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Aarti Kya Hai? आरती क्यों करते हैं? जानिए इसका वैदिक इतिहास, वैज्ञानिक रहस्य और 14 बार थाल घुमाने के नियम

Table of Contents

आरती क्या है और यह कब व क्यों की जाती है?

सनातन धर्म में किसी भी पूजा, व्रत, अनुष्ठान या संध्या वंदन का चरमोत्कर्ष सदैव आरती (Aarti) के साथ ही पूर्ण होता है। दीपक की पावन ज्योति, कर्पूर की सुगंध, शंख और घंटों के नाद के साथ जब भक्त अपने आराध्य के सम्मुख थाल घुमाता है, तो वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा और गहन शांति का संचार हो जाता है।

संस्कृत में आरती को ‘आरात्रिक’ या ‘नीराजन’ कहा गया है। इसका मूल अर्थ है अज्ञान रूपी रात्रि (अंधकार) को दूर कर ज्ञान के प्रकाश का प्राकट्य। जब भक्त अपने समस्त अहंकार को त्यागकर ‘आर्त भाव’ (दीन व निष्कपट प्रेम) से प्रभु की वंदना करता है, तो वह क्रिया आरती कहलाती है। षोडशोपचार पूजा में मंत्रहीनता, क्रियाहीनता और भूल-चूक की क्षमा याचना हेतु आरती अनिवार्य मानी गई है। क्या आरती केवल भगवान की ही होती है? कदापि नहीं! सनातन परंपरा में परमेश्वर के साथ-साथ आदिशक्ति देवियों, व्रत-पर्वों, जीवन को दिशा देने वाले पूज्य गुरुओं, सिद्ध संतों, जीवनदायिनी नदियों और पावन तीर्थों की भी आरती की जाती है।

📌 आरती तत्व-दर्शन व त्वरित तथ्य (Fact Sheet)

  • मूल संस्कृत शब्द: ‘आरात्रिक’ (अंधकार नाशक) एवं ‘नीराजन’ (विशेष तेज से अंगों का दर्शन)
  • पूजा क्रम: षोडशोपचार पूजा का 15वां व अत्यंत महत्वपूर्ण अंग
  • प्रतिनिधित्व: पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और पंचप्राणों का परमात्मा में समर्पण
  • थाल घुमाने का शास्त्रीय नियम: कुल 14 बार — 4 बार चरणों में, 2 बार नाभि पर, 1 बार मुख पर, और 7 बार सर्वांग पर
  • आरती का मुख्य उद्देश्य: पूजा में अनजाने में हुई त्रुटियों का निवारण, नकारात्मकता का क्षय व आत्म-शुद्धि

🕉️ जल्दी समझें — आरती के 8 प्रमुख प्रकार (Aarti Categories)

भाव, परंपरा और आराध्य के आधार पर आरती संग्रह को 8 मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:

1. भगवान की आरती: परब्रह्म परमेश्वर (गणेश, शिव, विष्णु, राम, कृष्ण, हनुमान आदि)।
2. देवी की आरती: आदिशक्ति भगवती (लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती, काली, पार्वती आदि)।
3. व्रत एवं पर्व की आरती: एकादशी, करवा चौथ, तीज, सत्यनारायण व्रत आदि की आरतियां।
4. गुरु की आरती: अज्ञान का तम (अंधेरा) मिटाकर ज्ञान देने वाले सद्गुरु की पावन स्तुति।
5. संत एवं महापुरुषों की आरती: सिद्ध संतों (साईं बाबा, झूलेलाल जी, कबीर दास आदि)।
6. नदी एवं प्रकृति की आरती: जीवनदायिनी मां गंगा, यमुना, नर्मदा व तुलसी माता की आरती।
7. धाम एवं तीर्थ की आरती: बांके बिहारी, काशी विश्वनाथ, तिरुपति आदि सिद्ध पीठों की आरतियां।
8. विशेष पूजा आरती: नवग्रह, महामृत्युंजय, कालभैरव व तांत्रिक/पौराणिक अनुष्ठान आरतियां।

3. 🙏 भगवान की प्रसिद्ध आरतियां (Prasidh Bhagwan Ki Aartiyan)

सनातन धर्म में प्रमुख देवताओं के पूजन में गाई जाने वाली सर्वसिद्ध आरतियां:

3.1 भगवान श्री गणेश जी की आरती (Shri Ganesh Ji Ki Aarti)

“जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा । माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥”

(परिचय: प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता भगवान गणेश की सबसे प्रसिद्ध आरती, जो हर शुभ कार्य व पूजा के प्रारंभ में गाई जाती है।)

3.2 भगवान शिव की आरती (Shri Shiv Ji Ki Aarti)

“ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा । ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा ॥”

(परिचय: देवाधिदेव महादेव की यह पारंपरिक आरती त्रिदेवों की एकात्मता और शिव के कल्याणकारी रूप को प्रकट करती है।)

3.3 भगवान विष्णु की आरती (Lord Vishnu Aarti)

“ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे । भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥”

(परिचय: पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी द्वारा रचित यह आरती पूरे भारत में सार्वभौमिक प्रार्थना के रूप में नित्य गाई जाती है।)

📖 महत्व: श्री हरि के समस्त संकट हरने और शरणागत की रक्षा करने की सर्वप्रिय स्तुति।

3.4 श्री राम जी की आरती (Shri Ram Aarti)

“श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं । नवकंज लोचन, कंज मुख, कर कंज, पद कंजारुणं ॥”

(परिचय: गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित यह स्तुति व आरती मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के दिव्य स्वरूप का वर्णन करती है।)

3.5 श्री कृष्ण जी की आरती — आरती कुंजबिहारी की

“आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की । गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला ॥”

(परिचय: ब्रजमंडल और बांके बिहारी मंदिर की यह प्रमुख आरती भगवान श्री कृष्ण और राधारानी की युगल छवि का सजीव चित्रण करती है।)

3.6 श्री हनुमान जी की आरती — आरती कीजै हनुमान लला की

“आरती कीजै हनुमान लला की, दुष्ट दलन रघुनाथ कला की । जाके बल से गिरिवर कांपै, रोग दोष जाके निकट न झांपै ॥”

(परिचय: स्वामी रामानंद जी द्वारा रचित संकटमोचन हनुमान जी की यह सिद्ध आरती समस्त भयों, रोगों और संकटों को नष्ट करने वाली है।)

3.7 सूर्य देव की आरती (Surya Dev Ki Aarti)

“जय कश्यप नंदन, ॐ जय अदिति नंदन । त्रिभुवन तिमिर निकंदन, भक्त हृदय चन्दन ॥”

(परिचय: प्रत्यक्ष देव भगवान भुवन भास्कर की यह आरती जीवन में तेज, आरोग्य, आत्मविश्वास और यश की वृद्धि करती है।)

3.8 श्री शनिदेव जी की आरती (Shani Dev Ki Aarti)

“जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी । सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी ॥”

(परिचय: कर्मफलदाता शनिदेव की यह स्तुति साढ़ेसाती, ढैय्या और ग्रह-दोषों के शमन हेतु शनिवार को गाई जाती है।)

3.9 श्री खाटू श्याम जी की आरती (Shri Khatu Shyam Aarti)

“ॐ जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे । खाटू धाम विराजे, अनुपम रूप धरे ॥”

(परिचय: कलयुग के अवतारी ‘शीश के दानी’ और ‘हारे के सहारे’ बाबा श्याम की परम कल्याणकारी आरती।)

3.10 श्री सत्यनारायण भगवान की आरती (Shri Satyanarayan Aarti)

“जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । सत्यनारायण स्वामी, जन-पातक-हरणा ॥”

(परिचय: पूर्णिमा व्रत एवं पारिवारिक सत्यनारायण कथा के समापन पर मनोकामना पूर्ति व सुख-शांति हेतु गाई जाने वाली आरती।)

4. 🌺 देवी-देवियों की प्रसिद्ध आरतियां (Devi Mata Ki Aartiyan)

4.1 माता लक्ष्मी की आरती (Laxmi Ji Ki Aarti)

“ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता । तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता ॥”

(परिचय: धन, धान्य और स्थिर ऐश्वर्य की प्रदाता मां महालक्ष्मी की सर्वविदित आरती, जिसे शुक्रवार व दीपावली पर विशेष रूप से गाया जाता है।)

4.2 दुर्गा माता की आरती (Durga Mata Aarti)

“जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी । तुमको निसदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥”

(परिचय: नवरात्रि और देवी आराधना की मुख्य आरती, जो शक्ति, साहस और संकट-निवारण प्रदान करती है।)

4.3 माता सरस्वती की आरती (Saraswati Mata Aarti)

“जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता । सद्गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता ॥”

(परिचय: विद्या, वाणी, संगीत और विवेक की अधिष्ठात्री देवी की स्तुति।)

4.4 संतोषी माता की आरती (Santoshi Mata Aarti)

“जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता । अपने सेवक जन को, सुख संपत्ति दाता ॥”

(परिचय: शुक्रवार के संतोषी माता व्रत के पारण और पारिवारिक संतोष व शांति की आरती।)

4.5 पार्वती माता की आरती (Parvati Mata Aarti)

“जय पार्वती माता, मैया जय पार्वती माता । ब्रह्म सनातन देवी, शुभ फल की दाता ॥”

(परिचय: अखंड सौभाग्य, वैवाहिक सुख और तीज-करवाचौथ पर गाई जाने वाली मंगलमयी आरती।)

4.6 काली माता की आरती (Mata Kali Aarti)

“अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली । तेरे ही गुण गावें भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती ॥”

(परिचय: दुष्ट दलन, तांत्रिक बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों के समूल नाश की तीक्ष्ण व शक्तिशाली आरती।)

4.7 गंगा माता की आरती (Ganga Mata Aarti)

“ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता । जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता ॥”

(परिचय: हरिद्वार, ऋषिकेश व काशी के गंगा घाटों पर गूंजने वाली पापनाशिनी पतित पावनी आरती।)

4.8 तुलसी माता की आरती (Tulsi Mata Aarti)

“जय जय तुलसी माता, सब जग की सुखदाता । वर दे माता, सब दुःख हरता ॥”

(परिचय: घर के आंगन में स्थापित पवित्र तुलसी जी के सम्मुख संध्या दीपदान के समय गाई जाने वाली आरती।)

4.9 एकादशी माता की आरती (Ekadashi Mata Ki Aarti)

“ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता । विष्णु की पूजा जो कोई नर-नारी करता, मनवांछित फल पाता ॥”

(महत्वपूर्ण नोट: पद्म पुराण के अनुसार एकादशी कोई साधारण तिथि नहीं, बल्कि श्री हरि विष्णु से प्रकट हुई देवी शक्ति हैं। साल की सभी 24 एकादशियों पर इसका पाठ अनिवार्य है।)

5. 📿 व्रत एवं पर्व की आरतियां (Vrat evam Parv Ki Aarti)

विशिष्ट व्रतों और त्योहारों के पारण व पूजा के समय गाई जाने वाली प्रमुख आरतियां:

  • 5.1 एकादशी व्रत पारण आरती: साल की सभी 24 एकादशियों के व्रत पूजन में एकादशी माता की आरती की जाती है।
  • 5.2 सत्यनारायण व्रत कथा आरती: ‘जय लक्ष्मी रमणा’ (पूर्णिमा व संक्रांति व्रत हेतु)।
  • 5.3 करवाचौथ आरती: अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु हेतु चौथ माता व मां पार्वती की आरती।
  • 5.4 हरतालिका तीज आरती: भाद्रपद शुक्ल तृतीया को भगवान शिव-पार्वती की युगल आरती।
  • 5.5 गणेश चतुर्थी आरती: ‘जय गणेश जय गणेश देवा’ एवं ‘सुखकर्ता दुखहर्ता’।
  • 5.6 नवरात्रि की आरती: मां शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक ‘जय अम्बे गौरी’।
  • 5.7 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आरती: भाद्रपद अष्टमी को मध्यरात्रि में आरती कुंजबिहारी की का विशेष गायन।
  • 5.8 राम नवमी आरती: चैत्र शुक्ल नवमी पर ‘भए प्रगट कृपाला’ व ‘श्री रामचंद्र कृपालु’।
  • 5.9 महाशिवरात्रि आरती: फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की चारों प्रहर पूजा में ॐ जय शिव ओंकारा
  • 5.10 दीपावली महालक्ष्मी आरती: कार्तिक अमावस्या की निशा में ॐ जय लक्ष्मी माता

6. 👳 गुरु की आरतियां (Guru Aarti Sangrah)

सनातन दर्शन में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और साक्षात महेश्वर का स्थान दिया गया है (गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः)। गुरु आरती का मूल उद्देश्य शिष्य के हृदय से अविद्या का अंधकार मिटाना है:

  • 6.1 ॐ जय गुरुदेव आरती: “जय गुरुदेव अमल अविनाशी, ज्ञान स्वरूप सकल घट वासी…” — यह सार्वभौमिक गुरु वंदना है।
  • 6.2 सद्गुरु की आरती: अपने दीक्षा गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और कृतज्ञता प्रकट करने वाली आरती।
  • 6.3 गुरु पूर्णिमा विशेष आरती: आषाढ़ पूर्णिमा (महर्षि वेदव्यास जयंती) पर गुरु-चरणों के पूजन में अनिवार्य स्तुति।

7. 🙏 संत एवं महापुरुषों की आरतियां (Sant Mahapurush Aarti)

⚠️ संपादकीय नियम (Editorial Standard): GreatPost पर केवल उन्हीं संतों की आरतियां सम्मिलित की गई हैं जो ऐतिहासिक रूप से प्रामाणिक संप्रदायों और परंपराओं में नित्य पूजित हैं।
  • 7.1 श्री साईं बाबा की आरती: शिरडी परंपरा की काकड़ आरती, धूप आरती व शेज आरती।
  • 7.2 श्री झूलेलाल जी की आरती (ॐ जय दूलह देवा): सिंधी समाज के इष्टदेव व वरुणावतार संत झूलेलाल जी की पावन आरती।
  • 7.3 संत कबीर दास जी की आरती: कबीर चौरा व कबीर पंथ में गाई जाने वाली सात्विक दीपक आरती।
  • 7.4 संत रविदास जी की आरती: समरसता और प्रभु भक्ति के प्रतीक संत शिरोमणि रविदास जी की वंदना।

8. 🌊 नदियों और पवित्र तत्वों की आरतियां (River & Nature Aartis)

भारतीय संस्कृति प्रकृति-पूजक है। जल को जीवन और नदियों को मां का दर्जा दिया गया है:

  • 8.1 मां गंगा आरती: हरिद्वार के हर की पौड़ी और वाराणसी के दशाश्वमेध घाट की विश्वप्रसिद्ध महाआरती।
  • 8.2 यमुना जी की आरती: “जय जय श्री यमुने, जय जय श्री यमुने…” — विश्राम घाट, मथुरा की पावन आरती।
  • 8.3 मां नर्मदा आरती: ओंकारेश्वर और भेड़ाघाट में गाई जाने वाली “ॐ जय नर्मदे माता”।
  • 8.4 गोदावरी माता आरती: दक्षिण गंगा नासिक त्र्यंबकेश्वर धाम में गाई जाने वाली स्तुति।

9. 🛕 धाम एवं तीर्थों की आरतियां (Dham & Temple Aartis)

भारत के प्रमुख शक्तिपीठों और ज्योतिर्लिंगों की अपनी सदियों पुरानी विशिष्ट सेवा पद्धति है:

  • 9.1 काशी विश्वनाथ मंगला आरती: द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रधान बाबा विश्वनाथ की भस्म व डमरू आरती।
  • 9.2 बांके बिहारी शृंगार आरती: वृंदावन धाम में श्री ठाकुर जी की पर्दा सेवा के साथ की जाने वाली आरती।
  • 9.3 तिरुपति बालाजी सुप्रभातम व आरती: भगवान वेंकटेश्वर की प्रातःकालीन दिव्य वंदना।
  • 9.4 माता वैष्णो देवी आरती: त्रिकुटा पर्वत पर स्थित गुफा में प्रातः व सांध्य काल होने वाली अलौकिक आरती।

10. 🪔 आरती करने की शास्त्रीय विधि व नियम (Step-by-Step Guide)

चरणबद्ध आरती नियम:

  1. आरती से पूर्व तैयारी: पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें, देवी-देवता का ध्यान, तिलक, पुष्प व नैवेद्य अर्पित करें।
  2. दीपक प्रज्वलित करना: शुद्ध तांबे या पीतल की थाल में कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं। गाय के शुद्ध घी अथवा भीमसेनी कपूर का दीपक जलाएं।
  3. थाल घुमाने का क्रम (कुल 14 बार):
    • भगवान के श्रीचरणों में 4 बार घुमाएं।
    • नाभि कमल के सम्मुख 2 बार घुमाएं।
    • मुखमंडल के सामने 1 बार घुमाएं।
    • अंत में पूरे विग्रह के चारों ओर ‘ॐ’ की आकृति में 7 बार घुमाएं।
  4. शंखनाद व घंटी: आरती के समय बाएं हाथ से लगातार लयबद्ध घंटी बजाएं और अंत में 3 बार शंखनाद करें।
  5. शांतिकरण: आरती के उपरांत शंख या आचमनी से थाल के चारों ओर 3 बार जल छिड़कें।
  6. आरती ग्रहण करना: दोनों हाथों को ज्योति के ऊपर रखकर अपनी आंखों और मस्तक से लगाएं।

11. 🕯️ आरती में दीपक का महत्व (पंचप्रदीप व कर्पूर)

दीपक केवल प्रकाश का माध्यम नहीं, बल्कि साधक के अंतःकरण का प्रतीक है:

  • घी बनाम तेल: सात्विक ऊर्जा और देवताओं के आह्वान के लिए गाय के शुद्ध घी का दीपक सर्वश्रेष्ठ है। शनिदेव, भैरव जी या संकट निवारण हेतु तिल या सरसों के तेल का विधान है।
  • बत्तियों की संख्या: सामान्य नित्य पूजा में 1 बत्ती (एकमुखी) और विशेष आरती में 5 बत्तियां (पंचप्रदीप) जलाई जाती हैं, जो पांचों तत्वों के समर्पण की प्रतीक हैं।
  • कर्पूर आरती (Camphor): कपूर जलने के बाद कोई राख या अवशेष नहीं छोड़ता। यह सिखाता है कि साधक का अहंकार भी ईश्वर के सम्मुख पूरी तरह भस्म हो जाना चाहिए।

12. ❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. क्या आरती केवल भगवान की ही होती है?

नहीं, सनातन परंपरा में ईश्वर के अतिरिक्त देवी शक्तियों, एकादशी जैसे व्रतों, सद्गुरु, सिद्ध संतों, गौ माता, तुलसी और गंगा जैसी पावन नदियों की भी आरती का पूर्ण शास्त्रीय विधान है।

2. सुबह और शाम की आरती में क्या अंतर है?

सुबह की आरती (मंगला/शृंगार आरती) भगवान को जगाने, नवीन ऊर्जा का संचार करने और दिन को मंगलमय बनाने के लिए की जाती है। शाम की आरती (संध्या/शयन आरती) दिनभर की कृपा के लिए धन्यवाद देने और मानसिक शांति हेतु की जाती है।

3. क्या बिना आरती के पूजा पूरी मानी जाती है?

शास्त्रों के अनुसार आरती के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। पूजा के दौरान मंत्रों या विधि में जाने-अनजाने हुई त्रुटियों की भरपाई आरती के माध्यम से ही संभव होती है।

4. क्या एक ही दिन में कई आरतियां की जा सकती हैं?

जी हां, दैनिक पूजा में पहले प्रथम पूज्य गणेश जी की आरती की जाती है, उसके बाद कुलदेवता/इष्टदेवता (जैसे शिव, कृष्ण या राम) और अंत में महालक्ष्मी या हनुमान जी की आरती की जा सकती है।

5. क्या आरती पढ़ना जरूरी है या केवल सुनना भी फलदायी है?

आरती का प्रत्यक्ष गायन करना सर्वोत्तम है, परंतु यदि कोई असमर्थ है तो एकाग्रचित्त होकर आरती का श्रवण और दर्शन करने से भी समान पुण्य और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

6. अलग-अलग पुस्तकों में आरती के शब्दों में अंतर क्यों मिलता है?

सैकड़ों वर्षों तक आरतियां मौखिक व लोक परंपरा में गाई जाती रहीं। क्षेत्रीय बोलियों (अवधी, ब्रज, मैथिली) के प्रभाव से कुछ शब्दों में थोड़ा अंतर आ जाता है, परंतु मूल भाव और फल सदा एक समान रहता है।

📖 13. GreatPost पर उपलब्ध आरतियां एवं स्तुति संग्रह:

हमारी आध्यात्मिक लाइब्रेरी से अपनी मनपसंद आरती व स्तोत्र का अर्थ सहित पाठ पढ़ें:

🙏 14. आरती से जुड़ी एक जरूरी बात (संपादकीय दृष्टिकोण)

अलग-अलग क्षेत्रों, प्राचीन पांडुलिपियों और विभिन्न संप्रदायों में एक ही आरती के कुछ पदों में मामूली शाब्दिक अंतर हो सकता है। सनातन धर्म में शब्दों के व्याकरण से कहीं अधिक महत्व भक्त के ‘भाव’ और ‘समर्पण’ का है। इसलिए किसी एक पाठ को ही एकमात्र सही मानने के बजाय अपने कुल और गुरु परंपरा के अनुसार श्रद्धापूर्वक आरती करना ही श्रेष्ठ है।

🚩 अपनी पसंदीदा आरती खोजें व भक्ति का प्रसार करें!

जिस आरती की आपको तलाश है, उसका नाम नीचे कमेंट में लिखें। यदि आपको यह संपूर्ण आरती संग्रह (Aarti Sangrah) उपयोगी लगा हो, तो इसे अपने परिवार और मित्रों के साथ WhatsApp व सोशल मीडिया पर अवश्य साझा करें!

डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई आरतियां, पौराणिक संदर्भ, इतिहास और पूजा विधियां सनातन धर्मग्रंथों (स्कंद पुराण, पद्म पुराण, ऋग्वेद) और प्रामाणिक संत परंपराओं के आधार पर संकलित की गई हैं। इसका एकमात्र उद्देश्य सनातन ज्ञान और भक्ति रस को जन-जन तक पहुंचाना है।

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