ललिता माता की आरती का पाठ करना जीवन के हर तरह के डर, नकारात्मक ऊर्जा और आंतरिक उलझनों को दूर करने का एक बहुत ही सुंदर और सरल उपाय है। सनातन धर्म में दस महाविद्याओं में प्रमुख स्थान रखने वाली देवी माँ ललिता को ‘त्रिपुर सुंदरी’ और ‘राजराजेश्वरी’ भी कहा जाता है। आज की आपाधापी भरी जिंदगी में जब मन किसी अज्ञात चिंता, तनाव या मुश्किलों से घिर जाता है, तब माँ ललिता की यह पावन आरती अंतर्मन को शांति और आत्मबल से भर देती है।
ब्रह्मांड पुराण के अनुसार, जब भंडासुर नाम के भयानक राक्षस ने चारों ओर आतंक मचा दिया था, तब देवताओं के कष्ट दूर करने के लिए माँ ललिता प्रकट हुई थीं। माता का यह रूप प्रेम, ममता और बुराइयों का नाश करने वाली असीम शक्ति का संगम है। जब कोई भक्त सच्चे दिल से इस पावन आरती का गायन करता है, तो उसके जीवन के बड़े से बड़े संकट टल जाते हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी पूजा : जरूरी बातें एक नज़र में
- देवी की पहचान: दस महाविद्याओं में तीसरी प्रमुख देवी (श्रीविद्या व त्रिपुर सुंदरी)
- माता का पावन रूप: श्रीयंत्र पर विराजमान, लाल कमल जैसी कांति, चार भुजाओं वाला करुणामयी रूप
- हाथों के दिव्य चिह्न: गन्ने का धनुष (मन), फूलों के पांच बाण (ज्ञानेंद्रियां), पाश (लगाव/स्नेह) और अंकुश (इंद्रिय नियंत्रण)
- आरती का श्रेष्ठ समय: प्रातःकाल पूजा के समय और सायंकाल गोधूलि वेला (विशेषकर शुक्रवार व पूर्णिमा के दिन)
- प्रिय भोग/प्रसाद: लाल फल (अनार/सेब), खीर, गुड़ की मिठाई और पंचामृत
- आरती करने का सबसे बड़ा लाभ: मानसिक चिंताओं से मुक्ति, नकारात्मक शक्तियों का नाश, पारिवारिक सामंजस्य और सर्व-सुख की प्राप्ति
ललिता माता की आरती : प्रामाणिक पाठ, शत-प्रतिशत शब्दार्थ व सीधा भावार्थ
श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी।
राजेश्वरी जय नमो नमः॥
करुणामयी सकल अघ हारिणी।
अमृत वर्षिणी नमो नमः॥
जय शरणं वरणं नमो नमः।
श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी॥
आसान शब्दार्थ: मातेश्वरी = सभी माताओं की ईश्वरी (परम जननी); त्रिपुरेश्वरी = तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) की स्वामिनी; राजेश्वरी = पूरे ब्रह्मांड पर शासन करने वाली महारानी; नमो नमः = बार-बार प्रणाम या नमस्कार; करुणामयी = दया और ममता से भरी हुई; सकल = सारे, समस्त; अघ = पाप, दोष या गलतियां; हारिणी = दूर करने वाली; अमृत वर्षिणी = जीवन में अमर सुख और शांति बरसाने वाली; शरणं वरणं = आपकी शरण को स्वीकार करना या अपनाना।
सरल भावार्थ: हे तीनों लोकों की स्वामिनी और समस्त ब्रह्मांड की महारानी माँ ललिता! आपकी सदा जय हो, हम आपको बार-बार नमन करते हैं। आप असीम दया से भरी हुई हैं और हमारे सभी पापों व गलतियों को मिटाने वाली हैं। आप हमारे जीवन पर सुख-शांति का अमृत बरसाती हैं। हे माँ! हम पूरे मन से आपकी पावन शरण को स्वीकार करते हैं।
अशुभ विनाशिनी, सब सुख दायिनी।
खल-दल नाशिनी नमो नमः॥
भण्डासुर वधकारिणी जय माँ।
करुणा कलिते नमो नमः॥
जय शरणं वरणं नमो नमः।
श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी॥
आसान शब्दार्थ: अशुभ विनाशिनी = अमंगल और बुरे समय को नष्ट करने वाली; सब सुख दायिनी = जीवन में हर तरह का सुख और संतोष देने वाली; खल-दल नाशिनी = दुष्टों, बुरी ताकतों और बुरे विचारों के समूह को मिटाने वाली; भण्डासुर = कामदेव की राख से जन्मा अहंकारी राक्षस; वधकारिणी = संहार करने वाली; करुणा कलिते = करुणा और कोमलता से सुशोभित।
सरल भावार्थ: हे माँ! आप हमारे जीवन से हर अमंगल और बुरे वक्त को मिटाकर हमें सभी सुख देती हैं। आप बुरी शक्तियों और दुर्गुणों का नाश करने वाली हैं। आपने देवताओं की रक्षा के लिए अत्याचारी भण्डासुर का वध किया था। हे दया की मूरत माता! हम आपकी शरण ग्रहण करते हैं और आपको बार-बार प्रणाम करते हैं।
भव भय हारिणी, कष्ट निवारिणी।
शरण गति दो नमो नमः॥
शिव भामिनी साधक मन हारिणी।
आदि शक्ति जय नमो नमः॥
जय शरणं वरणं नमो नमः।
जय त्रिपुर सुन्दरी नमो नमः॥
आसान शब्दार्थ: भव भय हारिणी = दुनिया की मुश्किलों और जन्म-मरण के डर को खत्म करने वाली; कष्ट निवारिणी = हर तकलीफ और पीड़ा को सुलझाने वाली; शरण गति = अपनी शरण में सुरक्षित आश्रय; शिव भामिनी = भगवान सदाशिव की अर्धांगिनी (पत्नी); साधक = साधना या भक्ति करने वाला भक्त; मन हारिणी = मन को मोह लेने वाली (मन में बसने वाली); आदि शक्ति = सृष्टि की मूल शक्ति; त्रिपुर सुन्दरी = तीनों लोकों में सबसे सुंदर और मनमोहक रूप वाली देवी।
सरल भावार्थ: हे माँ! आप जीवन के हर भय को दूर करने वाली और सभी कष्टों को मिटाने वाली हैं। हमें अपने चरणों में पक्की शरण दीजिए। हे भगवान शिव की शक्ति और भक्तों के मन को मोहने वाली आदि शक्ति! आपकी जय हो। हे माँ त्रिपुर सुंदरी! हम आपके पावन चरणों में बारंबार शीश झुकाते हैं।
श्री मातेश्वरी जय त्रिपुरेश्वरी।
राजेश्वरी जय नमो नमः॥
आसान शब्दार्थ: श्री मातेश्वरी = परम पूज्य जगन्माता; त्रिपुरेश्वरी = जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं की स्वामिनी; राजेश्वरी = परम ऐश्वर्य और राज-सुख देने वाली देवी।
सरल भावार्थ: हे समस्त लोकों की अधिष्ठात्री परम करुणामयी माँ राजराजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी! आपकी हमेशा जय-जयकार हो। हम बार-बार कृतज्ञतापूर्वक आपके चरणों में प्रणाम करते हैं। अपनी दया दृष्टि सदा हम पर बनाए रखिए।

माँ ललिता का प्राकट्य, भण्डासुर वध और जीवन की सीख
पौराणिक कथा (ब्रह्मांड पुराण के ललिता उपाख्यान) के अनुसार, जब भगवान शिव ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म कर दिया था, तब कामदेव की भस्म से ‘भण्डासुर’ नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली और भयानक राक्षस उत्पन्न हुआ। भण्डासुर ने अपनी आसुरी शक्ति से स्वर्ग और तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और देवताओं की समस्त शक्तियों को क्षीण कर दिया। तब देवराज इंद्र और अन्य देवताओं ने संकट से मुक्ति पाने के लिए एक विशाल महायज्ञ (महाचिदग्नि यज्ञ) किया।
देवताओं की सच्ची पुकार सुनकर यज्ञ की दिव्य अग्नि से साक्षात माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी प्रकट हुईं। माता ने अपने दिव्य रथ पर सवार होकर भण्डासुर की विशाल सेना और स्वयं भण्डासुर का वध किया और पूरे ब्रह्मांड में पुनः शांति और धर्म की स्थापना की।
आध्यात्मिक दृष्टि से ‘भण्डासुर’ हमारे मन का वह अहंकार और अंधकार है जो हमें गलत रास्ते पर ले जाता है। माँ ललिता के हाथों में स्थित गन्ने का धनुष हमारे ‘मन’ का प्रतीक है, पांच बाण हमारी पांचों ‘ज्ञानेंद्रियों’ के प्रतीक हैं, पाश हमारे ‘स्नेह/लगाव’ का और अंकुश हमारी अनियंत्रित इच्छाओं पर ‘कंट्रोल’ का प्रतीक है। इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि हम अपनी इच्छाओं और मन पर संयम रखें, तो माता की कृपा से जीवन की हर मुश्किल पर विजय पा सकते हैं। इस पावन कथा के मूल संदर्भ ब्रह्मांड पुराण (ललिता उपाख्यान – Archive) में विस्तार से मिलते हैं।
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ललिता माता की आरती से जुड़े आसान सवाल और उनके जवाब (FAQ)
1. माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी की आरती करने का सबसे उत्तम दिन कौन सा है?
माँ ललिता की पूजा और आरती वैसे तो प्रतिदिन की जा सकती है, लेकिन शुक्रवार का दिन, पूर्णिमा तिथि और नवरात्रि की पंचमी तिथि (ललिता पंचमी) को इनकी आरती करना विशेष रूप से फलदायी माना गया है।
2. माँ ललिता को ‘त्रिपुर सुंदरी’ क्यों कहा जाता है?
‘त्रिपुर’ का अर्थ है तीन पुर यानी तीन लोक (स्वर्ग, पाताल, पृथ्वी) अथवा जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएं। इन तीनों में सबसे सुंदर, तेजस्वी और अधिष्ठात्री होने के कारण इन्हें ‘त्रिपुर सुंदरी’ कहा जाता है।
3. आरती करते समय माँ ललिता को कौन सा भोग लगाना चाहिए?
माँ ललिता को लाल रंग की वस्तुएं अत्यंत प्रिय हैं। भोग में अनार, लाल सेब, दूध से बनी खीर, मखाने की खीर या शुद्ध देसी घी का हलवा अर्पित करना सबसे शुभ माना जाता है।
4. माँ ललिता की आरती करने से कौन से विशेष लाभ मिलते हैं?
नियमित आरती करने से घर से नकारात्मक शक्तियां और नजर दोष दूर होते हैं। पारिवारिक कलह समाप्त होती है, आर्थिक तंगी दूर होकर व्यापार और नौकरी में उन्नति मिलती है तथा मन को गहरी शांति प्राप्त होती है।
5. क्या गृहस्थ (सामान्य परिवार वाले) माँ ललिता की आरती कर सकते हैं?
हां, बिल्कुल। यद्यपि माँ ललिता श्रीविद्या की प्रमुख तांत्रिक देवी हैं, लेकिन इनकी यह सरल आरती कोई भी गृहस्थ परिवार पूरी श्रद्धा, प्रेम और सात्विक भाव से कर सकता है। इसके लिए किसी कठिन नियम की आवश्यकता नहीं होती।
6. आरती करते समय कौन सा दीपक प्रज्वलित करना चाहिए?
माँ ललिता की आरती में शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाना सबसे उत्तम है। बत्ती में लाल कलावे (मौली) की बाती का उपयोग करना देवी पूजन में अत्यंत शुभ माना जाता है।
🙏 माँ त्रिपुर सुंदरी की कृपा सभी तक पहुंचाएं!
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डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई माँ ललिता की आरती, पौराणिक कथा और पूजन नियम ब्रह्मांड पुराण के ललिता उपाख्यान और सनातन मान्यताओं पर आधारित हैं, जिन्हें आम पाठकों की समझ के लिए आसान हिंदी में प्रस्तुत किया गया है।