सनातन परंपरा में देवाधिदेव महादेव की आराधना मन के भय, अशांति और तीनों प्रकार के संतापों को मिटाने वाली मानी जाती है। शिव तांडव आरती (Shiv Tandav Aarti) यानी ‘ॐ जय गंगाधर जय हर जय गिरिजाधीशा’ भगवान भोलेनाथ की एक अत्यंत दुर्लभ, संस्कृत-गर्भित और सिद्ध स्तुति है। सामान्यतः अधिकांश घरों में नित्य ‘ॐ जय शिव ओंकारा’ आरती गाई जाती है, लेकिन कैलाश पर्वत पर होने वाले अलौकिक आनंद-तांडव, डमरू के गंभीर नाद, नूपुरों की झंकार और वेद-ऋचाओं के दिव्य वातावरण का साक्षात अनुभव कराने वाली यह गंगाधर आरती अपने आप में अनुपम और चमत्कारी है।
इस आरती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके पदों में भगवान शिव के चरणों के नूपुरों की झंकार और डमरू की ताल का साक्षात ध्वन्यात्मक वर्णन मिलता है, जिसके कारण शास्त्रों और प्राचीन अखाड़ों में इसे ‘शिव तांडव आरती’ कहा जाता है। इस लेख में हमने पाठकों की सुविधा के लिए सबसे पहले इस दुर्लभ आरती का संपूर्ण मूल पाठ एक A4 प्रिंटेबल कार्ड में दिया है, जिसे आप एक क्लिक में प्रिंट कर सकते हैं। इसके बाद हर पद के कठिन संस्कृत शब्दों के आसान अर्थ, सीधे प्रभु से संवाद करती भावपूर्ण प्रार्थना और इसे तांडव आरती कहे जाने का ठोस शास्त्रीय प्रमाण प्रस्तुत किया गया है।
भगवान गंगाधर शिव: मुख्य तथ्य व दुर्लभ आरती परिचय
- पहचान व स्वरूप: देवाधिदेव महादेव का आनंद-तांडव स्वरूप, जो अपनी जटाओं में माँ गंगा और वाम भाग में माता पार्वती (गिरिजा) को धारण किए हुए हैं।
- आरती का शास्त्रीय नाम: प्राचीन पांडुलिपियों व गीताप्रेस की पुस्तकों में इसे ‘श्रीगंगाधरजी की आरती’ अथवा ‘कैलासवासी शिवजी की आरती’ के रूप में दर्ज किया गया है।
- भगवान का पावन रूप: कपूर के समान उज्ज्वल गौर वर्ण, पंचानन (पांच मुख), तीन नेत्र, मस्तक पर अर्धचंद्र, गले में विषधर सर्प, भस्म का शृंगार और हाथों में पिनाक धनुष, त्रिशूल व डमरू।
- आरती का सबसे बड़ा फल: तीनों तापों (दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों) से मुक्ति और अंत में भगवान शिव के सायुज्य मोक्ष की प्राप्ति।
- प्रिय भोग व पूजन सामग्री: गंगाजल, भस्म, बेलपत्र, धतूरा, सफेद चंदन, गाय का कच्चा दूध और कपूर की पावन ज्योति।
- आरती का सर्वश्रेष्ठ समय: प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय), महाशिवरात्रि, सावन सोमवार और नित्य संध्या आरती में।
॥ शिव तांडव आरती: ॐ जय गंगाधर (मूल पाठ) ॥
(प्रदोष, शिवरात्रि व नित्य पाठ हेतु शुद्ध शास्त्रीय स्वरूप)
त्वं मां पालय नित्यं कृपया जगदीशा॥ ॐ जय गंगाधर…॥
कैलासे गिरिशिखरे कल्पद्रुमविपिने।
गुंजति मधुकरपुंजे कुंजवने गहने॥
कोकिलकूजित खेलत हंसावन ललिता।
रचयति कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता॥ ॐ जय गंगाधर…॥
तस्मिंल्ललितसुदेशे शाला मणिरचिता।
तन्मध्ये हरनिकटे गौरी मुदसहिता॥
क्रीडा रचयति भूषारंचित निजमीशम्।
इंद्रादिक सुर सेवत नामयते शीशम्॥ ॐ जय गंगाधर…॥
बिबुधबधू बहु नृत्यत नामयते मुदसहिता।
किन्नर गायन कुरुते सप्त स्वर सहिता॥
धिनकत थै थै धिनकत मृदंग वादयते।
क्वण क्वण ललिता वेणुं मधुरं नाटयते॥ ॐ जय गंगाधर…॥
रुण रुण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता।
चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां॥
तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते।
अंगुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते॥ ॐ जय गंगाधर…॥
कर्पूरद्युतिगौरं पंचाननसहितम्।
त्रिनयनशशिधरमौलिं विषधरकण्ठयुतम्॥
सुन्दरजटायकलापं पावकयुतभालम्।
डमरुत्रिशूलपिनाकं करधृतनृकपालम्॥ ॐ जय गंगाधर…॥
मुण्डै रचयति माला पन्नगमुपवीतम्।
वामविभागे गिरिजारूपं अतिललितम्॥
सुन्दरसकलशरीरे कृतभस्माभरणम्।
इति वृषभध्वजरूपं तापत्रयहरणं॥ ॐ जय गंगाधर…॥
शंखनिनादं कृत्वा झल्लरि नादयते।
नीराजयते ब्रह्मा वेदऋचां पठते॥
अतिमृदुचरणसरोजं हृत्कमले धृत्वा।
अवलोकयति महेशं ईशं अभिनत्वा॥ ॐ जय गंगाधर…॥
ध्यानं आरति समये हृदये अति कृत्वा।
रामस्त्रिजटानाथं ईशं अभिनत्वा॥
संगतिमेवं प्रतिदिन पठनं यः कुरुते।
शिवसायुज्यं गच्छति भक्त्या यः श्रृणुते॥ ॐ जय गंगाधर…॥
शिव तांडव आरती: पदवार शब्दार्थ व भक्ति-प्रार्थना भावार्थ
ॐ जय गंगाधर जय हर जय गिरिजाधीशा।
त्वं मां पालय नित्यं कृपया जगदीशा॥
गंगाधर = जटाओं में माँ गंगा को धारण करने वाले; हर = समस्त पापों और कष्टों को हरने वाले; गिरिजाधीशा = पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती के स्वामी; त्वं मां पालय नित्यं = आप प्रतिदिन मेरी रक्षा और पालन कीजिए; जगदीशा = संपूर्ण जगत के परमेश्वर।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे गंगाधर! हे सबकी पीड़ा हरने वाले हर! हे माता पार्वती के प्राणप्रिय स्वामी गिरिजाधीश! आपकी सदा ही जय हो। हे संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी महादेव! हम अत्यंत दीन-हीन और सांसारिक मायाजाल में भटके हुए जीव हैं। हे कृपानिधान! अपनी असीम करुणा से प्रतिदिन हमारा पालन-पोषण कीजिए, हमारे जीवन के समस्त संतापों को हर लीजिए और अपनी छत्रछाया में हमें अभय प्रदान कीजिए।
कैलासे गिरिशिखरे कल्पद्रुमविपिने।
गुंजति मधुकरपुंजे कुंजवने गहने॥
कोकिलकूजित खेलत हंसावन ललिता।
रचयति कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता॥
कैलासे गिरिशिखरे = पवित्र कैलाश पर्वत के शिखर पर; कल्पद्रुमविपिने = मनोकामना पूर्ण करने वाले कल्पवृक्षों के वन में; मधुकरपुंजे = भौरों के समूह; कोकिलकूजित = कोयल की मीठी कूक; हंसावन ललिता = सुंदर हंसों का क्रीड़ा करना; कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता = मोर अपने पंखों को फैलाकर आनंदपूर्वक नाच रहे हैं।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे देवाधिदेव! कैलाश पर्वत के दिव्य शिखर पर कल्पवृक्षों के सघन वन में भौरों के झुंड गुंजार कर रहे हैं, कोयलों की मधुर आवाज गूंज रही है, मानसरोवर के हंस क्रीड़ा कर रहे हैं और मोर पंख फैलाकर परम आनंद में नृत्य कर रहे हैं। हे प्रभु! कैलाश का यह पावन आनंद हमारे अशांत मन में भी उतार दीजिए, ताकि सांसारिक चिंताओं से जल रहा हमारा अंतःकरण भी शांत और पावन हो सके।
तस्मिंल्ललितसुदेशे शाला मणिरचिता।
तन्मध्ये हरनिकटे गौरी मुदसहिता॥
क्रीडा रचयति भूषारंचित निजमीशम्।
इंद्रादिक सुर सेवत नामयते शीशम्॥
शाला मणिरचिता = बहुमूल्य मणियों और रत्नों से बना दिव्य मंडप; हरनिकटे गौरी = भगवान शिव के समीप विराजित माँ पार्वती; भूषारंचित निजमीशम् = अपने स्वामी महादेव का दिव्य शृंगार कर रही हैं; इंद्रादिक सुर = देवराज इंद्र सहित सभी देवतागण; नामयते शीशम् = चरणों में मस्तक झुका रहे हैं।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे उमापति महादेव! उस अत्यंत सुंदर स्थान पर रत्नों से जड़ा भव्य मंडप बना हुआ है, जिसके मध्य में आप विराजित हैं और आपके निकट माता गौरी परम प्रसन्न होकर आपका शृंगार कर रही हैं। देवराज इंद्र सहित समस्त देवता आपके चरणों में शीश नवाकर सेवा कर रहे हैं। हे विश्वेश्वर! जिस दरबार में बड़े-बड़े देवता शीश झुकाते हैं, हम भी उसी चौखट पर अपना मस्तक रखते हैं; हमें अपनी कृपा का वरदान दीजिए।
बिबुधबधू बहु नृत्यत नामयते मुदसहिता।
किन्नर गायन कुरुते सप्त स्वर सहिता॥
धिनकत थै थै धिनकत मृदंग वादयते।
क्वण क्वण ललिता वेणुं मधुरं नाटयते॥
बिबुधबधू = स्वर्ग की देवांगनाएं (अप्सराएं); किन्नर गायन = दिव्य किन्नरों द्वारा सातों सुरों में स्तुति गान; धिनकत थै थै = मृदंग की लयबद्ध थाप व बोल; क्वण क्वण ललिता वेणुं = बांसुरी की अत्यंत मधुर और सुरीली तान।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे नटराज! आपके पावन दरबार में अप्सराएं प्रसन्न होकर नृत्य कर रही हैं और किन्नर सातों सुरों में आपका गुणगान कर रहे हैं। ‘धिनकत थै-थै’ की थाप पर मृदंग बज रहे हैं और बांसुरी की मधुर तान से पूरा कैलाश आनंदित हो रहा है। हे संगीत और कला के मूल जनक! हमारे भीतर भी अपनी भक्ति का ऐसा मधुर स्वर जगा दीजिए, जिससे हमारे जीवन का हर पल आपकी आराधना बन जाए।
रुण रुण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता।
चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां॥
तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते।
अंगुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते॥
रुण रुण नूपुर = पावन चरणों में घुंघरुओं की रुनझुन झंकार; चक्रावर्ते भ्रमयति = चक्र की गति से घूमते हुए आनंद-तांडव करना; तां तां डमरू = डमरू का गंभीर और दिव्य नाद; लासकतां = भावपूर्ण लास्य व तांडव नृत्य की गति।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे तांडव प्रिय नटराज! जब आप नृत्य करते हैं, तो आपके पावन चरणों के नूपुरों से ‘रुण-रुण’ की झंकार उठती है। चक्र की भांति घूमते हुए आप जब ‘तां-धिक-तां’ और डमरू के ‘तां-तां लुप-चुप’ के गंभीर नाद के साथ अंगुलियों की ताल पर तांडव रचते हैं, तो संपूर्ण सृष्टि मंत्रमुग्ध हो जाती है। हे भोलेनाथ! आपके डमरू का यह पवित्र नाद हमारे जीवन की सारी नकारात्मकता, भय और मानसिक विकारों को नष्ट कर दे, यही प्रार्थना है।
कर्पूरद्युतिगौरं पंचाननसहितम्।
त्रिनयनशशिधरमौलिं विषधरकण्ठयुतम्॥
सुन्दरजटायकलापं पावकयुतभालम्।
डमरुत्रिशूलपिनाकं करधृतनृकपालम्॥
कर्पूरद्युतिगौरं = कपूर की आभा के समान उज्ज्वल व गौर वर्ण; पंचानन = पांच मुखों (सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष, ईशान) वाले; त्रिनयन = तीन नेत्र; शशिधरमौलिं = मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले; पावकयुतभालम् = मस्तक पर अग्नि रूपी तीसरा नेत्र; पिनाकं = शिव जी का दिव्य धनुष; नृकपालम् = हाथ में कपाल पात्र।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे कर्पूरगौर महादेव! आपका दिव्य रूप कपूर की भांति श्वेत और तेजस्वी है। आपके पांच पावन मुख, तीन नेत्र और मस्तक पर अमृतमयी चंद्रमा सुशोभित हैं। गले में नीलकंठ रूप विषधर सर्प लिपटा है, जटाएं अत्यंत सुंदर हैं और भाल पर ज्ञान की तीसरी आंख चमक रही है। आपके हाथों में डमरू, त्रिशूल, पिनाक धनुष और कपाल सुशोभित हैं। हे महाकाल! अपने इस सर्वसमर्थ स्वरूप से हमारे काल और अकाल मृत्यु के भय को सदा के लिए समाप्त कर दीजिए।
मुण्डै रचयति माला पन्नगमुपवीतम्।
वामविभागे गिरिजारूपं अतिललितम्॥
सुन्दरसकलशरीरे कृतभस्माभरणम्।
इति वृषभध्वजरूपं तापत्रयहरणं॥
पन्नगमुपवीतम् = सर्प का जनेऊ (यज्ञोपवीत); वामविभागे = बाएं अंग में माता पार्वती का अर्धनारीश्वर रूप; कृतभस्माभरणम् = पूरे शरीर पर पवित्र भस्म का आभूषण; वृषभध्वज = नंदी बैल के ध्वज वाले; तापत्रयहरणं = तीनों तापों (दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों) को हरने वाला रूप।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे वृषभध्वज भगवान शिव! आपके वक्षस्थल पर सर्प का जनेऊ और मुंडों की माला शोभायमान है। आपके वाम भाग में माता पार्वती का अत्यंत सुकोमल रूप विराजमान है और आपका संपूर्ण शरीर पवित्र भस्म से सुसज्जित है। हे प्रभु! आपका यह अलौकिक रूप संसार के तीनों भयंकर तापों—शारीरिक रोग, दैवीय विपत्ति और सांसारिक क्लेशों को हरने वाला है। हे दयालु शम्भू! हमारे जीवन के इन तीनों तापों को अपनी भस्म की शीतलता से शांत कर दीजिए।
शंखनिनादं कृत्वा झल्लरि नादयते।
नीराजयते ब्रह्मा वेदऋचां पठते॥
अतिमृदुचरणसरोजं हृत्कमले धृत्वा।
अवलोकयति महेशं ईशं अभिनत्वा॥
शंखनिनादं = शंख की गंभीर मंगल ध्वनि; झल्लरि नादयते = झांझ और मंजीरों की गूंज; नीराजयते ब्रह्मा = साक्षात ब्रह्मा जी दीपकों से आरती उतारते हैं; वेदऋचां पठते = वेदों की पावन ऋचाओं का पाठ करते हुए; हृत्कमले धृत्वा = अपने हृदय कमल में आपके चरण कमलों को धारण करके।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे महेश्वर! शंख की पावन ध्वनि और झांझ-मंजीरों की झंकार के बीच स्वयं पितामह ब्रह्मा जी वेदों की पावन ऋचाओं का गान करते हुए आपकी आरती उतार रहे हैं। वे आपके अत्यंत कोमल चरण कमलों को अपने हृदय में धारण करके आपको बारंबार प्रणाम कर रहे हैं। हे प्रभु! जब ब्रह्मा जी जैसे देव भी वेदों से आपकी आरती करते हैं, तो हमारे पास केवल हमारी सच्ची श्रद्धा है; हमारे हृदय में भी अपने इन कोमल चरणों को सदा के लिए स्थापित कर लीजिए।
ध्यानं आरति समये हृदये अति कृत्वा।
रामस्त्रिजटानाथं ईशं अभिनत्वा॥
संगतिमेवं प्रतिदिन पठनं यः कुरुते।
शिवसायुज्यं गच्छति भक्त्या यः श्रृणुते॥
त्रिजटानाथं = गंगा, चंद्रमा और सर्पों की तीन जटाओं वाले देवाधिदेव; रामस्त्रिजटानाथं = स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम भी जिनका नमन करते हैं; पठनं यः कुरुते = जो इसका नित्य पाठ करता है; शिवसायुज्यं गच्छति = वह भगवान शिव के धाम (सायुज्य मोक्ष) को प्राप्त होता है।
भक्ति-प्रार्थना भावार्थ: हे तीन जटाओं वाले परमेश्वर! आरती के समय एकाग्र चित्त होकर हृदय में आपका ध्यान धरते हुए स्वयं भगवान श्री राम भी आपके चरणों में नमन करते हैं। आरती की यह अंतिम पंक्ति फलश्रुति बताती है कि जो भी साधक नित्य श्रद्धापूर्वक इस स्तुति का पाठ करता है या इसे सुनता है, वह इस संसार के जन्म-मरण के बंधनों से छूटकर शिव-सायुज्य (मोक्ष) को प्राप्त होता है। हे नीलकंठ! हमने भी सच्चे मन से आपकी यह आरती गाई है; हमारे समस्त पापों को क्षमा कर अंत समय में हमें अपने श्रीचरणों में स्थान दीजिए।
इस आरती को ‘शिव तांडव व नृत्य आरती’ क्यों कहा जाता है? (शास्त्रीय प्रमाण)
कई श्रद्धालु यह सवाल करते हैं कि मूल रूप से ‘श्री गंगाधर जी की आरती’ कहलाने वाली इस स्तुति को ‘शिव तांडव आरती’ या ‘कैलाश नृत्य आरती’ क्यों कहा जाता है? इसका प्रमाण किसी मनगढ़ंत कल्पना में नहीं, बल्कि स्वयं इस स्तुति के छंद और पदों में साक्षात मौजूद है:
- नूपुरों की झंकार और चक्राकार तांडव: पद में स्पष्ट रूप से कहा गया है—“रुण रुण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता। चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां॥” अर्थात् भगवान शिव जब चक्र की तीव्र गति से घूमकर तांडव नृत्य करते हैं, तो उनके पावन चरणों के नूपुरों से ‘रुण-रुण’ की झंकार और कदमों से ‘तां-धिक-तां’ की ताल निकलती है।
- डमरू और अंगुलियों का लास्य-तांडव नाद: अगली पंक्ति में प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है—“तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते। अंगुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते॥” यहाँ डमरू के ‘तां-तां’ की थाप और अंगूठे व अंगुलियों से उत्पन्न होने वाले लास्य व तांडव नृत्य के बोलों का साक्षात वर्णन है।
- मृदंग और वेणु की शास्त्रीय थाप: “धिनकत थै थै धिनकत मृदंग वादयते…” यह विशुद्ध रूप से भारतीय शास्त्रीय संगीत और तांडव नृत्य के ताल-बोल हैं, जो अन्य किसी सामान्य आरती में नहीं मिलते।
प्रामाणिक धार्मिक साहित्य के अनुसार, गीताप्रेस गोरखपुर (Gita Press) द्वारा प्रकाशित ‘आरती संग्रह’ (पुस्तक कोड: 57) और ‘नित्यकर्म पूजाप्रकाश’ में इसे ‘कैलासवासी शिवजी की आरती’ व ‘श्रीगंगाधरजी की आरती’ के रूप में संकलित किया गया है। काशी के प्राचीन शिवालयों और अखाड़ों में प्रदोष काल में इसी तीव्र लय और वाद्ययंत्रों की थाप पर यह आरती गाई जाती है, जिसके कारण लोक-परंपरा में यह ‘शिव तांडव आरती’ के रूप में सिद्ध और विख्यात हुई!
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Shiv Tandav Aarti से जुड़े मुख्य सवाल (FAQs)
1. ‘ॐ जय गंगाधर’ और ‘ॐ जय शिव ओंकारा’ आरती में क्या अंतर है?
‘ॐ जय शिव ओंकारा’ जन-साधारण में नित्य गाई जाने वाली सरल हिंदी आरती है, जबकि ‘ॐ जय गंगाधर’ संस्कृत-गर्भित शास्त्रीय स्तुति है जिसमें कैलाश शिखर पर होने वाले प्रदोष तांडव, वाद्ययंत्रों और वेदों की ऋचाओं का विशेष वर्णन है।
2. इस आरती में आए ‘तापत्रय’ का क्या अर्थ है?
तापत्रय का अर्थ है जीवन के तीन प्रकार के दुख: दैहिक (शारीरिक बीमारियां व कष्ट), दैविक (प्रकृति, ग्रह-दोष या अदृश्य शक्तियां) और भौतिक (संसार व समाज द्वारा मिलने वाले क्लेश)। भगवान शिव इन तीनों तापों को शांत करने वाले हैं।
3. शिव तांडव आरती करने का सबसे श्रेष्ठ समय कौन सा है?
प्रदोष काल (सूर्यास्त के ठीक बाद का 45 मिनट का समय) इस आरती के लिए सबसे सिद्ध माना गया है। इसके अलावा महाशिवरात्रि, सावन के सोमवार और मासिक शिवरात्रि पर इसका गान परम कल्याणकारी होता है।
4. आरती में ‘शिव-सायुज्य’ का क्या तात्पर्य है?
चार प्रकार के मोक्षों (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य) में ‘सायुज्य’ सबसे सर्वोच्च मुक्ति मानी जाती है, जहाँ आत्मा भगवान शिव के परम चैतन्य स्वरूप में पूर्णतः विलीन होकर अमर आनंद को प्राप्त कर लेती है।
5. क्या घर पर सामान्य पूजा में भी यह आरती गाई जा सकती है?
हाँ, बिल्कुल। शिवलिंग या भगवान शिव की तस्वीर के समक्ष शुद्ध घी अथवा कपूर का दीपक जलाकर परिवार सहित इस आरती को लयबद्ध भाव से गाना घर के वास्तुदोष और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है।
6. आरती की थाली घुमाने का शास्त्रीय नियम क्या है?
आरती की थाली को दक्षिणावर्त (Clockwise) कुल 14 बार घुमाया जाता है: 4 बार भगवान के पावन चरणों में, 2 बार नाभि पर, 1 बार मुखमंडल पर और 7 बार भगवान के संपूर्ण स्वरूप पर।
🙏 देवाधिदेव महादेव की इस दुर्लभ आरती को अपनों तक पहुंचाएं!
अपने परिवार और मित्रों के साथ इस दिव्य स्तुति और इसके सरल अर्थ को WhatsApp पर जरूर शेयर करें ताकि सभी पर भगवान शिव की कृपा बनी रहे।
धार्मिक एवं सामग्री डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सनातन शिव-उपासना परंपरा, शिवपुराण और गीताप्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संदर्भों पर आधारित है। इसका उद्देश्य भगवान शिव की इस दुर्लभ स्तुति और इसके शास्त्रीय भाव को जन-साधारण तक पहुंचाना है।