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Sukhkarta Dukhharta मराठी आरती divine image of Lord Ganesha in golden temple court

सुखकर्ता दुखहर्ता (Sukhkarta Dukhharta) मराठी आरती: संपूर्ण मूल पाठ, हिंदी अर्थ और भावार्थ

सनातन परंपरा में किसी भी शुभ कार्य, पूजा-अनुष्ठान या मांगलिक आयोजन की शुरुआत प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश के नमन से होती है। जब गणेशोत्सव या दैनिक पूजन में सुखकर्ता दुखहर्ता (Sukhkarta Dukhharta) मराठी आरती का गायन होता है, तो पूरा वातावरण एक विशेष आध्यात्मिक शांति और दिव्यता से भर उठता है। यह पावन स्तुति केवल एक आरती नहीं है, बल्कि भक्त के हृदय से निकली वह सहज पुकार है जो जीवन के हर संकट और विघ्न को पल भर में दूर कर देती है।

यह अद्भुत रचना मूल रूप से मराठी भाषा में होने के कारण अधिकांश हिंदी भाषी श्रद्धालु इसके गूढ़ और सुंदर शब्दों का सही अर्थ नहीं समझ पाते। जब हम एक-एक शब्द के मर्म को समझकर प्रभु के सम्मुख यह स्तुति गाते हैं, तो पूजा का भाव कई गुना बढ़ जाता है। आइए, इस संपूर्ण लेख में हम इस दिव्य आरती के हर एक शब्द का सरल हिंदी अर्थ, भगवान से सीधे संवाद करता हुआ प्रार्थना-भावार्थ और इसका प्रामाणिक इतिहास विस्तार से जानें।

पहचान व स्वरूप: भगवान श्री गणेश जी की सर्वाधिक प्रसिद्ध, लोकमान्य और सिद्ध मराठी आरती।

आरती के रचयिता: छत्रपति शिवाजी महाराज के आध्यात्मिक गुरु, समर्थ रामदास स्वामी (17वीं शताब्दी)।

भगवान का पावन रूप: सर्वांग पर लाल सिंदूर का लेप, गले में जगमगाती मोतियों की माला, हीरेजड़ित मुकुट और अभय मुद्रा।

मुख्य कथा व रचना स्थल: महाराष्ट्र के पुणे स्थित प्रसिद्ध अष्टविनायक तीर्थक्षेत्र मयूरेश्वर (मोरगांव) में साक्षात भाव-दर्शन के समय रचित।

प्रिय भोग/प्रसाद: शुद्ध घी से बने मोदक, 21 दूर्वा (दूब) की गांठें और गुड़-चना।

आरती का सबसे उत्तम समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय, संध्या वंदन और गणेश पूजन के समापन पर।

Table of Contents

सुखकर्ता दुखहर्ता मराठी आरती (मूल पाठ)

सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची।
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥ (ध्रुवपद)रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा।
चंदनाची उटी कुमकुमकेशरा।
हीरेजडित मुकुट शोभतो बरा।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया॥जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥

लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना।
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना।
दास रामाचा वाट पाहे सदना।
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥

सुखकर्ता दुखहर्ता मराठी आरती: पदवार A-to-Z शब्दार्थ एवं प्रार्थना-भावार्थ

सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची।
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥

सुखकर्ता = समस्त सुखों और आनंद को देने वाले। | दुखहर्ता = जीवन के सभी दुखों, कष्टों और मानसिक चिंताओं को समाप्त करने वाले। | वार्ता = बात, चर्चा या लेशमात्र संकेत। | विघ्नाची = विघ्नों, बाधाओं और अड़चनों की। | नुरवी = बाकी न रखना, पूरी तरह मिटा देना (अर्थात विघ्न की बात तक न बचने देना)। | पुरवी = पूर्ण करना, पूरी तरह भर देना। | प्रेम = निर्मल भक्ति-स्नेह। | कृपा = करुणामयी दृष्टि और अनुग्रह। | जयाची = जिनकी (अर्थात जिन गणपति बप्पा की)। | सर्वांगी = समस्त अंगों पर, पूरे शरीर पर। | सुंदर = मनमोहक। | उटी = गाढ़ा लेप अथवा उबटन। | शेंदुराची = लाल सिंदूर की। | कंठी = कंठ में, गले पर। | झळके = दिव्य तेज से चमकती है। | माळ = हार या माला। | मुक्ताफळांची = सच्चे और उज्ज्वल मोतियों की।
हे मंगलकारी गणपति बप्पा! आप सभी सुखों के दाता हैं और हमारे समस्त दुखों को हरने वाले हैं। आपकी दयालु कृपा जिस पर भी हो जाती है, उसके जीवन में संकट और बाधाओं की चर्चा तक शेष नहीं रहती। आप अपने भक्तों के अंतर्मन को दिव्य प्रेम और आनंद से परिपूर्ण कर देते हैं। आपके समस्त अंगों पर लाल सिंदूर का पावन लेप मन को मोह लेता है और आपके कंठ में सुंदर मोतियों की माला दिव्य रूप से चमक रही है। हे कृपानिधान! मैं आपके पावन चरणों में हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ, मेरे जीवन के समस्त अमंगल को हर लीजिए और मेरे हृदय को अपनी निर्मल भक्ति से भर दीजिए।

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥

जय देव जय देव = हे देवों के देव, आपकी सदा सर्वदा जय हो। | मंगलमूर्ती = समस्त शुभ, कल्याण और मंगल के साक्षात स्वरूप भगवान का रूप। | दर्शनमात्रे = केवल आपके पावन रूप का दर्शन करने मात्र से ही। | मनकामना = हृदय की समस्त शुभ इच्छाएं और संकल्प। | पुरती = सिद्ध और पूर्ण हो जाती हैं।
हे देवाधिदेव मंगलमूर्ति! आपकी निरंतर जय-जयकार हो। आपका स्वरूप इतना दयालु और कल्याणकारी है कि केवल आपके पावन दर्शन करने मात्र से ही भक्त के मन की हर शुभ अभिलाषा पूर्ण हो जाती है। हे बप्पा! हम आपके पावन दरबार में शीश झुकाए खड़े हैं, अपनी करुणामयी दृष्टि हम पर बनाए रखिए और हमारे जीवन में सदैव सद्बुद्धि, सुख और मंगल का वास बनाए रखिए।

रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा।
चंदनाची उटी कुमकुमकेशरा।
हीरेजडित मुकुट शोभतो बरा।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया॥

रत्नखचित = बहुमूल्य रत्नों और मणियों से जड़ा हुआ। | फरा = कमर पर पहना जाने वाला विशेष सुवर्ण कमरबंद अथवा वक्ष-अलंकार। | तुज = आपको, आपके पावन स्वरूप पर। | गौरीकुमरा = माता पार्वती (गौरी) के लाडले सुपुत्र (कुमार)। | चंदनाची = शीतल और सुगंधित चंदन की। | उटी = लेप या तिलक। | कुमकुमकेशरा = कुमकुम (रोली) और विशुद्ध केसर युक्त। | हीरेजडित = जगमगाते हीरों से सजा हुआ। | मुकुट = मस्तक का मुकुट। | शोभतो बरा = अत्यंत सुंदर और शोभायमान प्रतीत होता है। | रुणझुणती = मधुर छम-छम या रुनझुन की ध्वनि करना। | नूपुरे = पैरों में पहने जाने वाले नूपुर या पायल। | चरणी = पावन चरणों में। | घागरिया = छोटी घुंघरुओं की लड़ियाँ।
हे माता पार्वती के प्यारे पुत्र गौरीकुमार! आपके पावन स्वरूप पर रत्नों से जड़े आभूषण शोभायमान हैं। आपके मस्तक और शरीर पर शीतल चंदन, कुमकुम और केसर का सुगंधित लेप लगा हुआ है, जिसकी सुगंध चारों ओर फैल रही है। आपके मस्तक पर हीरों से जड़ा दिव्य मुकुट अत्यधिक सुंदर लग रहा है और जब आप चलते हैं, तो आपके पावन चरणों में बंधी पायलों और घुंघरुओं से मीठी रुनझुन ध्वनि गूंजती है। हे प्रभु! अपने इस मनभावन रूप के दर्शन देकर हमारे मन की सारी चिंताएं और अशांति समाप्त कर दीजिए।

लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना।
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना।
दास रामाचा वाट पाहे सदना।
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना॥

लंबोदर = विशाल उदर वाले, जो संपूर्ण जगत के अनुभवों को समेटे हुए हैं। | पीतांबर = पीले रंग के दिव्य रेशमी वस्त्र। | फणिवरबंधना = फणधारी नागराज को कमरबंद के रूप में धारण करने वाले। | सरळ सोंड = सीधी और सुंदर सूंड। | वक्रतुंड = घुमावदार सूंड वाले, जो कुटिल संकटों को सीधा कर देते हैं। | त्रिनयना = तीन दिव्य नेत्रों वाले। | दास रामाचा = संत समर्थ रामदास स्वामी (आरती के रचयिता, जो स्वयं को प्रभु का सेवक कहते हैं)। | वाट पाहे = राह देख रहा है, निरंतर प्रतीक्षा कर रहा है। | सदना = अपने घर में तथा अंतर्मन के हृदय-मंदिर में। | संकटी = विपत्ति, संकट और कठिन समय आने पर। | पावावे = रक्षा हेतु तुरंत उपस्थित होना, सहायता करना। | निर्वाणी = जीवन के अंतिम समय में (मोक्ष काल) या जब कोई सहारा न बचे। | रक्षावे = संकट से रक्षा करना, उद्धार करना। | सुरवरवंदना = सुरवर (इंद्र आदि श्रेष्ठ देवताओं) द्वारा नित्य पूजित और वंदनीय।
हे लंबोदर! हे पीतांबरधारी, नागराज को अपनी कमर पर धारण करने वाले त्रिनेत्रधारी प्रभु! आप सभी श्रेष्ठ देवी-देवताओं द्वारा पूजनीय हैं। आपका यह सेवक दिन-रात अपने घर और हृदय के द्वार खोले आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रहा है। हे बप्पा! जब भी मेरे जीवन पर कोई संकट आए, आप तुरंत मेरी रक्षा करने पहुंचें और इस भवसागर के अंतिम समय में भी मुझे अपनी शरण देकर मेरा उद्धार करें। हे दयानिधि देव! अपनी शरण में आए इस बालक की रक्षा कीजिए।

सुखकर्ता दुखहर्ता (Sukhkarta Dukhharta) आरती का प्रामाणिक इतिहास और आध्यात्मिक रहस्य

इस अत्यंत भावपूर्ण आरती की रचना 17वीं सदी में महाराष्ट्र के महान संत और छत्रपति शिवाजी महाराज के आध्यात्मिक गुरु समर्थ रामदास स्वामी ने की थी। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, जब समर्थ रामदास जी महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित अष्टविनायक तीर्थ मयूरेश्वर (मोरगांव) मंदिर पहुंचे, तो वे श्री गणेश के सिंदूर-चर्चित पावन स्वरूप को देखकर भाव-विभोर हो गए। उसी अनन्य भक्ति और साक्षात दर्शन के प्रभाव से उनके मुख से यह आरती सहज रूप से प्रस्फुटित हुई थी। संत समर्थ रामदास जी के जीवन और उनकी भक्ति परंपरा के प्रामाणिक ऐतिहासिक संदर्भ के लिए आप समर्थ रामदास स्वामी का ऐतिहासिक शोध पृष्ठ देख सकते हैं।

आरती में केवल बाहरी रूप का वर्णन नहीं है, बल्कि गहरा आध्यात्मिक संदेश है। गणेश जी का ‘लंबोदर’ रूप यह सिखाता है कि जीवन में आने वाले सभी सुख और दुख, मान और अपमान को बिना विचलित हुए समभाव से पचा लेना चाहिए। आरती की अंतिम पंक्ति ‘संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे’ केवल भौतिक संकटों से बचाव की प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह जीवन के आवागमन चक्र और मायावी बंधनों से छूटकर परम मोक्ष प्राप्त करने की अंतिम याचना है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. ‘सुखकर्ता दुखहर्ता’ आरती के वास्तविक रचयिता कौन हैं?

इस आरती की रचना 17वीं शताब्दी के महान संत समर्थ रामदास स्वामी जी ने मोरगांव (मयूरेश्वर तीर्थ) में भगवान गणेश के साक्षात दर्शन के उपरांत की थी।

2. आरती में ‘दास रामाचा’ शब्द का क्या अर्थ है?

‘दास रामाचा’ रचयिता समर्थ रामदास स्वामीजी का परिचायक है। वे प्रभु श्री राम के परम भक्त थे और उन्होंने इस स्तुति में स्वयं को भगवान गणेश का अनन्य दास बताया है।

3. क्या ‘सुखकर्ता दुखहर्ता’ के बाद गाई जाने वाली ‘शेंदुर लाल चढ़ायो’ भी इसी आरती का भाग है?

नहीं, तकनीकी रूप से मूल आरती ‘संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे’ पर समाप्त हो जाती है। इसके बाद गाई जाने वाली ‘शेंदुर लाल चढ़ायो’ ब्रज/हिंदी भाषा की एक अलग स्तुति है, जिसके रचयिता संत गोसावीनंदन हैं।

4. क्या गैर-मराठी भाषी भक्त भी इस आरती का गान कर सकते हैं?

हाँ, बिल्कुल। भगवान भाव के भूखे होते हैं। सरल मराठी में होने के कारण हिंदी भाषी श्रद्धालु भी इसके शब्दार्थ समझकर अत्यंत सरलता और श्रद्धा से इसका पाठ कर सकते हैं।

5. ‘फणिवरबंधना’ शब्द का क्या महत्व है?

‘फणिवर’ का अर्थ नागराज शेषनाग है। भगवान गणेश ने नागराज को कमरबंद के रूप में धारण किया हुआ है, जो काल और शक्ति के नियंत्रण का प्रतीक है।

6. इस आरती को करने का सबसे श्रेष्ठ समय कौन सा है?

प्रातःकाल की पूजा और संध्या आरती के समय इसका गायन सबसे शुभ माना जाता है। विशेषकर गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी और बुधवार को इसका पाठ अत्यंत कल्याणकारी होता है।

7. इस आरती का नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है?

मान्यता है कि नित्य इस आरती का भावपूर्वक गान करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है, मानसिक शांति मिलती है और अटके हुए कार्य निर्विघ्न पूरे होते हैं।

गणपति बप्पा के इस पावन आशीर्वाद और आरती के सरल अर्थ को अपने प्रियजनों के साथ साझा करें!

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धार्मिक व सामग्री सूचना: यह आलेख मान्य सनातन परंपराओं, अष्टविनायक तीर्थक्षेत्र के प्रामाणिक इतिहास और संत समर्थ रामदास स्वामी जी की मूल रचना के गहन शोध पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों तक प्रामाणिक एवं शुद्ध भक्तिपरक जानकारी पहुंचाना है।

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