सनातन धर्म में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की आराधना जीवन को मर्यादा, धैर्य और आत्मिक शांति से भर देती है। श्री रामचन्द्र जी की स्तुति (Ram Stuti) यानी ‘श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन’ भारतीय संस्कृति और हर राम भक्त के कंठ का सबसे अनमोल हार है। जब भी घर या मंदिर में आरती समाप्त होती है, तब इस पावन स्तुति का गान वातावरण को एक अलौकिक शांति और भक्ति रस से सराबोर कर देता है।
महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित इस स्तुति में प्रभु श्री राम के मनमोहक रूप, उनके दयालु स्वभाव और राक्षसों के संहार की दिव्य गाथा बड़े ही सुमधुर शब्दों में पिरोई गई है। आज की नई पीढ़ी अक्सर इसे गाती है, पर इसके गूढ़ शब्दों और प्रार्थना भाव को पूरी तरह नहीं समझ पाती। इस लेख में हमने पाठकों की सुविधा के लिए सबसे पहले पूरी स्तुति का मूल पाठ A4 प्रिंटेबल कार्ड में दिया है, जिसे आप एक क्लिक में प्रिंट कर सकते हैं। इसके बाद हर पद के कठिन शब्दों के आसान अर्थ और सीधे प्रभु श्री राम के चरणों में समर्पित भावपूर्ण प्रार्थना दी गई है।
भगवान श्री रामचन्द्र: मुख्य तथ्य व स्तुति परिचय
- पहचान व स्वरूप: भगवान श्री हरि विष्णु के सातवें पूर्ण अवतार, मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम।
- रचयिता व मूल ग्रंथ: यह अमर स्तुति गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ ‘विनय पत्रिका’ का मंगलाचरण पद है।
- भगवान का पावन रूप: वर्षा के नए बादलों (नील-नीरद) के समान श्यामल वर्ण, कमल जैसे नयन, मुख व हाथ-पैर, पीतांबर धारी, मस्तक पर मुकुट और हाथों में धनुष-बाण।
- मुख्य प्रसंग व लीलाएं: खर-दूषण का वध, माता सीता का स्वयंवर, जनक दुलारी से विवाह और भक्तों के भव-भय का नाश।
- प्रिय भोग व प्रसाद: पंचामृत, पंजीरी, खीर, तुलसी दल, ताजे फल और कंदमूल।
- पाठ का सर्वश्रेष्ठ समय: प्रातःकाल संध्या वंदन, नित्य आरती के बाद, राम नवमी और सुंदरकांड या रामायण पाठ के समापन पर।
॥ श्री रामचन्द्र जी की स्तुति (मूल पाठ) ॥
(पूजा, आरती व नित्य पाठ हेतु शुद्ध एवं प्रामाणिक स्वरूप)
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं॥ १ ॥कन्दर्प अगणित अमित छवि नवनील नीरद सुन्दरं।
पटपीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं॥ २ ॥भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं।
रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल चन्द दशरथ नन्दनं॥ ३ ॥
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणं।
आजानुभुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं॥ ४ ॥
इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं।
मम हृदय कञ्ज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनं॥ ५ ॥
मनु जाहिं राचेउ मिलहि सो बरु सहज सुन्दर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥ ६ ॥
एही भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली॥ ७ ॥
॥ दोहा ॥
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अङ्ग फरकन लगे॥
श्री रामचन्द्र जी की स्तुति: पदवार शब्दार्थ व भक्ति-प्रार्थना भावार्थ
श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं॥
कृपालु = परम दयालु स्वभाव वाले; भजु मन = हे मेरे मन! तू प्रेम से निरंतर स्मरण कर; हरण भवभय दारुणं = संसार के जन्म-मरण और घोर दुखों का नाश करने वाले; नव कंज लोचन = नए खिले हुए कमल के समान सुंदर नेत्र; कंज मुख = कमल जैसा पावन मुखमंडल; कर कंज = कमल के समान कोमल हाथ; पद कंजारुणं = लाल कमल की भांति अरुण और सुकोमल चरण।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे मेरे चंचल मन! तू परम दयालु भगवान श्री रामचन्द्र जी का निरंतर भजन कर, जो इस संसार के भयानक भय और जन्म-मरण के सारे बंधनों को हरने वाले हैं। हे कृपानिधान श्री राम! आपके नेत्र नवीन कमल के समान खिले हुए हैं, आपका मुख कमल जैसा शांत है, आपके हाथ कमल जैसे कोमल हैं और आपके पावन चरण लाल कमल की तरह अरुण और सुंदर हैं। हे प्रभु! हम संसार के नाना प्रकार के दुखों और भयों से त्रस्त होकर आपके चरणों में आए हैं; अपने इन करुणा भरे नेत्रों से हमारी ओर देखिए और हमारे हृदय के सारे संताप हर लीजिए।
कन्दर्प अगणित अमित छवि नवनील नीरद सुन्दरं।
पटपीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं॥
कन्दर्प अगणित = अनगिनत कामदेवों से भी बढ़कर; अमित छवि = असीम और अतुलनीय सुंदरता; नवनील नीरद = नवीन नीले जल भरे मेघ (सजल बादल); पटपीत = पीला वस्त्र (पीतांबर); तड़ित रुचि शुचि = बिजली की चमक जैसी पवित्र आभा; नौमि = मैं नमन व प्रणाम करता हूँ; जनक सुतावरं = महाराज जनक की पुत्री माता सीता के प्रिय वर (पति)।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे जानकीनाथ! आपका अलौकिक सौंदर्य करोड़ों कामदेवों के रूप को भी मात देने वाला है। आपका पावन श्याम वर्ण नए नीले बादलों के समान शीतल और मनभावन है। उस श्याम शरीर पर आपका पीतांबर ऐसा दमक रहा है मानो नीले बादलों के बीच आकाश में चमकीली बिजली कौंध रही हो। हे माता जानकी के प्यारे वर! हम बारंबार आपके इस परम पवित्र और सुंदर स्वरूप को नमन करते हैं। हे राघव! हमारे मन में अपनी इस पावन छवि को बसा लीजिए ताकि सांसारिक आकर्षणों का सारा मैल धुल जाए।
भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं।
रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल चन्द दशरथ नन्दनं॥
दीनबन्धु = गरीबों, असहायों और दुखियों के सच्चे भाई व सहारे; दिनेश = सूर्यवंश के सूर्य रूप; दानव दैत्य वंश निकन्दनं = राक्षसों और दानवों के कुल का नाश करने वाले; रघुनन्द = रघुकुल को आनंदित करने वाले; आनन्द कन्द = सच्चिदानंद, परम आनंद के मूल स्रोत; कोशल चन्द = कौशल देश के चंद्रमा के समान शीतल; दशरथ नन्दनं = महाराज दशरथ के प्यारे सुपुत्र।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे दीनबंधु! आप असहायों और अनाथों के सबसे बड़े रक्षक हैं, सूर्यवंश के साक्षात सूर्य हैं और दुष्ट दैत्यों के वंश का समूल नाश करने वाले हैं। हे रघुनंदन, आनंद के परम धाम, कौशल देश को शीतलता देने वाले चंद्रमा और राजा दशरथ के लाड़ले लाल! हम अत्यंत दीन-हीन और दुर्बल हैं। हे प्रभु! जैसे आपने जटायु, शबरी और विभीषण जैसे दीनों को अपनाकर उनका उद्धार किया, वैसे ही हे दीनदयाल, हमारी भी बांह पकड़ लीजिए और हमारे जीवन में आनंद का प्रकाश भर दीजिए।
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणं।
आजानुभुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं॥
चारु = अत्यंत सुंदर व मनमोहक; उदारु अङ्ग विभूषणं = पावन अंगों पर सजे दिव्य और भव्य आभूषण; आजानुभुज = घुटनों तक लंबी भुजाओं वाले (महाबली और शूरवीर); शर चाप धर = हाथों में बाण और कोदंड धनुष धारण करने वाले; संग्राम जित खरदूषणं = युद्ध में खर और दूषण जैसे महाभयंकर राक्षसों को जीतने वाले।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे वीर शिरोमणि प्रभु! आपके मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट, कानों में झिलमिलाते कुंडल और माथे पर तिलक अत्यंत सुशोभित हो रहा है। आपकी विशाल भुजाएं घुटनों तक लंबी हैं, जिनमें आपने दिव्य कोदंड धनुष और बाण धारण कर रखे हैं। आपने भीषण संग्राम में खर और दूषण जैसे दुर्जेय राक्षसों का एक ही क्षण में अंत कर दिया था। हे राम जी! हमारे अंतर्मन में भी काम, क्रोध और मोह रूपी कई राक्षस युद्ध कर रहे हैं; अपने पावन बाणों से हमारे इन आंतरिक विकारों का संहार कीजिए और हमारे मन को विजयी बनाइए।
इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं।
मम हृदय कञ्ज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनं॥
इति वदति = ऐसा कहते हुए प्रार्थना करते हैं; शंकर शेष मुनि मन रंजनं = भगवान शिव, शेषनाग और तपस्वी मुनियों के मनों को आनंद देने वाले; मम हृदय कञ्ज = मेरे हृदय रूपी कमल में; निवास कुरु = सदा के लिए वास कीजिए; कामादि खलदल गंजनं = काम, क्रोध, मद, लोभ रूपी दुष्ट शत्रुओं के दल का नाश करने वाले।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: गोस्वामी तुलसीदास जी हाथ जोड़कर विनय करते हैं कि हे देवाधिदेव शिव, शेषनाग और बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के ध्यान को आनंदित करने वाले प्रभु! आप काम, क्रोध और वासना रूपी राक्षसों की सेना का नाश करने वाले हैं। हे मेरे आराध्य प्रभु श्री राम! आप आकर सदा-सदा के लिए मेरे हृदय कमल में विराज जाइए। हे नाथ! जब तक आप मेरे दिल में रहेंगे, तब तक कोई भी बुराई या विपत्ति मुझे छू भी नहीं सकेगी; सदा मेरे हृदय में निवास कीजिए।
मनु जाहिं राचेउ मिलहि सो बरु सहज सुन्दर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥
एही भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली॥
राचेउ = जिस पर मन मोहित और समर्पित हो गया है; बरु = श्रेष्ठ वर (पति); सुजान = सर्वज्ञ, सब कुछ जानने वाले; सीलु सनेहु = आपका उत्तम शील और सच्चा प्रेम; गौरि असीस = माता पार्वती का दिव्य आशीर्वाद; सिय सहित अली = सीता जी और उनकी सखियां; मुदित मन = अत्यंत प्रसन्न चित्त होकर।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: यह प्रसंग रामचरितमानस के बालकांड का है, जहाँ जनकपुर के पुष्पवाटिका में माता सीता द्वारा पार्वती जी की पूजा करने पर माँ गौरी आकाशवाणी से वरदान देती हैं—”हे सीते! जिस सहज सुंदर सांवले स्वरूप श्री राम पर तुम्हारा मन रीझ गया है, वही तुम्हें वर के रूप में मिलेंगे। वे करुणा के भंडार और सर्वज्ञ हैं, जो तुम्हारे शील और निष्कपट प्रेम को भली-भांति जानते हैं।” माँ भवानी का ऐसा मंगलकारी आशीर्वाद सुनकर जानकी जी और उनकी सारी सखियां आनंद से खिल उठीं। सीता जी ने बार-बार माँ भवानी की पूजा की और प्रसन्न मन से राजमहल की ओर लौटीं। हे प्रभु! हम भी माता सीता और आपके इस पावन मिलन का ध्यान धरते हैं; हमारे जीवन को भी शुभता और मंगल से भर दीजिए।
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अङ्ग फरकन लगे॥
गौरि अनुकूल = माता पार्वती को अपने पक्ष में प्रसन्न जानकर; हिय हरषु = हृदय में छाई असीम खुशी; मंजुल मंगल मूल = अत्यंत सुंदर और शुभ शकुनों का मूल कारण; बाम अङ्ग फरकन लगे = स्त्रियों के लिए शुभ माना जाने वाला बायां अंग फड़कने लगा।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: माता भवानी को अपने अनुकूल जानकर श्री सीता जी के हृदय में जो असीम आनंद उमड़ा, उसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। भावी मंगल और प्रभु श्री राम से विवाह के शुभ संकेत के रूप में उनके सुंदर बाएं अंग फड़कने लगे। हे प्रभु श्री राम! जिस प्रकार माता जानकी के लिए यह क्षण परम मंगलकारी सिद्ध हुआ, उसी प्रकार हमारे जीवन में भी सभी अमंगलों का नाश कर मंगल ही मंगल का संचार कीजिए।
श्री राम स्तुति का रचयिता इतिहास व विनय पत्रिका का प्रामाणिक संदर्भ
‘श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन’ स्तुति का मूल स्रोत भक्तिकाल के शिरोमणि कवि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित अमर ग्रंथ गीताप्रेस गोरखपुर (Gita Press) द्वारा प्रकाशित ‘विनय पत्रिका’ (पद संख्या ४५) है। तुलसीदास जी ने जब कलियुग के त्रास और संताप से मुक्ति पाने के लिए भगवान श्री राम के दरबार में अपनी अर्जी (याचिका) लगाई थी, तब उन्होंने प्रभु के इस अनुपम शृंगार और दयालु रूप का मंगलाचरण गान किया था।
आरती संग्रहों में इस स्तुति के साथ रामचरितमानस के बालकांड के उस प्रसिद्ध दोहे और चौपाइयों (मनु जाहिं राचेउ…) को भी जोड़ा जाता है, जहाँ माता सीता पुष्पवाटिका में गौरी पूजन करती हैं। इस स्तुति की विशेषता यह है कि यह संस्कृत और ब्रज-अवधी के अत्यंत परिमार्जित छंद में रची गई है। इसके नियमित पाठ से मन के समस्त विकार—काम, क्रोध, मद और लोभ—नष्ट हो जाते हैं और साधक को प्रभु श्री राम के परम धाम की प्राप्ति होती है।

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श्री राम स्तुति से जुड़े मुख्य सवाल (FAQs)
1. ‘श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन’ स्तुति के रचयिता कौन हैं?
इस पावन स्तुति के रचयिता 16वीं सदी के महान संत गोस्वामी तुलसीदास जी हैं। यह स्तुति उनके प्रसिद्ध भक्ति ग्रंथ ‘विनय पत्रिका’ से ली गई है।
2. क्या इस स्तुति को आरती के रूप में गाया जा सकता है?
हाँ, सनातन परंपरा में रामायण पाठ, सुंदरकांड या किसी भी राम मंदिर में मुख्य आरती के तुरंत बाद ‘श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन’ का गान अत्यंत श्रद्धा के साथ किया जाता है।
3. ‘हरण भवभय दारुणं’ का क्या अर्थ है?
‘भव’ का अर्थ है संसार और ‘दारुणं’ का अर्थ है अत्यंत भयानक। इस पंक्ति का अर्थ है कि भगवान श्री राम इस संसार के आवागमन, मृत्यु और जीवन के समस्त भयंकर दुखों को जड़ से मिटाने वाले हैं।
4. इस स्तुति के साथ ‘मनु जाहिं राचेउ…’ पद क्यों गाया जाता है?
यह पद रामचरितमानस के बालकांड से है, जहाँ सीता जी द्वारा गौरी पूजन पर माता पार्वती उन्हें श्री राम को वर के रूप में पाने का आशीर्वाद देती हैं। यह पद मनोकामना पूर्ति और वैवाहिक सुख के लिए अत्यंत सिद्ध माना जाता है।
5. श्री राम स्तुति का पाठ करने का सबसे उत्तम समय कौन सा है?
प्रातःकाल सूर्योदय के समय, संध्या आरती के बाद या मंगलवार और रविवार को इसका पाठ करना विशेष रूप से फलदायी और मानसिक शांति देने वाला माना जाता है।
6. इस स्तुति के नियमित पाठ से क्या लाभ मिलता है?
तुलसीदास जी के अनुसार, इस स्तुति का श्रद्धा से पाठ करने पर मन के भीतर छिपे काम, क्रोध, मद और लोभ जैसे विकार नष्ट हो जाते हैं और साधक का मन स्थिर व शांत रहता है।
🙏 प्रभु श्री राम की इस पावन स्तुति को अपनों तक पहुंचाएं!
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धार्मिक एवं सामग्री डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी गोस्वामी तुलसीदास जी कृत ‘विनय पत्रिका’, ‘श्रीरामचरितमानस’ और गीताप्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संदर्भों पर आधारित है। इसका उद्देश्य प्रभु श्री राम की स्तुति के गूढ़ आध्यात्मिक भाव को सरल भाषा में जन-जन तक पहुंचाना है।
