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श्री संतोषी माता जी की आरती: गुड़-चना भोग, शुक्रवार व्रत व सही आरती विधि

सनातन लोक-परंपरा में शुक्रवार का दिन मन में शांति, धैर्य और संतोष भरने वाली देवी माँ संतोषी को समर्पित माना जाता है। श्री संतोषी माता जी की आरती यानी ‘ॐ जय संतोषी माता’ हर उस साधक के लिए एक गहरा आध्यात्मिक संबल है, जो सांसारिक दौड़-भाग और अभावों के बीच मानसिक संतोष पाना चाहता है। लोक-आस्था में माँ संतोषी को प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश जी की पुत्री माना जाता है, जो किसी महंगे अनुष्ठान या कठिन कर्मकांड की नहीं, बल्कि केवल सच्चे भाव, थोड़े से गुड़ और भुने चने के सरल भोग से ही तृप्त हो जाती हैं।

अक्सर श्रद्धालु शुक्रवार के 16 व्रत रखकर कथा और आरती तो करते हैं, लेकिन इसके वास्तविक उद्भव, लोक-कथा और खटाई निषेध के गहरे आध्यात्मिक मर्म को नहीं समझ पाते। इस प्रामाणिक लेख में हमने पाठकों की सुविधा के लिए पहले पूरी आरती का मूल पाठ A4 प्रिंटेबल स्वरूप में दिया है, जिसे आप सीधे प्रिंट कर सकते हैं। इसके बाद हर पद के कठिन शब्दों के सरल अर्थ, माँ के चरणों में समर्पित प्रार्थना-भाव और इसके ऐतिहासिक व लोक-धार्मिक तथ्यों की विस्तृत जानकारी दी गई है।

Table of Contents

माँ संतोषी: ऐतिहासिक तथ्य, लोक-मान्यता व व्रत परिचय

  • पहचान व स्वरूप: लोक-आस्था के अनुसार भगवान श्री गणेश और माता रिद्धि-सिद्धि की पुत्री, जो जीवन में संतोष, धैर्य और पारिवारिक खुशहाली प्रदान करती हैं।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: माँ संतोषी का उल्लेख प्राचीन संस्कृत महापुराणों में नहीं मिलता; इनका प्राकट्य 1960 के दशक में उत्तर भारत (विशेषकर राजस्थान) में शुक्रवार व्रत-पुस्तिकाओं (लोक-साहित्य) और महिला भक्तों की मौखिक परंपरा से हुआ।
  • माता का पावन स्वरूप: चार भुजाओं वाली करुणामयी देवी, जो स्वर्ण सिंहासन पर लाल-सुनहरे वस्त्रों में विराजती हैं और मंद मुस्कान से भक्तों को अभयदान देती हैं।
  • प्रिय भोग व प्रसाद: गुड़ और भुना हुआ चना (सात्विक, अत्यंत सुलभ और आडंबर-रहित भोग)।
  • शुक्रवार व्रत का अनिवार्य नियम: 16 शुक्रवार के व्रत में खट्टी चीजें (दही, नींबू, इमली, आमचूर) खाना, छूना या घर में लाना पूर्णतः वर्जित माना गया है।
  • आरती का सबसे उत्तम समय: शुक्रवार के दिन सूर्योदय के समय पूजन में और संध्याकाल में व्रत कथा समाप्ति के तुरंत बाद।

॥ श्री संतोषी माता जी की आरती (मूल पाठ) ॥

(शुक्रवार व्रत, पूजा व नित्य पाठ हेतु शुद्ध एवं प्रामाणिक स्वरूप)

ॐ जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन को, सुख सम्पति दाता॥ ॐ जय संतोषी माता…॥

सुंदर चीर सुनहरी, मां धारण कीन्हो।
हीरा पन्ना दमके, तन शृंगार लीन्हो॥ ॐ जय संतोषी माता…॥

गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे।
मंद हँसत करुणामयी, त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय संतोषी माता…॥

स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरे प्यारे।
धूप, दीप, मधुमेवा, भोग धरें न्यारे॥ ॐ जय संतोषी माता…॥

गुड़ अरु चना परमप्रिय, तामे संतोष कियो।
संतोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो॥ ॐ जय संतोषी माता…॥

शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही।
भक्त मण्डली छाई, कथा सुनत मोही॥ ॐ जय संतोषी माता…॥

मंदिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई।
विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई॥ ॐ जय संतोषी माता…॥

भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै।
जो मन बसे हमारे, इच्छा फल दीजै॥ ॐ जय संतोषी माता…॥

दुखी, दरिद्री, रोगी, संकटमुक्त किए।
बहु धन-धान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए॥ ॐ जय संतोषी माता…॥

ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो।
पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो॥ ॐ जय संतोषी माता…॥

शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदंबे।
संकट तू ही निवारे, दयामयी अंबे॥ ॐ जय संतोषी माता…॥

संतोषी मां की आरती, जो कोई नर गावे।
ऋद्धि-सिद्धि सुख संपत्ति, जी भरकर पावे॥ ॐ जय संतोषी माता…॥

श्री संतोषी माता जी की आरती: पदवार शब्दार्थ व भक्ति-प्रार्थना भावार्थ

ॐ जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।

अपने सेवक जन को, सुख संपत्ति दाता॥

संतोषी = मन की तृष्णा मिटाकर सच्चा संतोष देने वाली माँ; सेवक जन = आपके द्वार पर आए हम साधारण भक्त; सुख सम्पति दाता = आत्मिक शांति और जीवन में बरकत देने वाली देवी।

भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे माँ संतोषी! हे दयालु मैया! आपकी सदा ही जय हो। आप अपने चरणों में निष्कपट भाव से शीश नवाने वाले हर दीन-दुखी भक्त को सच्चा सुख, शांति और समृद्धि देने वाली हैं। हे माँ! दुनिया के लालच और भागदौड़ में भटकते हुए हम आपके पावन द्वार पर आए हैं; हमारे मन से असंतोष, ईर्ष्या और चिंताओं को मिटाकर हमें अपने चरणों की निश्चल भक्ति और शांति प्रदान कीजिए।

सुंदर चीर सुनहरी, मां धारण कीन्हो।

हीरा पन्ना दमके, तन शृंगार लीन्हो॥

चीर सुनहरी = सोने की जरी वाली सुंदर लाल-पीली चुनरी व परिधान; हीरा पन्ना दमके = बहुमूल्य रत्नों की अलौकिक चमक; तन शृंगार लीन्हो = पावन देह पर दिव्य आभूषण सुशोभित हैं।

भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे माँ जगदम्बे! आपके पावन स्वरूप पर सुनहरी ज़री की चुनरी और दिव्य वस्त्र अत्यंत सुशोभित हो रहे हैं। आपके आभूषणों में हीरे और पन्ने ऐसे दमक रहे हैं मानो साक्षात प्रकृति का सारा सौंदर्य आपके चरणों में नतमस्तक हो। हे मैया! अपने इस मनमोहक स्वरूप का थोड़ा सा उजाला हमारे अज्ञान भरे जीवन में भी भर दीजिए, ताकि हमारे घर का हर कोना आपकी कृपा से जगमगा उठे।

गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे।

मंद हँसत करुणामयी, त्रिभुवन जन मोहे॥

गेरू लाल छटा = पवित्र लाल और सिंदूरी रंग की पावन आभा; बदन कमल = कमल के फूल जैसा कोमल, निर्मल व सुंदर मुखमंडल; मंद हँसत = होठों पर छाई ममतामयी मुस्कान; त्रिभुवन जन मोहे = तीनों लोकों के जीवों का दुख हरने वाली मनमोहक छवि।

भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे करुणामयी माँ! आपका मुख कमल के फूल जैसा पवित्र और सुंदर है, जिस पर सिंदूरी लाल रंग की आभा दमक रही है। आपके होठों की शांत और मीठी मुस्कान तीनों लोकों के जीवों का मन मोह लेती है और सारे भय मिटा देती है। हे माँ! अपनी वही ममता भरी दृष्टि एक बार हमारी ओर भी कर दीजिए; आपकी एक ही कृपा-दृष्टि हमारे जीवन के सारे दुखों और मानसिक तनावों को पल भर में दूर कर देगी।

स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरे प्यारे।

धूप, दीप, मधुमेवा, भोग धरें न्यारे॥

स्वर्ण सिंहासन = सोने का दिव्य आसन; चंवर ढुरे = श्रद्धा से चंवर डुलाए जा रहे हैं; मधुमेवा = शहद और सूखे मेवे; भोग धरें न्यारे = प्रेम से सजाए गए विविध सात्विक नैवेद्य।

भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे माँ! आप सोने के दिव्य सिंहासन पर राजराजेश्वरी रूप में विराजती हैं और भक्तगण प्रेम से आप पर चंवर डुला रहे हैं। आपके आगे धूप, दीप और मेवों के सुंदर भोग सजाए गए हैं। हे माँ! हमारे पास कोई बड़ा राजसी वैभव तो नहीं है, पर जो भी थोड़ा सा प्रेम और सच्ची निष्ठा हमारे पास है, हम आपके चरणों में रखते हैं; हमारी इस तुच्छ भेंट को स्वीकार कर हमारे घर को पावन बना दीजिए।

गुड़ अरु चना परमप्रिय, तामे संतोष कियो।

संतोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो॥

गुड़ अरु चना = साधारण गुड़ और भुना हुआ चना; तामे संतोष कियो = उसी सीधे-सादे प्रसाद में पूरी तरह संतुष्ट हो गईं; संतोषी कहलाई = संतोष की देवी के नाम से पूजी गईं; वैभव दियो = भक्तों को अखंड सुख और संपन्नता प्रदान की।

भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे माँ संतोषी! आपकी दया सचमुच कितनी अनोखी है! जहाँ संसार महँगे उपहारों और दिखावे का भूखा है, वहीं आप गरीब से गरीब भक्त के लाए हुए सवा आने के गुड़ और चने से ही पूरी तरह तृप्त हो जाती हैं। इसी सादगी के कारण आप ‘संतोषी’ कहलाईं और बदले में अपने भक्तों को अक्षय सुख और मान-सम्मान दे दिया। हे माँ! हमारे लाए इस सीधे-सादे गुड़-चने के भोग को स्वीकार कीजिए और हमारे जीवन में भी संतोष की मिठास भर दीजिए।

शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही।

भक्त मण्डली छाई, कथा सुनत मोही॥

शुक्रवार प्रिय मानत = शुक्रवार का दिन आपकी पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है; दिवस सोही = आज वही शुभ दिन उपस्थित है; भक्त मण्डली = श्रद्धालुओं का समूह; कथा सुनत मोही = प्रेम में मग्न होकर आपकी व्रत कथा सुन रहे हैं।

भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे माँ! शुक्रवार का यह पावन दिन आपकी आराधना के लिए सबसे फलदायी है और आज वही शुभ दिन आया है। आपकी भक्त मण्डली एक साथ बैठकर पूरी निष्ठा से आपकी व्रत कथा का श्रवण कर रही है। हे मैया! इस कथा को सुनते और आपकी आरती गाते समय हमारा मन भी सांसारिक चिंताओं से हटकर केवल आपके चरणों में लीन हो जाए, ऐसा सच्चा अनुराग हमारे भीतर जगा दीजिए।

मंदिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई।

विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई॥

जगमग ज्योति = शुद्ध घी और कपूर के दीपकों की पावन रोशनी; मंगल ध्वनि = शंख, घंटियों और जयकारों की गूंज; विनय करें = हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं; सिर नाई = आपके पावन चरणों में मस्तक झुकाकर।

भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे जगजननी माँ! आपके मंदिर में दीपकों की पावन ज्योति जगमगा रही है और शंख-घंटियों की मंगल ध्वनि से पूरा वातावरण गूंज रहा है। हम सभी आपके नादान बालक हाथ जोड़कर आपके पावन चरणों में अपना सिर झुकाते हैं। हे माँ! हमारे सारे अवगुणों को भुलाकर हमें अपने वात्सल्य का आशीर्वाद दीजिए और हमारे परिवार की हर विपत्ति से रक्षा कीजिए।

भक्तिभावमय पूजा, अंगीकृत कीजै।

जो मन बसे हमारे, इच्छा फल दीजै॥

भक्ति भावमय = प्रेम और सच्ची आस्था से भरी हुई; अंगीकृत कीजै = अपनी दया से स्वीकार कीजिए; इच्छा फल दीजै = हमारे मन की नेक और शुभ कामनाओं को पूरा कीजिए।

भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे माँ! हम किसी कठिन तंत्र या बड़े कर्मकांड को नहीं जानते, हमने तो बस सीधे-सादे भाव और सच्चे प्रेम से आपकी यह पूजा की है; कृपया इसे स्वीकार कर लीजिए। हमारे हृदय में परिवार की खुशहाली और शांति की जो भी नेक इच्छाएं हैं, उन्हें अपनी कृपा से पूरा कर दीजिए और हमें सदा धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति दीजिए।

दुखी, दरिद्री, रोगी, संकटमुक्त किए।

बहु धन-धान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए॥

दुखी, दरिद्री, रोगी = परेशान, साधनहीन और बीमारियों से पीड़ित लोग; संकटमुक्त किए = सभी कष्टों से मुक्ति दिलाई; धन-धान्य भरे घर = घरों में अन्न और बरकत भर दी; सुख सौभाग्य = अखंड खुशहाली और सम्मान।

भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे दीनदयालु माँ! आपने सदा से परेशान लोगों का दुख मिटाया, गरीबों की दरिद्रता दूर की और बीमार लोगों को निरोगी काया दी है। जिस घर पर भी आपकी दया हुई, वहाँ अन्न-धन की कभी कमी नहीं रही और सुख-सौभाग्य का वास हुआ। हे माँ! हमारे घर में भी यदि कोई तंगी, बीमारी या तनाव है, तो उसे अपनी दया से दूर कर दीजिए और हमारे परिवार को सदा खुशहाल रखिए।

ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो।

पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो॥

ध्यान धर्यो = सच्चे मन से आपका स्मरण किया; मनवांछित फल = मनचाही शुभ मुरादें; कथा श्रवण कर = शुक्रवार व्रत कथा को ध्यानपूर्वक सुनकर; घर आनंद आयो = परिवार में शांति और उल्लास भर गया।

भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे माँ! जिसने भी एकाग्र मन से आपके पावन स्वरूप का ध्यान किया, आपने कभी उसकी झोली खाली नहीं रहने दी। जिस घर में भी आपकी पावन कथा सुनी जाती है और आरती गाई जाती है, वहाँ से कलह और अशांति दूर हो जाती है और केवल आनंद का वास होता है। हे माँ! हमारे घर में भी हमेशा ऐसा ही प्रेम और आपसी मेलजोल बना रहे, ऐसी कृपा कीजिए।

शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदंबे।

संकट तू ही निवारे, दयामयी अंबे॥

शरण गहे की लज्जा = जो आपकी शरण में आ गया उसका मान-सम्मान; राखियो = रक्षा करना; संकट तू ही निवारे = आप ही हर विपत्ति को टालने वाली हैं।

भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे जगदम्बा माँ! जो भी इंसान दुनिया से निराश होकर आपकी शरण में आ जाता है, आप कभी उसकी लाज नहीं जाने देतीं। आप ही दया की मूर्ति हैं और आप ही जीवन के कठिन मोड़ों पर संकटों को हरने वाली हैं। हे माँ संतोषी! हम पूरी तरह आपकी शरण में हैं; संसार में हमारा मान-सम्मान बनाए रखना और कठिन समय में हमारा हाथ कभी मत छोड़ना।

संतोषी मां की आरती, जो कोई नर गावे।

ऋद्धि-सिद्धि सुख संपत्ति, जी भरकर पावे॥

ऋद्धि-सिद्धि = ज्ञान, विवेक और आत्मिक तृप्ति; सुख संपत्ति = सांसारिक खुशहाली व संपन्नता; जी भरकर पावे = भरपूर और तृप्त होकर प्राप्त करता है।

भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे माँ संतोषी! आरती की यह अंतिम पंक्ति आपके भक्तों के अटूट विश्वास का प्रमाण है कि जो भी मनुष्य पूरी निष्ठा से आपकी यह आरती गाता है, उसे जीवन में ज्ञान, सद्बुद्धि, ऐश्वर्य और पारिवारिक सुख भरपूर मिलता है। हे मैया! हमने भी हाथ जोड़कर आपके आगे विनती की है; हमारे परिवार पर अपनी ममता की छाया बनाए रखिए और हमारे मन में सदा संतोष का दीप जलाए रखिए।

माँ संतोषी का प्राकट्य, ऐतिहासिक शोध व शुक्रवार व्रत का रहस्य

धार्मिक इतिहास और विद्वानों के शोध (जैसा कि Santoshi Mata – Wikipedia के ऐतिहासिक विवरण में दर्ज है) के अनुसार, माँ संतोषी का उल्लेख प्राचीन संस्कृत महापुराणों में नहीं मिलता है। माँ संतोषी की उपासना 1960 के दशक की शुरुआत में उत्तर भारत (विशेष रूप से राजस्थान के जोधपुर अंचल) में महिला श्रद्धालुओं द्वारा एक स्थानीय लोक-देवी के रूप में शुरू हुई थी। उस समय यह पूजा छोटे-छोटे व्रत-साहित्य (Pamphlets) और पोस्टरों के जरिए फैली और 1975 में आई फिल्म ‘जय संतोषी मां’ ने इसे पूरे भारत में एक सर्वमान्य देवी के रूप में स्थापित कर दिया।

लोक-कथा के अनुसार, जब रक्षाबंधन के दिन भगवान गणेश के पुत्र शुभ और लाभ अपनी बुआ मानसा देवी को राखी बांधते देख एक बहन की जिद करने लगे, तब देवर्षि नारद के कहने पर गणेश जी और माता रिद्धि-सिद्धि की शक्तियों के तेज से माँ संतोषी का प्राकट्य हुआ। इस व्रत का मुख्य नियम है—16 शुक्रवार तक खटाई का पूर्ण त्याग। लोक-मान्यता के अनुसार खट्टा स्वाद मन में उत्तेजना और असंतोष लाता है, जबकि गुड़ और चना सादगी, प्राकृतिक मिठास और तृप्ति के प्रतीक हैं। इसी कारण जो भक्त बिना किसी खटाई के केवल सात्विक भाव से 16 शुक्रवार व्रत रखते हैं, उनका मन शांत और घर खुशहाल होता है।

📖 इन्हें भी जरूर पढ़ें (संबंधित पावन आरतियां व दर्शन)

संतोषी माता आरती व व्रत से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)

1. क्या माँ संतोषी का उल्लेख प्राचीन वेदों या 18 पुराणों में मिलता है?

नहीं, माँ संतोषी का उल्लेख प्राचीन 18 महापुराणों में नहीं मिलता है। यह 20वीं सदी के उत्तरार्ध में उत्तर भारत में प्रकट हुई एक अत्यंत लोकप्रिय लोक-देवी हैं, जिनका महात्म्य शुक्रवार व्रत-पुस्तिकाओं और लोक-आस्था के जरिए जन-जन में फैला।

2. माँ संतोषी की पूजा में केवल गुड़ और चने का ही भोग क्यों लगाया जाता है?

गुड़ और भुना चना सादगी, प्राकृतिक मिठास और संतोष का प्रतीक है। यह हर अमीर और गरीब को बिना किसी अतिरिक्त खर्च के आसानी से मिल जाता है। माँ किसी महंगे पकवान की नहीं, बल्कि इसी सादगी भरे भाव की भूखी हैं।

3. शुक्रवार के व्रत में खटाई खाना सख्त मना क्यों होता है?

धार्मिक और लोक-मान्यता के अनुसार खट्टा स्वाद मन में चंचलता, तीखापन और असंतोष लाता है। व्रत का मुख्य उद्देश्य मन को शांत और संतोषी बनाना है, इसलिए व्रत रखने वाले और उसके पूरे परिवार के लिए खटाई का सेवन और स्पर्श वर्जित माना गया है।

4. माँ संतोषी के 16 शुक्रवार व्रत का उद्यापन कैसे किया जाता है?

16 शुक्रवार पूरे होने पर 16वें शुक्रवार को उद्यापन किया जाता है। इसमें 8 बालकों को खीर-पूरी और चने का भोजन कराया जाता है और उन्हें दक्षिणा के रूप में फल दिए जाते हैं, लेकिन उन्हें किसी भी तरह की खट्टी चीज न खाने की हिदायत दी जाती है।

5. आरती की थाली घुमाने का सही नियम क्या है?

आरती की थाली को घड़ी की दिशा में (क्लॉकवाइज) कुल 14 बार घुमाया जाता है: 4 बार माता के पावन चरणों में, 2 बार नाभि पर, 1 बार मुखमंडल पर और 7 बार पूरे स्वरूप पर।

6. क्या बिना व्रत रखे भी केवल शुक्रवार को यह आरती गा सकते हैं?

हाँ, बिल्कुल। यदि आप व्रत रखने में असमर्थ हैं, तब भी शुक्रवार के दिन माँ की तस्वीर के आगे शुद्ध घी का दीपक जलाकर, थोड़ा सा गुड़-चना चढ़ाकर यह आरती गाने से घर में सुख-शांति और संतोष बना रहता है।

🙏 माँ संतोषी की इस पावन आरती और संतोष के संदेश को अपनों तक पहुंचाएं!

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धार्मिक एवं सामग्री डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी पारंपरिक शुक्रवार व्रत-कथा, भारतीय लोक-आस्था और प्रामाणिक ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित है। इसका उद्देश्य माँ संतोषी की आराधना के पावन मर्म और सादगी भरे संदेश को सरल भाषा में जन-जन तक पहुंचाना है।

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