गोवर्धन जी की पूजा (आरती) सिर्फ कोई सामान्य पूजा-पाठ या रस्म नहीं है, बल्कि प्रकृति (Environment), गाय माता और हमारा पेट भरने वाले पहाड़ों को सच्चे दिल से धन्यवाद (Thank You) कहने का बहुत ही प्यारा त्योहार है। जब हम दिवाली मनाते हैं, तो उसके ठीक अगले दिन यह पावन पर्व आता है, जिसे बहुत से लोग ‘अन्नकूट’ भी कहते हैं। द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र देव का घमंड तोड़कर सबको यह सिखाया था कि जो पहाड़, नदियां, पेड़-पौधे और पशु हमें जीवन देते हैं, असली भगवान तो उन्हीं में बसते हैं।
भगवान श्री कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर सात दिनों तक पूरे गोवर्धन पर्वत को एक छाते की तरह उठाकर सभी ब्रजवासियों और पशु-पक्षियों की जान बचाई थी। इस दिन जब हम सच्चे मन से गिरिराज जी (गोवर्धन बाबा) की पूजा और आरती करते हैं, तो घर में सुख-शांति आती है, अन्न-धन की कभी कमी नहीं होती और मन से हर तरह का डर व तनाव पूरी तरह दूर हो जाता है।
गोवर्धन पूजा : जरूरी बातें एक नज़र में
- त्योहार का दिन: दिवाली के ठीक अगले दिन (कार्तिक मास की प्रतिपदा / पड़वा तिथि)
- कब से शुरू हुआ: द्वापर युग में, जब श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया था
- मुख्य पावन स्थल: गोवर्धन पर्वत, मथुरा (वृंदावन-ब्रज धाम)
- : गाय के शुद्ध गोबर से लेटे हुए गोवर्धन बाबा की सुंदर आकृति
- परिक्रमा: गोवर्धन जी की 7 कोस (लगभग 21 किलोमीटर) की पैदल परिक्रमा
- खास प्रसाद: कढ़ी-चावल, बाजरा और 56 तरह के भोग (अन्नकूट)
- पूजा का लाभ: घर में बरकत, सुख-शांति, डर से मुक्ति और हर संकट का निवारण
गोवर्धन जी की पूजा : श्री गिरिराज महाराज की आरती, आसान शब्दार्थ व सीधा भावार्थ
श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज,
तेरे माथे मुकुट विराज रहे ओ।
तोपे पान चढ़े, तोपे फूल चढ़े,
तोपे चढ़े दूध की धार, धार,
तेरे माथे मुकुट विराज रहे है॥
आसान शब्दार्थ: विराज रहेओ = बहुत सुंदर सज रहा है; तोपे = आपके ऊपर; दूध की धार = कच्चे दूध से अभिषेक करना।
सरल भावार्थ: हे गोवर्धन महाराज! आपके माथे पर सोने का मुकुट कितना प्यारा और सुंदर लग रहा है। भक्त आपके ऊपर मीठा पान, ताजे फूल और शुद्ध दूध की धार चढ़ाकर आपका पूजन कर रहे हैं। हे प्रभु, हम पर अपनी कृपा बनाए रखिए।
तेरी सात कोस की परिक्रमा,
और चकलेश्वर विश्राम, विश्राम,
तेरे माथे मुकुट विराज रहे हैं॥
आसान शब्दार्थ: सात कोस = लगभग 21 किलोमीटर की दूरी; चकलेश्वर = गोवर्धन में स्थित भगवान शिव का बहुत पुराना और पवित्र मंदिर।
सरल भावार्थ: हे गिरिराज जी! भक्त आपके चारों तरफ 21 किलोमीटर की परिक्रमा लगाकर अपनी गलतियों की माफी मांगते हैं और रास्ते में चकलेश्वर महादेव के मंदिर में रुककर मन को शांति मिलती है।
तेरे गले में कंठा सोह रहे हो,
और ठोड़ी पे हीरा लाल, लाल,
तेरे माथे मुकुट विराज रहे हो॥
आसान शब्दार्थ: कंठा = गले का सुंदर हार; सोह रहेओ = बहुत जंच रहा है; ठोड़ी पे = चेहरे की ठुड्डी (Chin) पर।
सरल भावार्थ: हे कान्हा स्वरूप गोवर्धन बाबा! आपके गले में मोतियों और रत्नों का हार चमक रहा है और आपकी ठुड्डी पर लाल रंग का चमकदार हीरा दमक रहा है। आपका यह रूप मन मोह लेता है।
तेरे कानन कुंडल चमक रहे हो,
और मुख पे मुरली लाल, लाल,
तेरे माथे मुकुट विराज रहे हो॥
आसान शब्दार्थ: कानन = कानों में; कुंडल = कानों की बालियां/झुमके; मुरली = बांसुरी।
सरल भावार्थ: आपके कानों में सोने के कुंडल चमक रहे हैं और आपके होठों पर प्यारी सी बांसुरी सजी हुई है, जिसकी धुन सुनकर हर किसी का दुख-दर्द गायब हो जाता है।
गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण,
करो भक्तन के भव पार, पार,
तेरे माथे मुकुट विराज रहे हो॥
आसान शब्दार्थ: गिरिराज धरण = पर्वत को उठाने वाले; भव पार = जिंदगी की तमाम मुश्किलों से बाहर निकालना।
सरल भावार्थ: हे अपनी उंगली पर पर्वत उठाने वाले दयालु कृष्ण कन्हैया! हम सब आपकी शरण में आए हैं। हमारे जीवन की हर मुश्किल और उलझन को दूर करके हमें सही राह दिखाइए।

गोवर्धन पूजा की सच्ची कहानी, 56 भोग का रहस्य और सीख
बहुत पुरानी बात है, द्वापर युग में मथुरा के पास ब्रज में रहने वाले लोग हर साल बारिश कराने वाले देवता इंद्र की बहुत बड़ी पूजा करते थे और उन्हें ढेर सारा भोग लगाते थे। एक दिन छोटे से कान्हा ने अपने बाबा नंद जी से पूछा—”बाबा, हम इंद्र देव की पूजा क्यों करते हैं? बारिश तो बादलों का काम है, और हमें असली खाना, हमारी गायों को हरी घास, साफ पानी और छाया तो यह गोवर्धन पर्वत देता है। इसलिए हमें इंद्र की नहीं, बल्कि अपने इस पर्वत और प्रकृति की पूजा करनी चाहिए।”
सभी गांव वालों को कान्हा की बात बिल्कुल सही लगी। सबने मिलकर तरह-तरह की मिठाइयां, सब्जियां, कढ़ी-चावल और फल बनाकर गोवर्धन बाबा को भोग लगाया, जिसे आज हम अन्नकूट कहते हैं। जब इंद्र देव को पता चला कि ब्रज के लोगों ने उनकी पूजा बंद कर दी, तो वे बहुत गुस्सा हो गए। गुस्से में उन्होंने लगातार 7 दिनों तक भयंकर तूफानी बारिश करा दी ताकि पूरा गांव बह जाए।
लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने बिना डरे अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली पर पूरे गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। गांव के सभी लोग, बच्चे, बूढ़े और गाय-बछड़े उस पर्वत के नीचे सुरक्षित आ गए। इंद्र का घमंड टूट गया और उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। इस लीला की मूल कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के गोवर्धन लीला अध्याय (Vedabase) में प्रमाण सहित पढ़ने को मिलती है।
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गोवर्धन पूजा से जुड़े सवाल और उनके जवाब (FAQ)
1. घर के आंगन में गोवर्धन बाबा की पूजा कैसे की जाती है?
दिवाली की अगली सुबह या शाम को घर के आंगन में शुद्ध गाय के गोबर से लेटे हुए गोवर्धन बाबा का स्वरूप बनाया जाता है। रोली, फूल, खील, बताशे चढ़ाए जाते हैं। फिर सरसों के तेल या घी का दीया जलाकर परिवार के सभी लोग मिलकर गोवर्धन जी की परिक्रमा (चक्कर) लगाते हैं और आरती गाते हैं।
2. गोवर्धन बाबा की नाभि में दूध या गंगाजल क्यों डालते हैं?
गोवर्धन जी की नाभि की जगह एक कटोरी रखी जाती है, जिसमें दूध, गंगाजल, दही और बताशा डाला जाता है। यह भगवान के अभिषेक का प्रतीक है। पूजा के बाद इसे प्रसाद (चरणामृत) मानकर पूरे परिवार में बांटते हैं, जिससे घर में सुख और अच्छी सेहत बनी रहती है।
3. गोवर्धन पूजा में 56 भोग (अन्नकूट) ही क्यों चढ़ाते हैं?
मान्यता है कि कन्हैया रोजाना दिन भर में 8 बार खाना खाते थे। जब उन्होंने लगातार 7 दिनों तक पर्वत को उठाए रखा, तो उन्होंने कुछ नहीं खाया। इसलिए 7 दिनों के हिसाब से (7 दिन × 8 पहर = 56) गांव वालों ने प्यार से उनके लिए 56 तरह के अलग-अलग स्वादिष्ट पकवान बनाकर खिलाए थे।
4. इस दिन गायों की पूजा करना क्यों जरूरी होता है?
गोवर्धन पूजा का दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा ‘गौ-सेवा’ है। गाय हमें दूध देती है और हमारे जीवन की रक्षा करती है। इस दिन गायों को नहलाकर, उनके सींगों पर तेल लगाकर, उन्हें ताजी रोटी, गुड़ और हरा चारा खिलाया जाता है ताकि घर में हमेशा बरकत बनी रहे।
5. गोवर्धन की 7 कोस परिक्रमा का क्या मतलब है?
मथुरा के गोवर्धन पर्वत की पूरी परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर की है। लोग नंगे पैर भजन गाते हुए यह परिक्रमा लगाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस परिक्रमा को पूरा करने से मन का भारीपन खत्म होता है और मांगी गई हर अच्छी मन्नत पूरी होती है।
6. गोवर्धन पूजा करने से हमारे जीवन में क्या बदलाव आते हैं?
इस पूजा से घर में अन्न और धन की कभी तंगी नहीं होती। परिवार के लोगों में आपसी प्यार बढ़ता है, मन से बेवजह का तनाव व डर खत्म होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा (Positive Vibes) का संचार होता है।
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डिस्क्लेमर: इस पोस्ट में दी गई गोवर्धन पूजा विधि, आरती और अन्नकूट की कहानी हमारे धार्मिक ग्रंथों और पारंपरिक लोक मान्यताओं पर आधारित है ताकि आज की पीढ़ी इसे आसानी से समझ सके।