संकटमोचन महाबली श्री हनुमान जी की स्तुति के लिए “आरती कीजै हनुमान लला की” (Aarti Kije Hanuman Lala Ki) सबसे सिद्ध और शक्तिशाली आरती मानी जाती है। मंगलवार, शनिवार और हनुमान जन्मोत्सव के पावन अवसरों पर यह आरती हर घर और मंदिर में गाई जाती है। इस आरती की रचना मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के महान संत स्वामी रामानंद जी ने की थी। अवधी और प्राचीन ब्रज शब्दावली होने के कारण आज की नई पीढ़ी इसके कई शब्दों के मर्म को समझ नहीं पाती। यहाँ इस आरती का प्रत्येक शब्द, कठिन शब्दावली और प्रभु को संबोधित सरल भावार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है।
📌 आरती परिचय व पौराणिक तथ्य (Aarti Fact Sheet)
- आरती का नाम: आरती कीजै हनुमान लला की (Hanuman Ji Ki Aarti)
- रचयिता: जगद्गुरु स्वामी रामानंद जी (भक्ति आंदोलन के प्रणेता)
- भाषा: प्राचीन अवधी मिश्रित ब्रजभाषा
- प्रधान देवता: भगवान श्री हनुमान जी (रुद्रावतार, संकटमोचन)
- आरती का समय: प्रातःकाल पूजा के उपरांत, संध्या आरती अथवा सुंदरकांड/हनुमान चालीसा के पाठ के बाद
- आध्यात्मिक मान्यता: जो साधक इस आरती का भावपूर्वक नित्य गायन करता है, उसे भूत-पिशाच, ग्रह-दोष, आकस्मिक दुर्घटना और अज्ञात भय से सदा रक्षा मिलती है।
आरती कीजै हनुमान लला की, दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥
(आरती कीजै: दीप जलाकर आदरपूर्वक पूजन व वंदन करना | हनुमान लला: लला = माता अंजना के अत्यंत प्रिय व दुलारे पुत्र | दुष्ट दलन: दुष्टों, अत्याचारियों और राक्षसों का दलन यानी नाश करने वाले | रघुनाथ कला की: भगवान श्री रामचंद्र जी (रघुनाथ) की दिव्य शक्ति, तेज और अंश स्वरूप)
आरती कीजै हनुमान लला की, दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥
(भाव: प्रभु श्री राम के परम भक्त और समस्त विघ्नों का अंत करने वाले मारुति नंदन का पावन आह्वान)
जाके बल से गिरिवर कांपै, रोग दोष जाके निकट न झांपै ॥
(जाके बल से: जिनके अपार पराक्रम और शक्ति से | गिरिवर कांपै: गिरि-वर = बड़े-बड़े पर्वत भी भय व वेग से कांपने लगते हैं | रोग दोष: शारीरिक बीमारियां, मानसिक कष्ट और ग्रह दोष | निकट न झांपै: पास फटकने या झांकने की भी हिम्मत नहीं करते)
अंजनि पुत्र महाबलदाई, संतन के प्रभु सदा सहाई ॥
(अंजनि पुत्र: माता अंजना के वीर पुत्र | महाबलदाई: असीम आत्मबल, बुद्धि और शक्ति देने वाले | संतन के प्रभु: साधु-संतों, सज्जनों और निष्कपट भक्तों के रक्षक | सदा सहाई: हर कठिन परिस्थिति में सदैव सहायता करने वाले)
दे बीरा रघुनाथ पठाए, लंका जारि सीय सुधि लाए ॥
(दे बीरा: बीड़ा देना = प्राचीन काल में किसी अत्यंत कठिन कार्य को पूरा करने का संकल्प सौंपना | रघुनाथ पठाए: श्री राम जी द्वारा दूत बनाकर भेजा जाना | लंका जारि: सोने की लंका को अपनी पूंछ की अग्नि से जलाकर राख करना | सीय सुधि लाए: सीय = माता सीता, सुधि = खोज/समाचार लेकर आना)
लंका सो कोट समुद्र सी खाई, जात पवनसुत बार न लाई ॥
(सो कोट: जैसा अभेद्य किला/दुर्ग | समुद्र सी खाई: चारों ओर 100 योजन गहरा समुद्र जिसकी सुरक्षा खाई के समान थी | जात पवनसुत: पवनपुत्र हनुमान जी को वहां जाते समय | बार न लाई: तनिक भी देर नहीं लगी, पलक झपकतें ही पार कर लिया)
लंका जारि असुर संहारे, सियारामजी के काज संवारे ॥
(जारि: भस्म करके | असुर संहारे: अक्षयकुमार और लंका के कई क्रूर राक्षसों का अंत किया | काज संवारे: प्रभु श्री राम और माता जानकी के सभी रुके हुए कार्यों को सिद्ध व सफल बनाया)
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे, आनि संजीवन प्रान उबारे ॥
(मूर्छित पड़े: मेघनाद के शक्ति बाण से चेतना खोकर धरती पर गिरना | सकारे: सुबह होने से पहले/प्रातः काल के समय | आनि संजीवन: द्रोणागिरी पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर आना | प्रान उबारे: लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा की)
पैठि पताल तोरि जम-कारे, अहिरावण की भुजा उखारे ॥
(पैठि पताल: पाताल लोक के भीतर प्रवेश करके | तोरि: तोड़कर | जम-कारे: यमराज के समान भयानक बंदीगृह/जेल | अहिरावण: तंत्र-मंत्र और मायावी शक्तियों का ज्ञाता पाताल का राजा | भुजा उखारे: उसकी विशाल भुजाओं को उखाड़कर उसका वध कर दिया)
बायें भुजा असुर दल मारे, दहिने भुजा संतजन तारे ॥
(बायें भुजा: बाईं भुजा/गदा के प्रहार से | असुर दल: दैत्यों की पूरी सेना का विनाश | दहिने भुजा: दाहिना हाथ (अभय मुद्रा) | संतजन तारे: धर्म पर चलने वाले सज्जनों और भक्तों का उद्धार किया)
सुर नर मुनि आरति उतरैं, जय जय जय हनुमान उचरैं ॥
(सुर: देवता | नर: मनुष्य | मुनि: तपस्वी व ऋषिगण | आरति उतरैं: श्रद्धा से वंदना करना | उचरैं: मुख से उच्चारण व जयघोष करना)
कंचन थार कपूर लौ छाई, आरति करत अंजना माई ॥
(कंचन थार: सोने की थाली | कपूर लौ छाई: प्रज्वलित भीमसेनी कपूर की ज्योति | अंजना माई: माता अंजना स्वयं अपने पराक्रमी पुत्र की आरती उतारती हैं)
जो हनुमानजी की आरति गावै, बसि बैकुंठ परमपद पावै ॥
(बसि बैकुंठ: भगवान विष्णु और श्री राम के परम धाम वैकुंठ में स्थान प्राप्त होना | परमपद पावै: मोक्ष और सभी सांसारिक सिद्धियों की प्राप्ति होना)
आरती कीजै हनुमान लला की, दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥
(आरती समापन: मारुति नंदन के चरणों में संपूर्ण आत्मसमर्पण)
हनुमान जी के पराक्रम, भक्ति और लंका दहन की दिव्य लीलाओं का विस्तारपूर्वक उल्लेख गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस (Wikipedia) के सुंदरकांड और लंकाकांड में प्रामाणिक रूप से मिलता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. ‘आरती कीजै हनुमान लला की’ के मूल रचयिता कौन हैं?
इस प्रसिद्ध आरती की रचना 14वीं शताब्दी के महान वैष्णव संत और रामानंदी संप्रदाय के संस्थापक जगद्गुरु स्वामी रामानंद जी ने की थी, जो संत कबीर दास और गोस्वामी तुलसीदास की गुरु परंपरा के सर्वोच्च संत थे।
2. ‘रघुनाथ कला की’ का वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
‘रघुनाथ’ भगवान श्री राम को कहा जाता है और ‘कला’ का अर्थ अंश, शक्ति या दिव्य सामर्थ्य होता है। इसका अर्थ है कि हनुमान जी स्वयं भगवान श्री राम की इच्छा और उनकी अलौकिक शक्ति के साक्षात प्रतीक हैं।
3. ‘पैठि पताल तोरि जम-कारे’ में किस घटना का उल्लेख है?
जब लंका युद्ध के दौरान रावण का मायावी भाई अहिरावण श्री राम और लक्ष्मण का पाताल लोक में अपहरण कर ले गया था, तब हनुमान जी ने पाताल में प्रवेश कर यमराज जैसे कठोर पहरे और कारागार को तोड़कर अहिरावण का वध किया और प्रभु को सुरक्षित वापस लाए।
4. हनुमान जी की आरती में दीपक किस तेल का जलाना चाहिए?
हनुमान जी की आरती के लिए चमेली के तेल या शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसके अलावा सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करने के बाद आरती करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है।
5. आरती करते समय थाल को कितनी बार और कैसे घुमाना चाहिए?
आरती की थाल को सदैव दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में घुमाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार 4 बार चरणों में, 2 बार नाभि पर, 1 बार मुखमंडल पर और 7 बार पूरे विग्रह के सामने घुमाते हुए आरती संपन्न करनी चाहिए।
6. क्या स्त्रियां भी हनुमान जी की आरती कर सकती हैं?
हां, माता अंजना के समान कोई भी माता या बहन हनुमान जी को अपना पुत्र या रक्षक मानकर आदरपूर्वक आरती और दीपदान कर सकती हैं। केवल विग्रह को सीधे स्पर्श करने से परहेज रखने की परंपरा है।
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डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में प्रस्तुत आरती, शब्दार्थ और पौराणिक कथाएं प्रामाणिक सनातन धर्म ग्रंथों, रामानंद संप्रदाय की मान्यताओं और श्रीरामचरितमानस के आधार पर प्रस्तुत की गई हैं। इसका उद्देश्य प्राचीन आध्यात्मिक ज्ञान और स्तुति का सही अर्थ आम जनमानस तक पहुंचाना है।