Maa Baglamukhi पीले वस्त्रों में स्वर्ण गदा धारण करके असुर की जीभ पकड़ती हुईं, पीछे सुनहरी दिव्य आभा।

Maa Baglamukhi Aarti: (बगलामुखी माता ) शत्रु बाधा निवारण व मुक़दमे में विजय

सनातन धर्म में   माँ बगलामुखी आरती (Maa Baglamukhi) का नियमित गान जीवन के सबसे कठिन संकटों, अकारण सताने वाले विरोधियों और अज्ञात भय से मुक्ति पाने का सबसे अचूक माध्यम माना गया है। माता बगलामुखी दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या के रूप में पूजी जाती हैं। इन्हें भक्त बड़े प्रेम से ‘पीतांबरा माता’ भी पुकारते हैं, क्योंकि माता को पीला रंग अत्यंत प्रिय है।

जब सांसारिक जीवन में चारों ओर से निराशा घेर ले, झूठे मुकदमे या विरोधी परेशान कर रहे हों, तब सच्चे हृदय से माता के पावन रूप की आरती करने से हर विपत्ति शांत हो जाती है। यहाँ हम आपके लिए आरती का संपूर्ण मूल पाठ और उसके बाद प्रत्येक पद के स्वाभाविक वाक्यांशों का सरल अर्थ व संवादात्मक भावार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं।

Table of Contents

त्वरित तथ्य (Quick Facts): माँ बगलामुखी आरती

  • अन्य पावन नाम: पीतांबरा माता, ब्रह्मास्त्र विद्या, वल्गामुखी।
  • स्थान व स्वरूप: दस महाविद्या (Das Mahavidya) में आठवीं शक्ति।
  • प्रामाणिक रचयिता: प्रसिद्ध भक्त-कवि कुलपति मिश्र (पारंपरिक स्तुति परंपरा)।
  • प्रिय रंग व सामग्री: पीला वस्त्र, पीला कनेर पुष्प, हल्दी की माला, पीला चंदन व बेसन भोग।
  • मुख्य प्रभाव: शत्रु स्तंभन (शत्रु की कुटिल बुद्धि व वाणी को शांत करना), मुकदमों में विजय व भय-मुक्ति।

प्राकट्य व पौराणिक इतिहास: तूफान का स्तंभन और मदासुर का उद्धार

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सतयुग में एक बार पूरी सृष्टि पर भीषण महातूफान आया। इससे ब्रह्मांड के नष्ट होने का संकट खड़ा हो गया। तब भगवान विष्णु ने सौराष्ट्र के पवित्र हरिद्रा सरोवर (हल्दी के सरोवर) तट पर घोर तपस्या की। उनकी पुकार पर सरोवर से माता बगलामुखी साक्षात प्रकट हुईं और उन्होंने पल भर में उस विनाशकारी तूफान को रोक दिया।

माता के प्राकट्य के बाद ‘मदासुर’ (मदन) नाम के दैत्य ने अपनी वाक्-सिद्धि के घमंड में संतों और देवताओं पर अत्याचार शुरू कर दिया। वह अपनी वाणी से जो भी बोलता, वही अनिष्ट घट जाता। संसार को उसके उत्पात से बचाने के लिए माता बगलामुखी ने अपने बाएं हाथ से उस असुर की जीभ खींच ली (जिह्वा कीलन) और दाएं हाथ के मुद्गर से उसके अहंकार का दमन किया।

मृत्यु से पहले जब उस असुर की बुद्धि शुद्ध हुई, तो उसने पश्चाताप करते हुए माता के चरणों में रहने की प्रार्थना की। दयामयी माता ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर उसे अपने चरणों में स्थान दिया। इसी कारण माता के हर चित्र में वह असुर उनके पावन चरणों में दिखाई देता है। यह कथा सिखाती है कि माता अहंकार का नाश करती हैं और शरणागत की सदा रक्षा करती हैं।

॥ श्री बगलामुखी माता जी की आरती (मूल पाठ) ॥

जय जय श्री बगलामुखी माता, आरति करहुँ तुम्हारी।
पीत वसन तन पर तव सोहै, कुण्डल की छबि न्यारी॥
कर-कमलों में मुद्गर धारै, अस्तुति करहिं सकल नर-नारी॥
जय जय श्री बगलामुखी माता…॥

चम्पक माल गले लहरावे, सुर नर मुनि जय जयति उचारी।
त्रिविध ताप मिटि जात सकल सब, भक्ति सदा तव है सुखकारी॥
जय जय श्री बगलामुखी माता…॥

पालत हरत सृजत तुम जग को, सब जीवन की हो रखवारी।
मोह निशा में भ्रमत सकल जन, करहु हृदय महँ, तुम उजियारी॥
जय जय श्री बगलामुखी माता…॥

तिमिर नशावहु ज्ञान बढ़ावहु, अम्बे तुमही हो असुरारी।
सन्तन को सुख देत सदा ही, सब जन की तुम प्राण पियारी॥
जय जय श्री बगलामुखी माता…॥

तव चरणन जो ध्यान लगावै, ताको हो सब भव-भयहारी।
प्रेम सहित जो करहिं आरती, ते नर मोक्षधाम अधिकारी॥
जय जय श्री बगलामुखी माता…॥

॥ दोहा ॥
बगलामुखी की आरती, पढ़ै सुनै जो कोय।
विनती कुलपति मिश्र की, सुख-सम्पति सब होय॥

क्या आप जानते हैं कि पूजा के बाद आरती क्यों की जाती है और थाल को 14 बार ही क्यों घुमाते हैं?

आरती के पीछे छिपे गहरे वैदिक इतिहास और वैज्ञानिक रहस्य को विस्तार से समझने के लिए हमारा यह विशेष लेख अवश्य पढ़ें:

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आरती का पद-वार संपूर्ण पाठ, सरल अर्थ व संवादात्मक भावार्थ

जय जय श्री बगलामुखी माता, आरति करहुँ तुम्हारी।
पीत वसन तन पर तव सोहै, कुण्डल की छबि न्यारी॥
कर-कमलों में मुद्गर धारै, अस्तुति करहिं सकल नर-नारी॥
जय जय श्री बगलामुखी माता…॥

पंक्तियों का सरल अर्थ:

  • आरति करहुँ तुम्हारी: मैं पूरी श्रद्धा और प्रेम से आपकी पावन आरती उतार रहा हूँ।
  • पीत वसन: सुंदर पीले वस्त्र।
  • तन पर तव सोहै: आपके पावन शरीर पर बहुत सुंदर लग रहे हैं और शोभा पा रहे हैं।
  • कुण्डल की छबि न्यारी: कानों में झिलमिलाते कुंडल की चमक सबसे अनोखी और मनमोहक है।
  • कर-कमलों में: कमल के फूल जैसे अत्यंत कोमल हाथों में।
  • मुद्गर धारै: (शत्रुओं का अहंकार व बुराई तोड़ने वाला) भारी अस्त्र धारण किया हुआ है।
  • अस्तुति करहिं सकल नर-नारी: संसार के सभी स्त्री-पुरुष मिलकर आपकी स्तुति और वंदना करते हैं।

संवादात्मक भावार्थ (भक्त की सीधी प्रार्थना): हे मेरी करुणामयी माँ बगलामुखी! मैं दोनों हाथ जोड़कर सच्चे हृदय से आपकी पावन आरती उतार रहा हूँ। हे माँ, आपके सुंदर दिव्य स्वरूप पर चमकीले पीले वस्त्र कितने सुहावने लग रहे हैं और कानों में झिलमिलाते कुंडल की शोभा तो सबसे अनोखी है। आपके कमल जैसे कोमल हाथों में बुराई का अंत करने वाला मुद्गर सुशोभित है, और संसार के सभी नर-नारी शीश झुकाकर आपकी स्तुति करते हैं। हे दयालु माँ, मुझ नादान पर भी अपनी अमृतमयी दृष्टि बनाए रखना और हर संकट से मेरी रक्षा करना।

चम्पक माल गले लहरावे, सुर नर मुनि जय जयति उचारी।
त्रिविध ताप मिटि जात सकल सब, भक्ति सदा तव है सुखकारी॥
जय जय श्री बगलामुखी माता…॥

पंक्तियों का सरल अर्थ:

  • चम्पक माल गले लहरावे: आपके गले में पीले चंपा के सुगंधित फूलों की सुंदर माला लहरा रही है।
  • सुर नर मुनि: स्वर्ग के देवता, धरती के मानव और वनों के तपस्वी ऋषि।
  • जय जयति उचारी: सब मिलकर एक स्वर में आपकी जय-जयकार पुकार रहे हैं।
  • त्रिविध ताप: मानव जीवन को सताने वाले तीनों बड़े कष्ट (शारीरिक बीमारियाँ, प्राकृतिक आपदाएँ और मानसिक उलझनें)।
  • मिटि जात सकल सब: हमेशा के लिए जड़ से समाप्त हो जाते हैं।
  • भक्ति सदा तव है सुखकारी: आपकी निरंतर की जाने वाली सच्ची भक्ति परम सुख और शांति देने वाली है।

संवादात्मक भावार्थ (भक्त की सीधी प्रार्थना): हे पीतांबरा भवानी! आपके गले में पीले चंपा के फूलों की महकती माला लहरा रही है। स्वर्ग के देवता, धरती के साधारण मनुष्य और वनों के तपस्वी मुनि—सभी एक स्वर में आपकी जय-जयकार पुकार रहे हैं। हे माँ, आपकी सच्ची भक्ति करने से जीवन के तीनों ताप (शारीरिक रोग, मानसिक चिंताएं और सांसारिक अड़चनें) हमेशा के लिए मिट जाते हैं। हे माँ, मुझे भी अपनी निष्काम भक्ति का वरदान दीजिए ताकि मेरा जीवन सदा सुखी और शांत बना रहे।

पालत हरत सृजत तुम जग को, सब जीवन की हो रखवारी।
मोह निशा में भ्रमत सकल जन, करहु हृदय महँ, तुम उजियारी॥
जय जय श्री बगलामुखी माता…॥

पंक्तियों का सरल अर्थ:

  • पालत हरत सृजत तुम जग को: इस पूरे संसार का पालन-पोषण करना, संहार करना और नई रचना करना—सब आपके हाथों में है।
  • सब जीवन की हो रखवारी: संसार के समस्त छोटे-बड़े जीवों की रक्षा करने वाली आप ही हैं।
  • मोह निशा में: अज्ञान, लालच और मोह-माया रूपी अंधेरी रात में।
  • भ्रमत सकल जन: संसार के सभी साधारण मनुष्य रास्ता भटक रहे हैं।
  • करहु हृदय महँ, तुम उजियारी: हमारे अंतःकरण के भीतर ज्ञान और सद्बुद्धि की दिव्य रोशनी फैला दीजिए।

संवादात्मक भावार्थ (भक्त की सीधी प्रार्थना): हे परमेश्वरी! इस पूरे संसार को रचने वाली, इसका पालन-पोषण करने वाली और समय आने पर इसे अपने भीतर समेट लेने वाली साक्षात आप ही हैं। संसार के सभी छोटे-बड़े प्राणियों की रक्षा का भार आपके ही करुणामयी हाथों में है। हे माँ, हम संसारी जीव माया, अज्ञान और लालच की अंधेरी रात में भटक रहे हैं। कृपा करके मेरे हृदय के अंदर ज्ञान और सद्बुद्धि का उजाला फैला दीजिए, ताकि मेरा मन कभी भी भटककर गलत रास्ते पर न जाए।

तिमिर नशावहु ज्ञान बढ़ावहु, अम्बे तुमही हो असुरारी।
सन्तन को सुख देत सदा ही, सब जन की तुम प्राण पियारी॥
जय जय श्री बगलामुखी माता…॥

पंक्तियों का सरल अर्थ:

  • तिमिर नशावहु: हमारे भीतर और बाहर के अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट कर दीजिए।
  • ज्ञान बढ़ावहु: सत्य और धर्म को समझने की सच्ची बुद्धि का विस्तार कीजिए।
  • अम्बे तुमही हो असुरारी: हे माँ अम्बे! आप ही अन्यायी दानवों और दुष्ट प्रवृत्तियों का अंत करने वाली हैं।
  • सन्तन को सुख देत सदा ही: धर्म के सीधे रास्ते पर चलने वाले भले लोगों को आप हमेशा सुख देती हैं।
  • सब जन की तुम प्राण पियारी: संसार के सभी भक्तों को आप अपने प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं।

संवादात्मक भावार्थ (भक्त की सीधी प्रार्थना): हे अम्बे भवानी! मेरे अंतःकरण से अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर सही ज्ञान का विस्तार कीजिए। आप ही अत्याचार करने वाली दुष्ट शक्तियों का संहार करने वाली ‘असुरारी’ हैं। आप धर्म के मार्ग पर चलने वाले भले लोगों को सदा परम सुख देती हैं और संसार के सभी भक्त आपको अपने प्राणों से भी बढ़कर मानते हैं। हे माँ, मेरी भी पुकार सुनिए और मुझे हर बुरी संगत, बुरी नज़र और नकारात्मकता से बचाइए।

तव चरणन जो ध्यान लगावै, ताको हो सब भव-भयहारी।
प्रेम सहित जो करहिं आरती, ते नर मोक्षधाम अधिकारी॥
जय जय श्री बगलामुखी माता…॥

पंक्तियों का सरल अर्थ:

  • तव चरणन जो ध्यान लगावै: जो भी भक्त आपके पावन चरणों में अपना मन एकाग्र करता है।
  • ताको हो सब भव-भयहारी: आप उसके जीवन के हर भय, चिंता और मृत्यु के डर को हमेशा के लिए हर लेती हैं।
  • प्रेम सहित जो करहिं आरती: जो भी पूर्ण श्रद्धा और सच्चे प्रेम के साथ आपकी यह आरती करता है।
  • ते नर मोक्षधाम अधिकारी: वे सभी मनुष्य इस संसार के बंधनों से मुक्त होकर परम मोक्ष पाने के सच्चे हकदार बन जाते हैं।

संवादात्मक भावार्थ (भक्त की सीधी प्रार्थना): हे जगदंबे! जो भी मनुष्य निष्काम भाव से आपके पावन चरणों में अपना ध्यान लगाता है, आप उसके जीवन के हर डर, चिंता और सांसारिक कष्ट को हमेशा के लिए हर लेती हैं। जो भी भक्त पूर्ण प्रेम और श्रद्धा के साथ आपकी यह दिव्य आरती करता है, वह इस नश्वर संसार के बंधनों से छूटकर परम मोक्ष का अधिकारी बन जाता है। हे माता, मैं भी आपके चरणों में शीश झुकाता हूँ, मुझे अपनी पावन छाया में स्थान दीजिए।

॥ दोहा ॥
बगलामुखी की आरती, पढ़ै सुनै जो कोय।
विनती कुलपति मिश्र की, सुख-सम्पति सब होय॥

पंक्तियों का सरल अर्थ:

  • बगलामुखी की आरती, पढ़ै सुनै जो कोय: जो कोई भी श्रद्धालु माता बगलामुखी की इस पावन आरती को नियम से पढ़ता या ध्यान से सुनता है।
  • विनती कुलपति मिश्र की: इस पावन आरती के पारंपरिक रचयिता भक्त कुलपति मिश्र जी विनम्र प्रार्थना करते हैं कि…
  • सुख-सम्पति सब होय: उस भक्त के घर-परिवार में मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और शुभ समृद्धि का वास अपने आप हो जाता है।

संवादात्मक भावार्थ (भक्त की सीधी प्रार्थना): हे माँ बगलामुखी! आपके परम भक्त कुलपति मिश्र जी विनती करते हुए कहते हैं कि जो कोई भी श्रद्धालु आपकी इस पावन आरती को भक्तिभाव से पढ़ता है अथवा एकाग्र मन से सुनता है, उसके घर-परिवार में सभी प्रकार के सुख, शांति, सुरक्षा और समृद्धि का वास होता है। हे माँ, हमारे घर-आँगन पर भी अपनी यह कृपादृष्टि सदैव बनाए रखना।

माँ बगलामुखी मूल मंत्र व बीज मंत्र (Baglamukhi Beej Mantra)

माता बगलामुखी का सबसे शक्तिशाली और प्रामाणिक एकाक्षरी बीज मंत्र ‘ह्लीं’ (Hleem) है। शास्त्रों के अनुसार, इस एक बीज मंत्र में संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा और शत्रुओं की कुटिल बुद्धि को शांत करने की अपार शक्ति समाई हुई है। जो साधक या भक्त नियमित रूप से माता की आरती के बाद इस पावन मंत्र का जप करते हैं, उन्हें हर संकट में माता का दिव्य सुरक्षा कवच प्राप्त होता है।

सिद्ध बगलामुखी मूल मंत्र:

“ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलय बुद्धि विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा।”

सरल भावार्थ: हे माँ बगलामुखी! जो दुष्ट या विरोधी अकारण मुझे कष्ट पहुँचाना चाहते हैं, आप उनकी बुरी वाणी, मुख और पैरों को रोक दीजिए (स्तंभन कर दीजिए)। उनकी कटु जीभ को कीलित कर दीजिए और उनकी कुटिल बुद्धि का नाश कर दीजिए। हे माँ, अपने इस पावन मंत्र से मेरी और मेरे परिवार की सदैव रक्षा कीजिए।

मंत्र जप के मुख्य लाभ:

  • झूठे मुकदमों, कोर्ट-कचहरी और विवादों में विजय की प्राप्ति।
  • अज्ञात भय, डिप्रेशन और मानसिक तनाव से तुरंत मुक्ति।
  • व्यापार और कार्यक्षेत्र में विरोधियों की षड्यंत्रकारी बाधाओं का शमन।
  • वाणी में प्रभाव और आत्मविश्वास (वाक सिद्धि) का संचार।

सही पूजन विधि व नियम (Puja Vidhi & Rules)

शास्त्रों के अनुसार माँ बगलामुखी (Pitambara Mata) की पूजा अत्यंत पवित्रता और सजगता के साथ की जाती है। यदि आप घर पर माता की आरती और सरल पूजन कर रहे हैं, तो इन प्रमुख नियमों का पालन अवश्य करें:

  1. पीले रंग का अनिवार्य प्रयोग: पूजा के समय स्वयं पीले वस्त्र धारण करें। माता के पावन रूप को भी पीली चुनरी, पीला आसन और पीला चंदन अर्पित करें।
  2. दिशा व आसन: पूजा के लिए पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। बैठने के लिए पीले रंग के ऊनी आसन का ही उपयोग करें।
  3. दीपक व अगरबत्ती: माता के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें।
  4. प्रिय नैवेद्य (भोग): माता को बेसन के लड्डू, चने की दाल में गुड़ मिलाकर, पीले केले अथवा बूंदी का भोग लगाएं।
  5. हल्दी की गांठ व माला: माता की पूजा में हल्दी की गांठ विशेष रूप से अर्पित की जाती है। यदि मंत्र जप कर रहे हैं, तो हल्दी की सिद्ध माला का उपयोग करें।
  6. आरती का समय: Maa Baglamukhi Aarti का गान रात्रि के समय (विशेषकर 9:00 बजे के बाद) करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।
  7. संकल्प व क्षमा प्रार्थना: पूजा आरंभ करने से पहले हाथ में जल लेकर अपनी मनोकामना का संकल्प लें और पूजा के अंत में भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs) व PAA

1. माता बगलामुखी की पूजा और आरती किस दिन करनी चाहिए?

माता बगलामुखी की आरती और सरल पूजा मुख्य रूप से गुरुवार (Thursday) के दिन करना सबसे अधिक शुभ और फलदायी माना जाता है। इसके अलावा नवरात्रि, गुप्त नवरात्रि और बगलामुखी जयंती (वैशाख शुक्ल अष्टमी) पर की गई पूजा विशेष फल प्रदान करती है।

2. बगलामुखी आरती पढ़ने का सबसे सही समय क्या है?

Maa Baglamukhi Aarti और मंत्र जप के लिए सबसे उत्तम समय रात्रि काल माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार रात्रि 9:00 बजे से मध्यरात्रि 12:00 बजे का समय सबसे प्रभावशाली होता है, क्योंकि रात्रि की शांति में की गई स्तुति तुरंत एकाग्रता और सिद्धि देती है।

3. कोर्ट-कचहरी और मुकदमों में जीत के लिए क्या उपाय करें?

झूठे मुकदमों और कानूनी विवादों में विजय पाने के लिए भक्त निम्नलिखित सरल विधि अपनाते हैं:

  • प्रति गुरुवार पीले कपड़े पहनकर माता की आरती करें।
  • माता को 8 हल्दी की साबुत गांठें और पीले कनेर के पुष्प अर्पित करें।
  • आरती के बाद माता के बीज मंत्र ‘ह्लीं’ का कम से कम 108 बार हल्दी की माला से जप करें।
  • माता से सत्य और न्याय की रक्षा के लिए प्रार्थना करें।

4. बगलामुखी माता का बीज मंत्र क्या है और इसके क्या लाभ हैं?

माता बगलामुखी का एकाक्षरी बीज मंत्र ‘ह्लीं’ (Hleem) है। इसके नित्य स्मरण से साधक को निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:

  • शत्रुओं की बुरी बुद्धि और ईर्ष्या का शमन होता है।
  • हर प्रकार के अकारण भय और घबराहट से स्थायी सुरक्षा मिलती है।
  • व्यक्ति के आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता में अद्भुत वृद्धि होती है।

5. क्या गृहस्थ लोग घर पर बगलामुखी माता की पूजा कर सकते हैं?

हाँ, गृहस्थ जन अपने घर के पूजा स्थान में माता के सौम्य रूप का चित्र रखकर पूरी श्रद्धा से दीपक जला सकते हैं, आरती गा सकते हैं और सात्विक प्रार्थना कर सकते हैं। केवल उग्र तांत्रिक अनुष्ठान ही घर में बिना गुरु के नहीं करने चाहिए।

6. माँ बगलामुखी की पूजा में किन सावधानियों का पालन करना चाहिए?

माता की साधना और पूजा में इन विशेष सावधानियों का ध्यान रखना अनिवार्य है:

  • मन में किसी निर्दोष व्यक्ति के अहित की भावना रखकर कभी पूजा न करें।
  • पूजा के दिनों में पूर्ण सात्विक आहार लें; लहसुन, प्याज, मांस व मदिरा से दूर रहें।
  • पूजा के दौरान काले या नीले रंग के वस्त्र भूलकर भी धारण न करें।
  • पवित्रता, सत्यवादिता और ब्रह्मचर्य के नियमों का यथासंभव पालन करें।

7. माता बगलामुखी को ‘पीतांबरा’ क्यों कहा जाता है?

माता बगलामुखी को पीला रंग अत्यंत प्रिय है। माता पीले वस्त्र धारण करती हैं, हल्दी के सरोवर से प्रकट हुई हैं और पीले पुष्प ही स्वीकार करती हैं। ‘पीत’ का अर्थ पीला और ‘अंबरा’ का अर्थ वस्त्र होता है, इसलिए माता को प्रेम से ‘पीतांबरा’ कहा जाता है।

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अस्वीकरण (Disclaimer): यह रचना सनातन लोक-परंपरा का हिस्सा है और इसका प्रसार किसी एक निश्चित पांडुलिपि के बजाय मौखिक परंपरा व गुरु-शिष्य पाठ के माध्यम से हुआ है। मौखिक परंपरा के कारण विभिन्न मुद्रित पुस्तकों व प्रकाशित संस्करणों में इसके शब्दों या छंद-क्रम में मामूली अंतर दिखाई दे सकते हैं। यहाँ दिया गया पाठ सामान्य रूप से प्रचलित व प्रामाणिक स्वरूप का अनुसरण करता है; श्रद्धालु अपने परिवार, कुल-परंपरा या क्षेत्रीय रीति के अनुसार किसी शब्द या वाक्यांश को समायोजित करने के लिए स्वतंत्र हैं। मंदिर व अनुष्ठान संबंधी नियमों में समय-समय पर व्यवस्थापक द्वारा परिवर्तन संभव है।

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