द्वादश (12/ बारहा) ज्योतिर्लिंगों में प्रधान भगवान शिव की पावन नगरी काशी केवल मोक्ष का द्वार नहीं, बल्कि समस्त शुभता और मंगलों का मूल केंद्र है। सनातन परंपरा में देवाधिदेव महादेव की नित्य कृपा और कल्याण के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़ा काशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्रम् (Kashi Vishwanath Mangal Stotram) अत्यंत दुर्लभ और चमत्कारी पाठ माना गया है। यह स्तोत्र किसी सामान्य आरती का भाग नहीं, बल्कि नित्य प्रातःकाल भगवान विश्वेश्वर के सम्मुख बैठकर किया जाने वाला शास्त्रीय स्तवन है।
इस परम कल्याणकारी स्तोत्र की रचना काशीपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी महेश्वरानन्द सरस्वती जी द्वारा की गई थी। इसमें कुल 11 श्लोक हैं, जिनमें पहले 7 श्लोकों में महादेव के मंगलमय रूप का स्तवन है और अंतिम 4 श्लोकों में इसकी चमत्कारी फलश्रुति बताई गई है। मान्यता है कि इसका नित्य पाठ करने से घर से दरिद्रता, भय और कलह हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं।
त्वरित तथ्य: काशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्रम् (Quick Fact Box)
- स्तोत्र का नाम: श्री काशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्रम् (Kashi Vishwanath Mangal Stotram)
- रचयिता: काशीपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी महेश्वरानन्द सरस्वती जी
- श्लोक संख्या: कुल 11 श्लोक (7 स्तुति श्लोक + 4 फलश्रुति व समर्पण)
- पाठ का श्रेष्ठ समय: प्रातःकाल (ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय वेला)
- मुख्य फल: दारिद्र्य नाश, दीर्घायु, उत्तम जीवनसाथी, संतान सुख व मोक्ष
- आधिकारिक संदर्भ: काशी विश्वनाथ मंदिर – विकिपीडिया
काशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्रम् का प्रामाणिक इतिहास व महत्व (Sacred History)
सनातन परंपरा में ‘मंगल’ का अर्थ केवल सांसारिक लाभ नहीं, बल्कि आत्मा का परम कल्याण है। जब काशीपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी महेश्वरानन्द सरस्वती जी ने काशी विश्वनाथ के पावन चरणों में बैठकर इस स्तोत्र की रचना की, तब उन्होंने इसमें भगवान शिव के शांत, करुणानिधान और दारिद्र्य-दहन स्वरूप को प्रमुखता से पिरोया।
अक्सर लोग इसे आरती समझ लेते हैं, परंतु यह मूलतः ‘स्तवराज’ यानी स्तोत्रों का राजा है। जो भक्त प्रतिदिन काशी नहीं जा पाते, वे अपने घर के पूजाघर में बैठकर इस स्तोत्र का वाचन करते हैं। इसके नियमित पाठ से मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और जीवन में आने वाली हर बाधा शांत हो जाती है।
श्री काशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्रम्: केवल मूल पाठ (Printable Stotram Lyrics)
दैनिक पूजा और नित्य पाठ की सुविधा के लिए नीचे संपूर्ण 11 श्लोकों का केवल मूल पाठ दिया गया है। आप सीधे प्रिंट बटन दबाकर इसे A4 पेज पर निकाल सकते हैं:
गङ्गाधरं शशिकिशोरधरं त्रिलोकी-रक्षाधरं निटिलचन्द्रधरं त्रिधारम्।
भस्मावधूलनधरं गिरिराजकन्या-दिव्यावलोकनधरं वरदं प्रपद्ये॥ १॥
काशीश्वरं सकलभक्तजनार्तिहारं विश्वेश्वरं प्रणतपालनभव्यभारम्।
रामेश्वरं विजयदानविधानधीरं गौरीश्वरं वरदहस्तधरं नमामः॥ २॥
गङ्गोत्तमाङ्गकलितं ललितं विशालं तं मङ्गलं गरलनीलगलं ललामम्।
श्रीमुण्डमाल्यवलयोज्ज्वलमञ्जुलीलं लक्ष्मीश्वरार्चितपदाम्बुजमाभजामः॥ ३॥
दारिद्र्यदुःखदहनं कमनं सुराणां दीनार्तिदावदहनं दमनं रिपूणाम्।
दानं श्रियां प्रणमनं भुवनाधिपानां मानं सतां वृषभवाहनमानमामः॥ ४॥
श्रीकृष्णचन्द्रशरणं रमणं भवान्याः शश्वत्प्रपन्नभरणं धरणं धरायाः।
संसारभारहरणं करुणं वरेण्यं सन्तापतापकरणं करवै शरण्यम्॥ ५॥
चण्डीपिचण्डिलवितुण्डधृताभिषेकं श्रीकार्तिकेयकलनृत्यकलावलोकम्।
नन्दीश्वरास्यवरवाद्यमहोत्सवाढ्यं सोल्लासहासगिरिजं गिरिशं तमीडे॥ ६॥
श्रीमोहिनीनिविडरागभरोपगूढं योगेश्वरेश्वरहृदम्बुजवासरासम्।
सम्मोहनं गिरिसुताञ्चितचन्द्रचूडं श्रीविश्वनाथमधिनाथमुपैमि नित्यम्॥ ७॥
प्रातः प्रभाते शिवसन्निधौ यः पठेच्च भक्त्या स्तवराजमेतम्।
स सर्वसौख्यं लभते मनुष्यः परत्र मुक्तेः पदवीं प्रयाति॥ ८॥
आयुःप्रकर्षं विमलं यशश्च विद्यां श्रियं चापि लभेन्नरः सः।
न तस्य पीडा कलिजा भवेद्धि काशीशपादद्वयसक्तचित्ते॥ ९॥
कन्या वरं प्राप्नुहि कामरूपं भार्यां सुरूपां सुभगः पुमांश्च।
अपुत्रको लभते पुत्रमेकं धनं दरिद्रो लभते ह्यपारम्॥ १०॥
महेश्वरानन्दयतीन्द्रगीतं स्तवं पठेद्यः खलु विश्वभर्तुः।
स याति सायुज्यमशेषवन्द्यं नमोऽस्तु विश्वेश्वर विश्वरूप॥ ११॥
श्लोकवार शब्दार्थ एवं संवादात्मक प्रार्थना-भावार्थ (Detailed Meaning)
१. मंगल स्वरूप स्तुति (Shlok 1)
गङ्गाधरं शशिकिशोरधरं त्रिलोकी-रक्षाधरं निटिलचन्द्रधरं त्रिधारम्।
भस्मावधूलनधरं गिरिराजकन्या-दिव्यावलोकनधरं वरदं प्रपद्ये॥ १॥
कठिन शब्दों के सरल अर्थ:
- गङ्गाधरं = पावन गंगाजी को मस्तक पर धारण करने वाले
- शशिकिशोरधरं = बाल चंद्रमा (द्वितीया के चांद) को धारण करने वाले
- त्रिलोकी-रक्षाधरं = तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) की रक्षा का भार उठाने वाले
- निटिलचन्द्रधरं = अपने ललाट (माथे) पर चंद्रमा सजाने वाले
- त्रिधारम् = गंगाजी की पवित्र तीन धाराओं को संभालने वाले
- भस्मावधूलनधरं = अपने पावन शरीर पर दिव्य भस्म का लेप रमाने वाले
- गिरिराजकन्या = हिमालय की पावन पुत्री माता पार्वती
- दिव्यावलोकनधरं = माता पार्वती को दिव्य व स्नेहपूर्ण दृष्टि से निहारने वाले
- वरदं = सभी भक्तों को मनचाहा वरदान देने वाले दयालु शिव
- प्रपद्ये = मैं अनन्य भाव से आपकी शरण में जाता हूँ
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे देवाधिदेव महादेव! आप अपने मस्तक पर गंगाजी की पावन धारा और बाल चंद्रमा को धारण करते हैं। आप ही तीनों लोकों के रक्षक हैं। अपने पावन रूप पर दिव्य भस्म रमाकर आप माता पार्वती को स्नेह से निहारते हैं। हे वरदान देने वाले दयालु प्रभु! मैं अनन्य भाव से आपकी पावन शरण में आता हूँ, मेरी रक्षा कीजिए।
२. शरणागत पालन स्तुति (Shlok 2)
काशीश्वरं सकलभक्तजनार्तिहारं विश्वेश्वरं प्रणतपालनभव्यभारम्।
रामेश्वरं विजयदानविधानधीरं गौरीश्वरं वरदहस्तधरं नमामः॥ २॥
कठिन शब्दों के सरल अर्थ:
- काशीश्वरं = मोक्ष नगरी काशी के परम स्वामी व राजा
- सकलभक्तजनार्तिहारं = अपने सभी भक्तों की हर प्रकार की पीड़ा व कष्ट हरने वाले
- विश्वेश्वरं = संपूर्ण ब्रह्मांड के एक मात्र स्वामी
- प्रणतपालनभव्यभारम् = जो भी जीव चरणों में झुकता है, उसकी रक्षा का पूरा भार स्वयं संभालने वाले
- रामेश्वरं = मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के परम आराध्य देव
- विजयदानविधानधीरं = धर्म की रक्षा के लिए सदा विजय का वरदान देने वाले
- गौरीश्वरं = माता गौरी (पार्वती जी) के प्राणनाथ
- वरदहस्तधरं = सदा अभय और आशीर्वाद की मुद्रा में उठे हाथों वाले
- नमामः = हम सब हाथ जोड़कर बारंबार नमन करते हैं
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे काशी के राजा, हे संपूर्ण जगत के स्वामी विश्वेश्वर! आप अपने भक्तों की हर पीड़ा और संकट को पलभर में हर लेते हैं। जो भी जीव आपके चरणों में समर्पित होता है, आप उसके जीवन का पूरा भार स्वयं उठा लेते हैं। आप ही प्रभु श्री राम के आराध्य हैं। हे माता गौरी के स्वामी! वरदान देने वाले अपने पावन हाथों से हमारे शीश पर कृपा बनाए रखिए, हम आपको नमन करते हैं।
३. नीलकंठ व मंजुल लीला (Shlok 3)
गङ्गोत्तमाङ्गकलितं ललितं विशालं तं मङ्गलं गरलनीलगलं ललामम्।
श्रीमुण्डमाल्यवलयोज्ज्वलमञ्जुलीलं लक्ष्मीश्वरार्चितपदाम्बुजमाभजामः॥ ३॥
कठिन शब्दों के सरल अर्थ:
- गङ्गोत्तमाङ्गकलितं = जिनके मस्तक पर गंगाजी की कलकल धारा सुशोभित है
- ललितं विशालं = अत्यंत सुंदर, मनोहर और अनंत स्वरूप वाले
- गरलनीलगलं = संसार की रक्षा हेतु हलाहल विष पीकर नीले कंठ वाले (नीलकंठ)
- ललामम् = तीनों लोकों में सबसे मनमोहक व सुंदर
- श्रीमुण्डमाल्यवलय = गले में मुंडों की माला और हाथों में कंगन पहनने वाले
- उज्ज्वलमञ्जुलीलं = अत्यंत दिव्य, पावन और मन को आनंद देने वाली लीलाएं रचने वाले
- लक्ष्मीश्वरार्चितपदाम्बुजम् = स्वयं माता लक्ष्मी के पति भगवान श्री विष्णु जिनके चरणकमलों की पूजा करते हैं
- आभजामः = हम ऐसे परम कृपालु भगवान शिव का निरंतर भजन-कीर्तन करते हैं
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे नीलकंठ महादेव! आपके मस्तक पर गंगाजी शोभा पा रही हैं। संसार की रक्षा के लिए विष पीकर भी आपका रूप परम मंगलकारी और मनमोहक प्रतीत होता है। आपके गले में मुंडों की माला और हाथों में कंगन सुशोभित हैं। हे प्रभु! वैकुंठनाथ भगवान विष्णु जिन चरणकमलों की पूजा करते हैं, हम भी उन्हीं पावन चरणों की निरंतर सेवा करते हैं।
४. दारिद्र्य दहन स्तुति (Shlok 4)
दारिद्र्यदुःखदहनं कमनं सुराणां दीनार्तिदावदहनं दमनं रिपूणाम्।
दानं श्रियां प्रणमनं भुवनाधिपानां मानं सतां वृषभवाहनमानमामः॥ ४॥
कठिन शब्दों के सरल अर्थ:
- दारिद्र्यदुःखदहनं = जीवन की घोर दरिद्रता, कंगाली और दुखों को अग्नि की भांति भस्म करने वाले
- कमनं सुराणां = सभी देवी-देवताओं के सबसे प्रिय और मनोवांछित देव
- दीनार्तिदावदहनं = दीन-दुखियों के संकट रूपी जंगल को जलाने वाले दावानल
- दमनं रिपूणाम् = काम, क्रोध, लोभ, अहंकार और बाहरी शत्रुओं का नाश करने वाले
- दानं श्रियां = अपने भक्तों को अखंड सुख, ऐश्वर्य और धन-संपत्ति देने वाले
- प्रणमनं भुवनाधिपानां = चौदह भुवनों के स्वामी जिनके आगे शीश नवाते हैं
- मानं सतां = सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाले संतों का सम्मान बढ़ाने वाले
- वृषभवाहनम् = नंदी बैल की सवारी करने वाले भोलेनाथ
- आनमामः = हम सब पूरी श्रद्धा से उनके आगे नतमस्तक होते हैं
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे कृपानिधान! आप अपने भक्तों के जीवन से कंगाली, दरिद्रता और गहरे दुखों को अग्नि की भांति जलाकर भस्म कर देते हैं। आप दीनों के संकट दूर करने वाले और समस्त बुराइयों का दमन करने वाले हैं। आप सभी को सुख-समृद्धि का दान देते हैं और देवता भी आपके चरणों में झुकते हैं। हे नंदी पर सवार भोलेनाथ! हम आपको शीश नवाते हैं।
५. भवताप नाशक स्तुति (Shlok 5)
श्रीकृष्णचन्द्रशरणं रमणं भवान्याः शश्वत्प्रपन्नभरणं धरणं धरायाः।
संसारभारहरणं करुणं वरेण्यं सन्तापतापकरणं करवै शरण्यम्॥ ५॥
कठिन शब्दों के सरल अर्थ:
- श्रीकृष्णचन्द्रशरणं = साक्षात भगवान श्री कृष्ण के परम आश्रय व रक्षक
- रमणं भवान्याः = माता भवानी (पार्वती जी) को नित्य आनंदित करने वाले प्रिय पति
- शश्वत्प्रपन्नभरणं = हर पल, सदा शरणागत भक्तों का भरण-पोषण करने वाले
- धरणं धरायाः = इस संपूर्ण पृथ्वी और ब्रह्मांड को अपने आधार पर थामने वाले
- संसारभारहरणं = पृथ्वी और प्राणियों के पापों व दुखों का भारी बोझ हरने वाले
- करुणं वरेण्यं = साक्षात करुणा के सागर और सबसे श्रेष्ठ व पूजनीय
- सन्तापतापकरणं = संसार के तीनों तापों को शांत करने वाले
- करवै शरण्यम् = मैं केवल ऐसे दयालु भोलेनाथ की पावन शरण ग्रहण करता हूँ
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे प्रभु! आप भगवान श्रीकृष्ण के परम आश्रय और माता भवानी के प्राणप्रिय हैं। आप इस संपूर्ण पृथ्वी और सृष्टि के भार को संभालते हैं। आप भक्तों के दैहिक, दैविक और भौतिक संतापों को शांत करने वाले परम करुणामय हैं। हे भोले बाबा! इस संसार सागर में भटके हुए हम जीवों को अपनी छत्रछाया प्रदान कीजिए, हम केवल आपकी शरण में हैं।
६. दिव्य परिवार व आनंद लीला (Shlok 6)
चण्डीपिचण्डिलवितुण्डधृताभिषेकं श्रीकार्तिकेयकलनृत्यकलावलोकम्।
नन्दीश्वरास्यवरवाद्यमहोत्सवाढ्यं सोल्लासहासगिरिजं गिरिशं तमीडे॥ ६॥
कठिन शब्दों के सरल अर्थ:
- चण्डीपिचण्डिलवितुण्ड = विशाल उदर और सूंड़ वाले विघ्नहर्ता बाल गणेश
- धृताभिषेकं = गणेश जी द्वारा अपनी सूंड़ से जल भरकर किए जा रहे अभिषेक को स्वीकार करने वाले
- श्रीकार्तिकेयकलनृत्य = ज्येष्ठ पुत्र भगवान कार्तिकेय का सुंदर और मनमोहक नृत्य
- कलावलोकम् = कार्तिकेय के नृत्य को अपार वात्सल्य और प्रेम से देखने वाले
- नन्दीश्वरास्यवरवाद्य = नंदी जी के मुख व हाथों से बज रहे श्रेष्ठ और दिव्य वाद्ययंत्र
- महोत्सवाढ्यं = मंगला बेला के उस दिव्य उत्सव और आनंद में लीन रहने वाले
- सोल्लासहासगिरिजं = अपने पूरे परिवार और माता पार्वती को हंसी-खुशी व उल्लास से भरने वाले
- गिरिशं तमीडे = कैलास पर्वत के स्वामी ऐसे परम कृपालु शिव की मैं स्तुति करता हूँ
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे कैलासपति गिरिश! बाल गणेश अपनी सूंड़ से आपके पावन रूप पर जल से अभिषेक कर रहे हैं और आप प्रेम भाव से अपने पुत्र कार्तिकेय के सुंदर नृत्य को निहार रहे हैं। नंदीश्वर और आपके गण दिव्य वाद्ययंत्र बजाकर आनंद मना रहे हैं। हे माता पार्वती को आनंदित करने वाले प्रभु! आपके इस सुखद और दिव्य परिवार रूप की मैं हृदय से वंदना करता हूँ।
७. विश्वनाथ परमेश्वर स्तुति (Shlok 7)
श्रीमोहिनीनिविडरागभरोपगूढं योगेश्वरेश्वरहृदम्बुजवासरासम्।
सम्मोहनं गिरिसुताञ्चितचन्द्रचूडं श्रीविश्वनाथमधिनाथमुपैमि नित्यम्॥ ७॥
कठिन शब्दों के सरल अर्थ:
- श्रीमोहिनीनिविडराग = अपनी अलौकिक माया और अगाध प्रेम से संपूर्ण जगत को बांधने वाले
- भरोपगूढं = गहन और गंभीर आध्यात्मिक रहस्यों से परिपूर्ण
- योगेश्वरेश्वर = बड़े-बड़े सिद्ध योगियों, ज्ञानियों और ऋषियों के भी परम आराध्य ईश्वर
- हृदम्बुजवासरासम् = भक्तों और संतों के हृदय रूपी कमल में नित्य वास करने वाले
- सम्मोहनं = जिनका शांत और सौम्य स्वरूप हर किसी के मन को मोह लेता है
- गिरिसुताञ्चित = पर्वतराज पुत्री माता पार्वती द्वारा प्रेमपूर्वक पूजित
- चन्द्रचूडं = जिनके सिर के जूड़े पर चंद्रमा जगमगा रहा है
- श्रीविश्वनाथमधिनाथम् = काशी के राजा और संपूर्ण सृष्टि के परम प्रभु विश्वनाथ
- उपैमि नित्यम् = मैं प्रतिदिन, निरंतर केवल उन्हीं के चरणों में उपस्थित होता हूँ
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे जगत नियंता! आप बड़े-बड़े योगियों और तपस्वियों के हृदय कमल में नित्य वास करते हैं। आपका शांत और मनोहर रूप संपूर्ण संसार को शांति प्रदान करने वाला है। माता पार्वती के संग विराजित, मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले हे काशी के परमेश्वर श्री विश्वनाथ! मैं हर दिन, हर क्षण केवल आपकी ही पावन शरण ग्रहण करता हूँ।
८. फलश्रुति: प्रात: स्मरण महिमा (Shlok 8)
प्रातः प्रभाते शिवसन्निधौ यः पठेच्च भक्त्या स्तवराजमेतम्।
स सर्वसौख्यं लभते मनुष्यः परत्र मुक्तेः पदवीं प्रयाति॥ ८॥
कठिन शब्दों के सरल अर्थ:
- प्रातः प्रभाते = भोर की पावन वेला में, सूर्योदय से पूर्व ब्रह्ममुहूर्त के समय
- शिवसन्निधौ = शिवलिंग के सम्मुख या भगवान शिव की पावन प्रतिमा के सामने बैठकर
- यः पठेच्च = जो कोई भी साधक अथवा भक्त पाठ करता है
- भक्त्या = छल-कपट छोड़कर केवल सच्चे प्रेम और निष्कपट श्रद्धा के साथ
- स्तवराजमेतम् = इस श्रेष्ठ ‘मंगल स्तोत्र’ को, जो स्तोत्रों का राजा है
- स सर्वसौख्यं लभते = वह मनुष्य इस पृथ्वी पर जीवन के समस्त सुख व आनंद पाता है
- परत्र = मृत्यु के उपरांत, परलोक में
- मुक्तेः पदवीं प्रयाति = मोक्ष के सर्वोच्च पद (शिव-लोक) को प्राप्त करता है
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे कृपालु शिव! जो भी साधक प्रातःकाल आपके पावन सानिध्य में बैठकर सच्चे प्रेम से इस मंगल स्तोत्र का पाठ करता है, वह इस संसार में आरोग्य, संतान, धन और समस्त सांसारिक सुख प्राप्त करता है। अंत समय में वह जन्म-मरण के बंधन से छूटकर आपके परम मोक्ष धाम को प्राप्त होता है।
९. फलश्रुति: रोग-शोक नाश (Shlok 9)
आयुःप्रकर्षं विमलं यशश्च विद्यां श्रियं चापि लभेन्नरः सः।
न तस्य पीडा कलिजा भवेद्धि काशीशपादद्वयसक्तचित्ते॥ ९॥
कठिन शब्दों के सरल अर्थ:
- आयुःप्रकर्षं = निरोगी काया के साथ पूर्ण और दीर्घ आयु
- विमलं यशश्च = समाज में निष्कलंक, पवित्र और उज्ज्वल मान-सम्मान
- विद्यां श्रियं चापि = शुद्ध ज्ञान, सदबुद्धि और स्थिर लक्ष्मी (सुख-समृद्धि)
- लभेन्नरः सः = वह मनुष्य यह सब कुछ निश्चित रूप से प्राप्त कर लेता है
- न तस्य पीडा कलिजा = कलियुग के दोष, पाप, नकारात्मक ऊर्जा व बीमारियां उसे छू नहीं पातीं
- काशीशपादद्वयसक्तचित्ते = जिसका मन काशीपति विश्वनाथ के दोनों चरणकमलों में लग चुका हो
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे काशीपति! जिसका मन आपके दोनों चरणकमलों में लग जाता है, उसे कलियुग के कोई भी रोग, शोक, भय या दुख छू भी नहीं पाते। आप कृपा करके उसे दीर्घायु, निर्मल यश, शुद्ध विद्या और स्थिर लक्ष्मी प्रदान करते हैं। हमारे भीतर भी ऐसी ही अविचल श्रद्धा जगा दीजिए।
१०. फलश्रुति: सौभाग्य व संतान प्राप्ति (Shlok 10)
कन्या वरं प्राप्नुहि कामरूपं भार्यां सुरूपां सुभगः पुमांश्च।
अपुत्रको लभते पुत्रमेकं धनं दरिद्रो लभते ह्यपारम्॥ १०॥
कठिन शब्दों के सरल अर्थ:
- कन्या वरं प्राप्नुहि = विवाह योग्य कन्या को सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है
- कामरूपं = मनचाहा, गुणवान और श्रेष्ठ जीवनसाथी
- भार्यां सुरूपां = पुरुषों को सुंदर, सुशील और सद्गुणी पत्नी मिलती है
- सुभगः पुमांश्च = पुरुष सौभाग्यशाली, यशस्वी और सम्मानित बनता है
- अपुत्रको लभते पुत्रमेकं = संतानहीन दंपत्ति को योग्य और कुलदीपक संतान का सुख मिलता है
- धनं दरिद्रो लभते = धनहीन व निर्धन मनुष्य को धन-धान्य की प्राप्ति होती है
- ह्यपारम् = जिसकी कोई सीमा न हो, ऐसा अपार सुख और ऐश्वर्य
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे भोले भंडारी! इस मंगल स्तोत्र के प्रभाव से योग्य कन्याओं को मनोनुकूल श्रेष्ठ जीवनसाथी मिलता है और पुरुषों को सद्गुणी पत्नी प्राप्त होती है। संतान की इच्छा रखने वालों की गोद भर जाती है और निर्धन मनुष्य को अपार ऐश्वर्य व संतोष प्राप्त होता है। आप सबकी मनोकामना पूरी करने वाले कल्पवृक्ष हैं।
११. स्तोत्र समर्पण (Shlok 11)
महेश्वरानन्दयतीन्द्रगीतं स्तवं पठेद्यः खलु विश्वभर्तुः।
स याति सायुज्यमशेषवन्द्यं नमोऽस्तु विश्वेश्वर विश्वरूप॥ ११॥
कठिन शब्दों के सरल अर्थ:
- महेश्वरानन्दयतीन्द्रगीतं = काशीपीठाधीश्वर स्वामी महेश्वरानन्द सरस्वती जी द्वारा रचित
- स्तवं पठेद्यः खलु = जो भी निष्ठावान साधक इस स्तोत्र का पाठ करता है
- विश्वभर्तुः = संपूर्ण विश्व का पालन-पोषण करने वाले महादेव का
- स याति सायुज्यम् = वह मृत्यु के बाद सायुज्य मुक्ति पाता है
- अशेषवन्द्यं = जो संपूर्ण देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों द्वारा पूजनीय है
- नमोऽस्तु विश्वेश्वर = हे काशी विश्वेश्वर! आपको हमारा बारंबार प्रणाम है
- विश्वरूप = हे समस्त ब्रह्मांड के रूप में विद्यमान प्रभु, आपको नमन है
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे विश्वरूप महेश्वर! स्वामी महेश्वरानन्द जी द्वारा रचित इस स्तोत्र को जो भी जन पढ़ता है, वह आपके सायुज्य को प्राप्त कर लेता है। हे समस्त जगत के पालक विश्वनाथ! हम बार-बार हाथ जोड़कर आपके पावन रूप को शीश नवाते हैं।
काशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्र पाठ की सरल विधि व नियम (Nitya Path Vidhi)
इस स्तोत्र का पाठ अत्यंत सरल और गृहस्थों के लिए अत्यंत कल्याणकारी है। इसे अपनी नित्य पूजा में शामिल करने के लिए इन नियमों का पालन करें:
- नित्य समय: प्रातःकाल स्नान के उपरांत पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें।
- दीप प्रज्वलन: भगवान शिव के सम्मुख गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं।
- शिवलिंग पूजन: शिवलिंग अथवा भगवान शिव के चित्र पर श्वेत चंदन, अक्षत और बिल्वपत्र अर्पित करें।
- सस्वर पाठ: शांत मन से इन 11 श्लोकों का स्पष्ट उच्चारण करते हुए पाठ करें।
- समर्पण: पाठ के अंत में दोनों हाथ जोड़कर परिवार के कल्याण और समस्त पापों के क्षमा की प्रार्थना करें।
इन्हें भी जरूर पढ़ें (Recommended Reads)
- शिव आरती का सरल हिंदी अर्थ: जानिए हर पंक्ति का असली राज
- शिव तांडव आरती: Shiv Tandav Aarti ॐ जय गंगाधर जय गिरिजाधीशा का अर्थ व दुर्लभ पाठ
- महामृत्युंजय मंत्र: वैज्ञानिक, तांत्रिक और दार्शनिक रहस्य
- Aarti Kya Hai? आरती क्यों करते हैं? जानिए इसका वैदिक इतिहास व नियम
- श्री गंगा मैया की आरती: यम त्रास और पाप मिटाने वाली पावन स्तुति
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्रश्न 1: काशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्रम् के रचयिता कौन हैं?
उत्तर: इस परम पावन स्तोत्र की रचना काशीपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी महेश्वरानन्द सरस्वती जी द्वारा की गई थी।
प्रश्न 2: क्या यह काशी विश्वनाथ मंदिर की मंगला आरती है?
उत्तर: नहीं, मंदिर के गर्भगृह की मंगला आरती में मुख्य रूप से पुजारियों द्वारा शिव तांडव स्तोत्र और रुद्राष्टाध्यायी के वैदिक मंत्र गाए जाते हैं। यह ‘काशी विश्वनाथ मंगल स्तोत्रम्’ एक स्वतंत्र नित्य स्तवन पाठ है।
प्रश्न 3: इस स्तोत्र के पाठ से क्या विशेष लाभ मिलता है?
उत्तर: स्तोत्र की फलश्रुति के अनुसार, इसका नित्य पाठ करने से कलियुग के कष्ट मिटते हैं, असाध्य रोगों से रक्षा होती है, मनचाहा जीवनसाथी मिलता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।
प्रश्न 4: क्या महिलाएं भी इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?
उत्तर: हाँ, शुद्ध भाव और पवित्रता के साथ कोई भी भक्त (स्त्री अथवा पुरुष) नित्य प्रातःकाल इसका पाठ कर सकता है।
इस पावन स्तोत्र को परिजनों व मित्रों के साथ शेयर करें (Share This Post)
भगवान काशी विश्वनाथ की कृपा और यह दुर्लभ मंगल स्तोत्र सभी तक पहुँचाने के लिए नीचे दिए गए बटनों से शेयर करें:
