करता है, उसके कई जन्मों के संचित पाप कट जाते हैं और वह अंत काल में प्रभु के परम धाम वैकुंठ को प्राप्त करता है।

सनातन धर्म के 18 पुराणों में से प्रमुख पद्म पुराण (Wikipedia) के उत्तराखंड में एकादशी माता की उत्पत्ति, मुर दैत्य के वध और सभी 24 एकादशियों के महात्म्य की कथा सविस्तार वर्णित है।

………………………………………….ॐ जय एकादशी माता आरती की मूल पंक्तियाँ लिखा हुआ मोबाइल वर्टिकल पोस्टर

📖 इन्हें भी जरूर पढ़ें:

📋 आरती में वर्णित साल की सभी 24+2 एकादशियों की सूची

हिंदू मास (महीना) कृष्ण पक्ष की एकादशी शुक्ल पक्ष की एकादशी
मार्गशीर्ष (अगहन) उत्पन्ना एकादशी मोक्षदा एकादशी
पौष सफला एकादशी पुत्रदा एकादशी
माघ षट्तिला एकादशी जया एकादशी
फाल्गुन विजया एकादशी आमलकी एकादशी
चैत्र पापमोचिनी एकादशी कामदा एकादशी
वैशाख बरूथिनी एकादशी मोहिनी एकादशी
ज्येष्ठ अपरा एकादशी निर्जला एकादशी
आषाढ़ योगिनी एकादशी देवशयनी एकादशी
श्रावण कामिका एकादशी पवित्रा एकादशी
भाद्रपद अजा एकादशी पद्मा (परिवर्तिनी) एकादशी
आश्विन इंदिरा एकादशी पापांकुशा एकादशी
कार्तिक रमा एकादशी देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी
अधिकमास (मलमास) पद्मिनी एकादशी परमा एकादशी
ॐ जय एकादशी माता आरती की मूल पंक्तियाँ लिखा हुआ मोबाइल वर्टिकल पोस्टर
ॐ जय एकादशी माता: मूल पंक्तियों सहित पावन एकादशी आरती पोस्टर।

FAQs: Ekadashi Aarti

1. एकादशी माता का प्राकट्य कैसे हुआ था?

पद्म पुराण के अनुसार, जब ‘मुर’ नामक असुर सोते हुए भगवान विष्णु पर प्रहार करने आया, तब प्रभु के शरीर से एक अत्यंत तेजस्विनी कन्या प्रकट हुईं। उन्होंने अपनी एक ही हुंकार से मुर असुर को भस्म कर दिया। प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें ‘एकादशी’ नाम दिया और समस्त पापों को नष्ट करने वाली सर्वश्रेष्ठ तिथि का वरदान दिया।

2. साल की सभी एकादशियों में ‘निर्जला एकादशी’ को ‘सबमें बली’ क्यों कहा गया है?

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी में जल की एक बूंद भी ग्रहण किए बिना 24 घंटे का कठोर व्रत रखा जाता है। महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास के कहने पर भीमसेन ने यह व्रत किया था। मान्यता है कि केवल इस एक एकादशी का व्रत रखने से पूरे वर्ष की 24 एकादशियों का सम्मिलित फल प्राप्त हो जाता है।

3. एकादशी की आरती किस समय करनी चाहिए?

एकादशी की आरती व्रत वाले दिन प्रातःकाल श्री हरि विष्णु की पूजा के बाद, संध्या वेला में दीया-बत्ती के समय और द्वादशी के दिन व्रत के पारण से पूर्व करना अनिवार्य माना जाता है।

4. एकादशी के दिन चावल (चावल का अन्न) खाना क्यों वर्जित है?

पौराणिक मान्यता के अनुसार, महर्षि मेधा के शरीर के अंश से जौ और चावल उत्पन्न हुए थे। एकादशी के दिन चावल का सेवन महर्षि के रक्त और मांस के समान माना गया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी एकादशी के दिन शरीर में जल संतुलन बनाए रखने के लिए भारी चावल से परहेज की सलाह दी जाती है।

5. एकादशी की आरती में दीपक किस प्रकार का होना चाहिए?

भगवान विष्णु और एकादशी माता की आरती में गाय के शुद्ध देसी घी का दीपक और भीमसेनी कपूर का उपयोग करना चाहिए। दीपक में पीली या सफेद रुई की बत्ती लगाना विशेष रूप से शुभ माना गया है।

6. क्या बिना व्रत रखे भी एकादशी माता की आरती गाई जा सकती है?

हां, यदि कोई अस्वस्थता, वृद्धावस्था या किसी कारणवश उपवास रखने में असमर्थ है, तो भी वह शुद्ध और सात्विक रहकर एकादशी के दिन इस आरती का श्रवण व गायन कर सकता है। इससे भी मानसिक शांति और पापों से मुक्ति मिलती है।

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डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई आरती, शब्दार्थ, तिथियों का महात्म्य और पौराणिक कथाएं सनातन धर्मग्रंथों (विशेष रूप से पद्म पुराण) और पारंपरिक वैष्णव मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य धार्मिक साहित्य के वास्तविक मर्म और आध्यात्मिक ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।

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