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आरती कुंजबिहारी की अर्थ सहित | Aarti Kunj Bihari Ki Lyrics & Deep Meaning in Hindi

सनातन परंपरा में “आरती कुंजबिहारी की” (Aarti Kunj Bihari Ki) भगवान श्री कृष्ण के मनमोहक स्वरूप की सर्वाधिक गाई जाने वाली स्तुति है। वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर से लेकर देश-विदेश के हर कृष्ण मंदिर और घर में यह आरती नित्य गूंजती है। हालांकि, ब्रजभाषा और प्राचीन काव्य-शैली में रचित होने के कारण आज की युवा पीढ़ी इसके कई दिव्य शब्दों के अर्थों से अनभिज्ञ रह जाती है। इस विशेष लेख में हमने आरती के एक-एक कठिन शब्द, उपमा और रूपक को सरल हिंदी में स्पष्ट किया है ताकि आरती गाते समय भगवान का वह सजीव रूप आपकी आंखों के सामने साकार हो सके।

📌 आरती परिचय व पौराणिक तथ्य (Fact Sheet)

  • आरती का नाम: आरती कुंजबिहारी की (Aarti Kunj Bihari Ki)
  • प्रधान आराध्य: युगल सरकार — भगवान श्री कृष्ण एवं श्री राधा रानी
  • भाषा शैली: विशुद्ध ब्रजभाषा व भक्ति काव्य
  • प्रमुख मंदिर जहां नित्य गायन होता है: श्री बांके बिहारी मंदिर (वृंदावन), श्री राधा रमण मंदिर, प्रेम मंदिर, इस्कॉन व द्वारकाधीश मंदिर
  • आध्यात्मिक महत्व: इस आरती का भावपूर्ण पाठ करने से मन से भय, काम-क्रोध और संताप दूर होते हैं तथा घर में सकारात्मक ऊर्जा व प्रेम का वास होता है।

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

(आरती: दीप प्रज्वलित कर भक्ति भाव से पूजन व वंदन | कुंजबिहारी: कुंज = घने वृक्षों व लताओं से घिरा सुंदर उपवन, बिहारी = विचरण या लीलाएं करने वाले श्री कृष्ण | श्री गिरिधर: गिरि = पर्वत (गोवर्धन), धर = धारण करने वाले | कृष्णमुरारी: कृष्ण + मुरारी = ‘मुर’ नामक असुर का संहार करने वाले भगवान श्री कृष्ण)

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

(भाव: ब्रज मंडल के संरक्षक और समस्त सृष्टि के संकट हरने वाले परमात्मा का पावन आह्वान)

सरल भावार्थ: हे वृंदावन के मनोरम कुंजों में रास रचाने वाले, ब्रजवासियों की रक्षा हेतु गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका (छोटी) उंगली पर उठा लेने वाले और मुर दैत्य का वध करने वाले कृपानिधान श्री कृष्ण! हम सब अत्यंत आदर व निष्काम भक्ति से आपकी यह पावन आरती उतारते हैं।

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।

(बैजंती माला: कमल, कुंद, मंदार, पारिजात व तुलसी — इन 5 दिव्य वनफूलों और बीजों से बनी कभी न मुरझाने वाली माला | बजावै: वादन करना | मुरली: बांस की बंसी | मधुर: कर्णप्रिय व अत्यंत मीठी धुन | बाला: सुकोमल व नटखट बाल स्वरूप)

श्रवण में कुंडल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला ।

(श्रवण: कान | कुंडल: कानों में पहने जाने वाले मकराकृत (मछली के आकार के) स्वर्ण आभूषण | झलकाला: हिलते-डुलते हुए चमक बिखेरना | नंद के आनंद: बाबा नंद के हृदय को परम सुख देने वाले | नंदलाला: नंद बाबा के लाडले पुत्र)

सरल भावार्थ: हे नंद के दुलारे कन्हैया! आपके वक्षस्थल पर पांच सुगंधित वनपुष्पों की दिव्य वैजयंती माला सुशोभित है। आपके अधरों पर जब मीठी बांसुरी बजती है, तो समस्त चराचर जगत मुग्ध हो उठता है। आपके कानों के स्वर्ण कुंडल झिलमिलाकर आपकी शोभा बढ़ा रहे हैं। आपका यह रूप पूरे संसार को परमानंद देने वाला है।

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली ।

(गगन सम: जल से भरे वर्षा ऋतु के नीले-काले बादलों के समान | अंग कांति: शरीर का सम्मोहक तेज व आभा | काली: श्यामल/सांवला रंग | राधिका: वृषभानु नंदिनी श्री राधारानी | चमक रही: स्वर्ण व बिजली जैसी दमक | आली: सखी, अर्धांगिनी अथवा संगिनी)

लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक ।

(लतन में: कुंजों की घनी बेलों व लताओं के बीच | ठाढ़े: ब्रजभाषा का शब्द जिसका अर्थ है ‘त्रिभंग मुद्रा (कमर से थोड़े मुड़े हुए व एक पैर पर दूसरा पैर रखकर) में खड़े होना’ | बनमाली: वन + माली = गले में वनमाला धारण करने वाले और वनों के रक्षक प्रभु | भ्रमर सी: काले भौंरे के पंखों जैसी स्याह-काली | अलक: माथे व गालों पर झूलती हुई घुंघराली बालों की लटें | कस्तूरी तिलक: मृग की नाभि से प्राप्त अत्यंत दुर्लभ व सुगंधित कस्तूरी का लगाया गया टीका | चंद्र सी झलक: शरद पूर्णिमा के पूर्ण चंद्रमा के समान अत्यंत शीतल, शांत और सम्मोहक मुखड़ा)

सरल भावार्थ: हे मोहन! आपका सांवला स्वरूप सजल मेघों के समान मनमोहक है, और आपके पार्श्व में श्री राधारानी बिजली के समान दमक रही हैं। वृंदावन की हरी-भरी लताओं के बीच आप त्रिभंग मुद्रा में खड़े हैं। आपके मुख पर झूलती काले घुंघराले बालों की लटें ऐसी प्रतीत होती हैं मानो कमल रूपी मुखड़े पर काले भौंरे मंडरा रहे हों। आपके मस्तक पर कस्तूरी का तिलक पूर्ण चंद्रमा की तरह शीतल प्रकाश बिखेर रहा है।

ललित छवि श्यामा प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

(ललित छवि: अत्यंत सुंदर, मन को मोह लेने वाला स्वरूप | श्यामा प्यारी: राधा रानी का एक नाम, जो श्याम (कृष्ण) की प्राणवल्लभा हैं)

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

(भाव: युगल सरकार — राधा-कृष्ण के अभिन्न स्वरूप की एक साथ स्तुति)

सरल भावार्थ: हे गिरिधर गोपाल! आपके संग विराजित श्यामा प्यारी (राधारानी) की यह मनमोहक छवि अद्वितीय है। राधा और कृष्ण मिलकर ही पूर्ण ब्रह्म बनते हैं, इसलिए हम आप दोनों के युगल स्वरूप की चरणों में नतमस्तक होकर वंदना करते हैं।

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं ।

(कनकमय: कनक = शुद्ध सोना, कनक-मय = सोने से निर्मित व रत्नों से जड़ा | मोर मुकुट: मोरपंख से सज्जित ताज | बिलसै: अत्यधिक सुशोभित होना या चमकना | दरसन को तरसैं: स्वर्ग के देवगण भी आपके इस दुर्लभ रूप के दर्शन पाने के लिए व्याकुल होना)

गगन सों सुमन रासि बरसै, बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग ।

(गगन सों: आकाश से | सुमन रासि: सुमन = पुष्प, रासि = ढेरों/राशि (फूलों की लगातार वर्षा) | मुरचंग: ब्रज व राजस्थान का प्राचीन लोक वाद्य यंत्र जिसे मुंह के होठों के बीच रखकर बजाया जाता है (Jaw Harp) | मधुर मिरदंग: दो मुख वाला पवित्र मिट्टी/लकड़ी का ढोलक जैसा वाद्य (Mridangam) | ग्वालिन संग: रास में मग्न ब्रज की गोपियों के साथ)

सरल भावार्थ: हे प्रभु! आपके शीश पर मोरपंख लगा स्वर्ण मुकुट ऐसा दमक रहा है कि उसकी एक झलक पाने के लिए स्वर्ग के देवता भी लालायित रहते हैं। आकाश से देवगण पुष्पों की वर्षा कर रहे हैं, और वृंदावन के रास में गोपियों के संग मुरचंग और मृदंग जैसे दिव्य वाद्य यंत्र गूंज रहे हैं।

अतुल रति गोप कुमारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

(अतुल: जिसकी कोई तुलना न हो सके (असीमित) | रति: निष्काम, विशुद्ध व निःस्वार्थ आध्यात्मिक प्रेम | गोप कुमारी: ब्रज की गोपियां व ग्वाल-बालिकाएं)

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

(भाव: गोपियों जैसी अनन्य और समर्पित भक्ति की याचना)

सरल भावार्थ: हे बांके बिहारी! गोप-कुमारियों का आपके प्रति जो प्रेम है, वह सांसारिक वासनाओं से परे संपूर्ण समर्पण है। उस अतुलनीय प्रेम और भक्ति को नमन करते हुए हम आपकी आरती गाते हैं और अपने लिए भी वैसी ही निष्काम भक्ति मांगते हैं।

जहां ते प्रगट भई गंगा, कलुष कलि हारिणी श्रीगंगा ।

(जहां ते: जहां से (भगवान वामन/विष्णु के श्रीचरणों से) | प्रगट भई: उत्पन्न/प्रकट हुईं | कलुष: मन के पाप, मलिनता और दोष | कलि हारिणी: कलियुग के समस्त संतापों व पापों को हरने वाली)

स्मरन ते होत मोह भंगा, बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच ।

(स्मरन ते: केवल याद या ध्यान करने मात्र से | मोह भंगा: अज्ञान और सांसारिक आसक्ति का नष्ट होना | शिव सीस: भगवान शिव के मस्तक पर | हरै अघ कीच: अघ = पाप, कीच = कीचड़; अर्थात् आत्मा पर लगे पाप रूपी मल/कीचड़ को धो डालना)

सरल भावार्थ: हे प्रभु! आपके जिन चरण कमलों से कलियुग के पापों को धोने वाली पतित पावनी मां गंगा प्रकट हुईं, जो देवों के देव महादेव की जटाओं में विराजित हैं और जिनके केवल नाम स्मरण मात्र से सांसारिक मोह नष्ट हो जाता है तथा पापों का कीचड़ धुल जाता है—हम उन पावन चरणों को प्रणाम करते हैं।

चरन छवि श्रीबनवारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

(चरन छवि: शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिह्नों से युक्त चरण कमलों की अनुपम शोभा | श्रीबनवारी: वन में रमण करने वाले भगवान नारायण/कृष्ण)

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

(भाव: प्रभु के चरणों में आत्मा का पूर्ण समर्पण)

सरल भावार्थ: समस्त तीर्थों को अपने भीतर समेटे हुए श्री बनवारी के इन चरण कमलों का ध्यान धरते हुए हम बार-बार उनकी आरती उतारते हैं।

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू ।

(उज्ज्वल तट रेनू: यमुना नदी के किनारे की चांदी जैसी चमकती हुई पवित्र रेत/धूलि | बज रही: गूंज रही है | बेनू: बांसुरी / वंशी)

चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू, हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद ।

(चहुं दिसि: चारों दिशाओं में | धेनू: सुरभि गायें | हंसत मृदु मंद: मुखड़े पर अत्यंत कोमल और मनमोहक मुस्कान | चांदनी चंद: शरद पूर्णिमा की अमृतमयी चांदनी | कटत भव फंद: भव = संसार, फंद = जाल/फंदा; अर्थात् 84 लाख योनियों और जन्म-मरण के सांसारिक बंधनों का कट जाना)

सरल भावार्थ: यमुना जी के तट पर चमकती हुई श्वेत रेत, चारों दिशाओं में चरती हुई भोली गायें, संग में गोप-ग्वाल और वृंदावन में गूंजती आपकी मधुर बांसुरी… ऐसे अलौकिक दृश्य के बीच आपकी मंद-मंद मुस्कान भक्तों के जन्म-मरण के सारे सांसारिक बंधनों और कष्टों को पल भर में काट देती है।

टेर सुन दीन दुखारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

(टेर: दिल की गहराई से निकली पुकार / आर्तनाद | दीन दुखारी: असहाय, दुखी और आपकी शरण में आए भक्तजन)

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

(समापन: प्रभु चरणों में नित्य शरण की प्रार्थना)

सरल भावार्थ: हे अनाथों के नाथ! हम सांसारिक कष्टों से घिरे दीन-दुखियों की इस सच्ची पुकार को सुनिए और हमारे जीवन के समस्त संतापों को हर लीजिए। हे कुंजबिहारी, हे गिरधारी कृष्ण मुरारी, हम सब नतमस्तक होकर आपकी आरती करते हैं!

श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान श्री कृष्ण का ब्रज अवतार विशुद्ध प्रेम और जीव को परमात्मा से जोड़ने का माध्यम है। उनके बाल स्वरूप और गोवर्धन लीला का प्रामाणिक व विस्तृत वर्णन सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण (Wikipedia) के दशम स्कंध में प्राप्त होता है।

आरती कुंजबिहारी की श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की मूल पंक्तियाँ हिंदी टेक्स्ट पोस्टर
आरती कुंजबिहारी की मूल पंक्तियाँ – नित्य स्मरण व स्टेटस हेतु।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. ‘लतन में ठाढ़े बनमाली’ में ‘ठाढ़े’ और ‘बनमाली’ का सही अर्थ क्या है?

‘ठाढ़े’ ब्रजभाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘खड़े होना’। श्रीकृष्ण सीधे खड़े न होकर अपनी मनमोहक त्रिभंग मुद्रा (कमर से थोड़े मुड़े हुए और एक पैर पर दूसरा पैर रखे हुए) में खड़े होते हैं। ‘बनमाली’ का अर्थ है—वन के फूलों की माला पहनने वाले और वृंदावन के वन-उपवनों की रक्षा करने वाले श्री कृष्ण।

2. ‘भ्रमर सी अलक’ में कवि ने बालों की तुलना भौंरे से क्यों की है?

‘भ्रमर’ का अर्थ काला भौंरा होता है और ‘अलक’ का अर्थ है माथे पर झूलने वाली घुंघराली लटें। भारतीय काव्य परंपरा में कृष्ण के मुख की तुलना खिले हुए कमल से की जाती है। जिस प्रकार कमल के रस के लिए काले भौंरे उसके चारों ओर मंडराते हैं, ठीक वैसे ही कृष्ण के सुंदर मुखड़े पर उनकी काली घुंघराली लटें लहराती हैं।

3. ‘बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग’ में ‘मुरचंग’ कौन सा वाद्य यंत्र है?

‘मुरचंग’ (जिसे अंग्रेजी में Morsing या Jaw Harp कहा जाता है) भारत का एक अति प्राचीन पारंपरिक धातु का लोक वाद्य यंत्र है। इसे दांतों और होठों के बीच दबाकर उंगली से बजाया जाता है जिससे अत्यंत मधुर और झनकार भरी ध्वनि निकलती है। ‘मिरदंग’ दो मुख वाला प्राचीन ताल वाद्य (मृदंग) है।

4. आरती में ‘कटत भव फंद’ का क्या अभिप्राय है?

‘भव’ का अर्थ है संसार और ‘फंद’ का अर्थ है फंदा या बंधन। इस पंक्ति का अर्थ है कि भगवान श्री कृष्ण की मधुर मुस्कान और उनके नाम का स्मरण करने से मनुष्य जन्म, मृत्यु, भय और सांसारिक माया के बंधनों से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

5. आरती कुंजबिहारी की करने का सही समय और नियम क्या है?

यह आरती प्रातःकाल (मंगला व शृंगार के समय) और संध्याकाल (दीया-बत्ती के समय) करना सर्वश्रेष्ठ है। आरती की थाल को घड़ी की सुई की दिशा (Clockwise) में ‘ॐ’ का आकार बनाते हुए भगवान के चरणों से मुखमंडल की ओर 4 से 7 बार घुमाना चाहिए।

6. क्या घर पर इस आरती को कपूर से किया जा सकता है?

जी हां, शुद्ध देसी घी का दीपक या भीमसेनी कपूर दोनों से आरती करना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। कपूर की सुगंध घर की नकारात्मक ऊर्जा और वास्तु दोषों को समाप्त करती है।

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डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई आरती, शब्दार्थ और सांस्कृतिक व्याख्याएं प्रामाणिक वैष्णव परंपरा, ब्रज साहित्य, श्रीमद्भागवत और सनातन मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका एकमात्र उद्देश्य पाठकों व नई पीढ़ी को भक्ति साहित्य के वास्तविक अर्थ से परिचित कराना है।

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