द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वोच्च स्थान रखने वाली पावन नगरी काशी में ब्रह्ममुहूर्त का समय अत्यंत अलौकिक और कल्याणकारी होता है। भोर की पहली किरण फूटने से पूर्व जब बाबा विश्वनाथ के पावन धाम में काशी विश्वनाथ मंगला आरती (Kashi Vishwanath Mangala Aarti) प्रारंभ होती है, तब गर्भगृह डमरू के नाद, घंटियों की गूंज और शंखध्वनि से गुंजायमान हो उठता है। इसी पावन आरती के दौरान भगवान भोलेनाथ के जाग्रत स्वरूप के सम्मुख लंकाधिपति रावण द्वारा रचित शिव तांडव स्तोत्रम् (Shiv Tandav Stotram) के 15 पवित्र श्लोकों का सस्वर गान किया जाता है।
सनातन धर्म परंपरा में यह दृढ़ मान्यता है कि काशी की इस मंगला आरती में शिव तांडव स्तोत्र का श्रवण या पाठ करने से मनुष्य के जीवन से भय, काल-दोष और समस्त कष्टों का निवारण हो जाता है। आज के इस विशेष लेख में हम काशी की इसी दिव्य परंपरा से जुड़ते हुए शिव तांडव स्तोत्रम् का संपूर्ण प्रिंट-योग्य मूल पाठ, प्रत्येक श्लोक के एक-एक शब्द का संपूर्ण हिंदी अर्थ और करबद्ध संवादात्मक प्रार्थना-भावार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं।
📋 संक्षिप्त अवलोकन (Quick Fact Box):
- प्रमुख विषय: काशी विश्वनाथ मंगला आरती (Kashi Vishwanath Mangala Aarti)
- स्तोत्र रचना: शिव तांडव स्तोत्रम् – संपूर्ण 15 श्लोक (Shiv Tandav Stotram 15 Shlokas)
- रचयिता: लंकाधिपति दशानन रावण (शिव के अनन्य भक्त)
- आरती का समय: भोर 3:00 बजे से 4:00 बजे (ब्रह्ममुहूर्त)
- संपादकीय श्रेय: मुख्य लेखक: रजनी चाँदवानी व GP Team
Kashi Vishwanath Mangala Aarti और तांडव स्तोत्र का गहरा रहस्य (Divine History)
काशी विश्वनाथ मंदिर में दिनभर में होने वाली पांच आरतियों में मंगला आरती का स्थान सर्वोपरि है। रात्रि शयन के उपरांत देवाधिदेव महादेव को जगाने और उनकी प्रथम मंगला स्तुति के लिए यह आरती की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब रावण को अपने बल का अहंकार हुआ और उसने पूरे कैलाश पर्वत को उठाने की धृष्टता की, तब महादेव ने केवल अपने पैर के अंगूठे के हल्के दबाव से कैलाश को स्थिर कर दिया। रावण की भुजाएं पर्वत के नीचे दब गईं और वह असहनीय वेदना से चीत्कार कर उठा।
तब अपनी भूल का पश्चाताप करते हुए रावण ने तत्काल उसी क्षण भगवान आशुतोष (जो बहुत जल्दी और सहज भाव से प्रसन्न हो जाएं) को रिझाने के लिए इस अद्भुत, छंदबद्ध और ओजस्वी तांडव स्तोत्र की रचना की थी। भगवान भोलेनाथ तो करुणा के सागर हैं, वे रावण के इस पश्चाताप और भक्तिपूर्ण स्तुतिगान से तुरंत द्रवित हो गए और उसे अभय दान दिया। काशी में मंगला आरती के समय इसी भाव से यह स्तोत्र गाया जाता है कि हे प्रभु! हमारे भीतर के अहंकार और अज्ञान को मिटाकर हमें अपनी शरण में स्थान दीजिए। अधिक ऐतिहासिक विवरण के लिए आप शिव तांडव स्तोत्रम् विकिपीडिया पर भी इसका शास्त्रीय संदर्भ देख सकते हैं।
शिव तांडव स्तोत्रम्: केवल अखंड मूल पाठ (Print-Ready 15 Shlokas)
(दैनिक पूजा, मंगला आरती व नियमित पाठ के लिए शुद्ध 15 श्लोकों का प्रामाणिक संस्कृत मूल पाठ नीचे सुसज्जित रूप में प्रस्तुत है:)
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ अथ रावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रम् ॥
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥ १॥
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥ २॥
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥ ३॥
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥ ४॥
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥ ५॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः॥ ६॥
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्जल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥ ७॥
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः॥ ८॥
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥ ९॥
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥ १०॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वसद्-
विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥ ११॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥ १२॥
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥ १३॥
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठनस्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति संततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥ १४॥
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥ १५॥
॥ इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
शिव तांडव स्तोत्रम्: पदवार संपूर्ण शब्दार्थ व करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ
हमारे पाठकों की सुविधा के लिए प्रत्येक श्लोक के हर एक संस्कृत शब्द का सरल हिंदी अर्थ नीचे दिया गया है, ताकि श्लोक की एक-एक पंक्ति का गूढ़ रहस्य स्पष्ट हो सके:
श्लोक १: जटाटवीगलज्जलप्रवाह…
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥ १॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- जटा-अटवी: घने वन के समान विशाल जटाएं।
- गलत्-जल-प्रवाह: टपकती और बहती हुई पवित्र गंगाजल की धारा।
- पावित-स्थले: गले के उस पावन स्थान को पवित्र करती हुई।
- गले: कंठ में।
- अवलम्ब्य: सहारा लेकर या लटकती हुई।
- लम्बिताम्: नीचे तक झूलती हुई।
- भुजङ्ग-तुङ्ग-मालिकाम्: बड़े और विशाल काले नागों की माला।
- डमत्-डमत्-डमत्-डमन्: डमरू से निकलती डम-डम की गूंजती आवाज।
- निनादवत्-डमर्वयम्: तेज ध्वनि उत्पन्न करने वाला डमरू बजाते हुए।
- चकार: किया।
- चण्डताण्डवम्: प्रचंड और अलौकिक तांडव नृत्य।
- तनोतु: विस्तार करें, प्रदान करें।
- नः: हम सभी भक्तों का।
- शिवः: कल्याण स्वरूप भगवान शिव।
- शिवम्: परम कल्याण और मंगल।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे देवाधिदेव काशी विश्वनाथ! आपकी सघन जटाओं के वन से निकलती गंगाजी की निर्मल धारा आपके कंठ को निरंतर पवित्र कर रही है। आपके गले में विशाल काले नागों की सुंदर मालाएं लटक रही हैं और आपका डमरू ‘डम-डम’ की दिव्य गूंज से दिशाओं को गुंजा रहा है। हे प्रभु, ऐसे ओजस्वी तांडव रूप में आप हम शरणागत भक्तों का कल्याण कीजिए और हमारे समस्त अमंगलों को दूर कीजिए।
श्लोक २: जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी…
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥ २॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- जटा-कटाह: कड़ाही के घेरे जैसी घुंघराली और उलझी जटाएं।
- सम्भ्रम-भ्रमन्: वेग के साथ तेजी से चक्कर खाती और घूमती हुई।
- निलिम्प-निर्झरी: देवताओं की पावन नदी मां गंगा।
- विलोल-वीचि-वल्लरी: गंगाजी की चंचल और ऊंची उठती तरंगों की लताएं।
- विराजमान-मूर्धनि: मस्तक और शीश पर शोभायमान।
- धगत्-धगत्-धगत्: धक-धक करती प्रचंड लपटों के साथ।
- ज्वलत्: जलती और धधकती हुई।
- ललाट-पट्ट-पावके: चौड़े माथे की वेदी पर स्थित तीसरी आंख की अग्नि।
- किशोर-चन्द्र-शेखरे: सिर पर बाल-चंद्रमा (द्वितीया का चांद) धारण करने वाले।
- रतिः: अटूट प्रेम, अनुराग और भक्ति।
- प्रतिक्षणम्: हर एक पल।
- मम: मेरा, मेरे मन का।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे करुणामयी शंभू! आपकी जटाओं के गहरे घेरे में मां गंगा की चंचल और ऊंची लहरें अठखेलियां करती हुई शोभा पा रही हैं। आपके पावन मस्तक पर तीसरी आंख की अग्नि धक-धक प्रज्वलित हो रही है और सिर पर दूज का बाल-चंद्रमा अमृतमयी शीतलता बिखेर रहा है। हे बाबा विश्वनाथ! आपके इस दिव्य और सुंदर रूप में मेरा मन हर पल पूरी श्रद्धा से लीन रहे।
श्लोक ३: धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर…
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥ ३॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- धराधरेन्द्र-नन्दिनी: पर्वतराज हिमालय की प्रिय पुत्री माता पार्वती।
- विलास-बन्धु: दिव्य प्रेम-लीलाओं के एकमात्र साथी (शिवजी)।
- बन्धुर: अत्यंत सुंदर और मनोहर।
- स्फुरत्-दिगन्त-सन्तति: संपूर्ण दिशाओं में फैले हुए चराचर प्राणी।
- प्रमोदमान-मानसे: जिनका चित्त सदा परमानंद में मग्न रहता है।
- कृपा-कटाक्ष-धोरणी: दया और करुणा से भरी तिरछी नजरों की अविरल धारा।
- निरुद्ध-दुर्धरापदि: असहनीय और बड़े से बड़े घोर संकटों को रोक देने वाले।
- क्वचित्: किसी अनिर्वचनीय, अलौकिक।
- दिगम्बरे: दिशाओं को ही वस्त्र के रूप में धारण करने वाले महादेव में।
- मनो विनोदम्-एतु: मेरा मन सच्चा सुख, विश्राम और आनंद पाए।
- वस्तुनि: उस परमतत्व रूपी सत्ता में।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे जगत्पिता शिवशंकर! आप माता पार्वती के साथ मिलकर संपूर्ण चराचर जगत को अपनी दिव्य लीलाओं से आनंदित करते हैं। आपकी मात्र एक करुणामयी दृष्टि की कृपा से भक्तों की बड़ी से बड़ी विपदाएं और असहनीय कष्ट पल भर में दूर हो जाते हैं। हे दिगंबर प्रभु! संसार की नश्वर वस्तुओं से हटाकर मेरे इस चंचल मन को सदा-सदा के लिए आपके पावन चरणों में विश्राम दीजिए।
श्लोक ४: जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा…
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥ ४॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- जटा-भुजङ्ग: जटाओं में लिपटे हुए सर्प।
- पिङ्गल-स्फुरत्: पीले-लाल रंग में चमकते हुए।
- फणामणि-प्रभा: फणों में जड़ी मणियों की दिव्य चमक।
- कदम्ब-कुङ्कुमद्रव: केसर और कुमकुम के गाढ़े घोल की तरह।
- प्रलिप्त: पुता हुआ या रंगा हुआ।
- दिग्वधू-मुखे: दिशाएं रूपी सुंदरियों के चेहरे पर।
- मदान्ध-सिन्धुर: मद से मस्त दैत्य रूपी हाथी (गजासुर)।
- स्फुरत्-त्वक्: फड़कती हुई सुंदर खाल या चमड़ा।
- उत्तरीय-मेदुरे: ऊपरी दुपट्टे या चादर के रूप में ओढ़े हुए।
- मनो विनोदम्-अद्भुतम्: मन को अद्भुत अलौकिक आनंद।
- बिभर्तु: धारण करे, प्राप्त करे।
- भूत-भर्तरि: संपूर्ण संसार और समस्त जीवों का पालन-पोषण करने वाले शिव में।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे भूतभावन महादेव! आपकी जटाओं में लिपटे नागराज के फणों की चमकीली मणियां चारों दिशाओं को लाल कुमकुम के रंग में रंगती प्रतीत होती हैं। आपने मदमस्त गजासुर की खाल का पावन उत्तरीय वस्त्र धारण किया हुआ है। हे संपूर्ण संसार का भरण-पोषण करने वाले स्वामी! मेरे इस हृदय को आपके इस तेजस्वी और रक्षा करने वाले पावन रूप में परम शांति प्राप्त हो।
श्लोक ५: सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर…
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥ ५॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- सहस्र-लोचन: हजार नेत्रों वाले देवराज इंद्र।
- प्रभृति: आदि, इत्यादि (इंद्र आदि सभी देवता)।
- अशेष-लेख-शेखर: समस्त देवताओं के ऊंचे मुकुट।
- प्रसून-धूलि-धोरणी: मुकुट में सजे दिव्य फूलों के परागकणों की धूलि।
- विधूसर: धूसरित, हल्के पीले रंग से ढकी हुई।
- अङ्घ्रि-पीठ-भूः: आपके चरणकमलों की पावन चौकी।
- भुजङ्ग-राज-मालया: नागराज वासुकि की माला से।
- निबद्ध-जाट-जूटकः: बंधी हुई विशाल जटाओं का जूड़ा।
- श्रियै: धन-धान्य, ऐश्वर्य और आध्यात्मिक संपत्ति।
- चिराय: लंबे समय तक, सदा-सदा के लिए।
- जायताम्: सिद्ध हो, हमें प्राप्त हो।
- चकोर-बन्धु-शेखरः: चकोर पक्षी के बंधु अर्थात चंद्रमा को सिर पर धारण करने वाले शिवजी।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे देवाधिदेव! जब देवराज इंद्र सहित सभी देवता आपके आगे अपना शीश झुकाते हैं, तो उनके मुकुटों पर सजे दिव्य फूलों का पराग आपके चरणकमलों पर बिखर जाता है। आपने नागराज की माला से अपनी विशाल जटाओं को बांध रखा है। हे शीश पर चंद्रमा को सजाने वाले भोलेनाथ! हमारे जीवन में आध्यात्मिक शांति और धर्मानुकूल सुख-समृद्धि का विस्तार कीजिए।
श्लोक ६: ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा…
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः॥ ६॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- ललाट-चत्वर: माथे रूपी चौड़ी यज्ञ-वेदी।
- ज्वलत्-धनञ्जय: प्रज्वलित होती हुई तीसरी आंख की अग्नि।
- स्फुलिङ्ग-भा: चिंगारियों की चमकीली आभा।
- निपीत-पञ्चसायकम्: पांच बाणों वाले कामदेव को भस्म कर पी जाने वाले।
- नमत्-निलिम्प-नायकम्: प्रणाम करते हुए देवताओं के स्वामी (इंद्र)।
- सुधा-मयूख-लेखया: अमृत की किरणों वाली चंद्रकला से।
- विराजमान-शेखरम्: जिनका मस्तक सुशोभित हो रहा है।
- महाकपालि: महाकपाली रूप धारण करने वाले महादेव।
- सम्पदे: हमारे आध्यात्मिक ऐश्वर्य और कल्याण के लिए।
- शिरो-जटालम्: जटाओं से युक्त उनका पावन सिर।
- अस्तु नः: हम सभी भक्तों के लिए मंगलकारी हो।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे त्रिनेत्रधारी शंभू! आपके ललाट की धधकती अग्नि ने वासना के प्रतीक कामदेव को पल भर में भस्म कर दिया था। स्वर्ग के राजा इंद्र भी आपके सम्मुख सिर झुकाते हैं और आपके शीश पर अमृतमयी चंद्रकला विराजमान है। हे महाकपाली भगवान विश्वनाथ! आपकी कृपा से हमारे मन के समस्त काम, क्रोध और विकारों का नाश हो और हमें परम ऐश्वर्य व सद्बुद्धि प्राप्त हो।
श्लोक ७: करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्जल…
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्जल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥ ७॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- कराल-भाल-पट्टिका: विशाल और तेजस्वी ललाट की सतह।
- धगत्-धगत्-धगत्-ज्वलत्: धक-धक धधकती हुई तेज आग।
- धनञ्जय-आहुतीकृत: अग्नि में आहुति की तरह होम कर दिया।
- प्रचण्ड-पञ्चसायके: अत्यंत बलवान कामदेव को।
- धराधरेन्द्र-नन्दिनी: पर्वतराज हिमालय की पुत्री मां पार्वती।
- कुचाग्र-चित्रपत्रक: वक्षस्थल पर सुंदर कस्तूरी व चंदन के पत्र-चित्र।
- प्रकल्पन-एक-शिल्पिनि: रचना करने वाले एकमात्र कुशल शिल्पी।
- त्रिलोचने: तीनों लोकों को देखने वाले त्रिनेत्रधारी शिव में।
- रतिः मम: मेरा अटूट अनुराग और प्रेम सदा बना रहे।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे त्रिलोकीनाथ! आपके मस्तक पर जलने वाली प्रलयंकारी अग्नि ने कामदेव के घमंड को एक ही झटके में भस्म कर दिया, वहीं दूसरी ओर आप माता पार्वती के प्रति अगाध प्रेम और कोमल भाव रखने वाले परम शिल्पी हैं। हे प्रभु! आपके इस रौद्र और करुणामय दोनों रूपों के दर्शन कर मेरा मन केवल आपके चरणों में ही सदा-सदा के लिए समर्पित रहे।
श्लोक ८: नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्…
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः॥ ८॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- नवीन-मेघ-मण्डली: नए उमड़े काले बादलों का समूह।
- निरुद्ध-दुर्धर-स्फुरत्: रोकी न जा सकने वाली गहरी चमक।
- कुहू-निशीथिनी-तमः: अमावस्या की आधी रात का घना काला अंधकार।
- प्रबन्ध-बद्ध-कन्धरः: उस अंधकार जैसा नीला रंग धारण करने वाला कंठ (नीलकंठ)।
- निलिम्प-निर्झरी-धरः: देवनदी गंगा को सिर पर धारण करने वाले।
- तनोतु: विस्तार करें, प्रदान करें।
- कृत्ति-सिन्धुरः: हाथी का चर्म (खाल) धारण करने वाले।
- कलानिधान-बन्धुरः: सोलह कलाओं के स्वामी चंद्रमा से सुंदर दिखने वाले।
- श्रियम्: समस्त सुख, ऐश्वर्य और कल्याण।
- जगत्-धुरंधरः: संपूर्ण ब्रह्मांड का भार संभालने वाले महादेव।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे नीलकंठ महादेव! समुद्र मंथन का हलाहल विष पीकर आपने संसार की रक्षा हेतु अपना कंठ अमावस्या की रात और काले बादलों जैसा गहरा नीला कर लिया। गंगाजी को सिर पर धारण करने वाले और चंद्रमा की शोभा बढ़ाने वाले हे जगत के पालनहार! हमारे अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर हमारे जीवन को भक्ति के प्रकाश से आलोकित कीजिए।
श्लोक ९: प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा…
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥ ९॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- प्रफुल्ल-नील-पङ्कज: पूरी तरह खिला हुआ नीला कमल।
- प्रपञ्च-कालिम-प्रभा: फैली हुई श्यामल (नीली-काली) कांति।
- अवलम्बि-कण्ठ-कन्दली: गले के सुंदर उभार पर फैली हुई।
- रुचि-प्रबद्ध-कन्धरम्: उस सुंदर नीली आभा से बंधा हुआ कंठ।
- स्मर-च्छिदम्: कामदेव का नाश करने वाले।
- पुर-च्छिदम्: त्रिपुरासुर की तीनों पुरियों को नष्ट करने वाले।
- भव-च्छिदम्: जन्म-मरण के संसार-बंधन को काटने वाले।
- मख-च्छिदम्: राजा दक्ष के अहंकारी यज्ञ को खंडित करने वाले।
- गज-च्छिदम्: गजासुर दैत्य का संहार करने वाले।
- अन्धक-च्छिदम्: अंधकासुर का वध करने वाले।
- तम्-अन्तक-च्छिदम्: मृत्यु के देवता यमराज को भी परास्त करने वाले शिव को।
- भजे: मैं श्रद्धा से निरंतर भजता हूँ।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे सर्वशक्तिमान शिव! आपका कंठ खिले हुए नीले कमल की भांति मनमोहक छटा बिखेर रहा है। आपने कामदेव, त्रिपुरासुर, अंधकासुर और यहां तक कि मृत्यु के देवता यमराज के भय को भी समाप्त किया है। हे भवबंधन को काटने वाले प्रभु! हम जन्म-मरण और भय के फेर में फंसे हैं, आप कृपा करके हमारे समस्त बंधनों को काटकर हमें अभय दान दीजिए।
श्लोक १०: अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी…
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥ १०॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- अखर्व: अखंड, महान और विशाल।
- सर्व-मङ्गला: सबका कल्याण करने वाली माता पार्वती।
- कला-कदम्ब-मञ्जरी: चौंसठ कलाओं रूपी कदंब के फूलों की सुंदर मंजरी।
- रस-प्रवाह-माधुरी: प्रेम-रस की बहती हुई दिव्य मिठास।
- विजृम्भणा: खिलने और महकने का आनंद।
- मधुव्रतम्: रस का पान करने वाले भ्रमर (भौंरे) के समान।
- स्मर-अन्तकम्: कामदेव का अंत करने वाले।
- पुर-अन्तकम्: त्रिपुरासुर का अंत करने वाले।
- भव-अन्तकम्: सांसारिक दुखों को मिटाने वाले।
- मख-अन्तकम्: दक्ष यज्ञ का अंत करने वाले।
- गज-अन्तकम्: गजासुर का अंत करने वाले।
- अन्धक-अन्तकम्: अंधकासुर का अंत करने वाले।
- तम्-अन्तक-अन्तकम्: काल के भी काल महाकाल का।
- भजे: मैं हृदय से भजन करता हूँ।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे कल्याणकारी शंकर! माता पार्वती के पावन प्रेम और संपूर्ण कलाओं के रस का आस्वादन करने के लिए आप उस प्रेम-रूपी पुष्प के भ्रमर के समान आनंदित रहते हैं। आप ही सभी दुष्टों, संकटों और काल के भी काल महाकाल हैं। हे भोलेनाथ! हम भी आपकी भक्ति का अमृत पाना चाहते हैं, हम पर दया दृष्टि कर हमारे परिवार का संपूर्ण मंगल कीजिए।
श्लोक ११: जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वसद्…
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वसद्-
विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥ ११॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- जयतु: सदा सर्वदा जय-जयकार हो।
- अभ्र-विभ्रम: आकाश में बादलों की तरह तेजी से घूमते हुए।
- भ्रमत्-भुजङ्गम: चक्कर काटते और हिलते हुए सर्प।
- श्वसत्-विनिर्गमत्: सर्पों की फुंकार से तेजी से निकलती हुई श्वास।
- स्फुरत्-कराल-भाल: ललाट पर तेजी से चमकती हुई।
- हव्यवाट्: हविष्य को भस्म करने वाली पावन अग्नि।
- धिमित्-धिमित्-धिमि-ध्वनन्: धिम-धिम-धिम की गंभीर ताल बजाता हुआ।
- मृदङ्ग-तुङ्ग-मङ्गल-ध्वनि: मृदंग की ऊंची और अत्यंत मंगलकारी गूंज।
- क्रम-प्रवर्तित: तालबद्ध क्रम से आगे बढ़ता हुआ।
- प्रचण्ड-ताण्डवः: प्रचण्ड तांडव नृत्य करते हुए।
- शिवः: देवाधिदेव भगवान शिव।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे नटराज शिव! आपके तांडव नृत्य के समय जटाओं में लिपटे सर्प तेजी से फुंकार भर रहे हैं और आपके मस्तक की दिव्य अग्नि दमक रही है। मृदंग से निकलती ‘धिमि-धिमि’ की मंगलकारी ध्वनि के ताल पर आप सृष्टि का नियमन करने वाला तांडव कर रहे हैं। हे प्रभु! आपकी इस विजयमयी और मंगलमयी शक्ति की सदा जय हो, हमारे जीवन से सारी नकारात्मक शक्तियों को भस्म कर दीजिए।
श्लोक १२: दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्…
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥ १२॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- दृषत्: कठोर पत्थर।
- विचित्र-तल्पयोः: सुंदर और कोमल फूलों की सेज या बिस्तर।
- भुजङ्ग: विषधर जहरीला सांप।
- मौक्तिक-स्रजोः: मोतियों का कीमती हार।
- गरिष्ठ-रत्न: बहुमूल्य हीरा या मणियां।
- लोष्ठयोः: मिट्टी का साधारण ढेला।
- सुहृत्: अपना सच्चा मित्र।
- विपक्ष-पक्षयोः: घोर शत्रु या विरोधी।
- तृण: पैरों तले का तिनका।
- अरविन्द-चक्षुषोः: कमल नयनों वाली सुंदर स्त्री।
- प्रजा: साधारण नागरिक।
- मही-महेन्द्रयोः: पृथ्वी के बड़े चक्रवर्ती सम्राट में।
- सम-प्रवृत्तिकः: सबको एक समान दृष्टि से देखने वाला समभाव।
- कदा: कब (वह शुभ घड़ी कब आएगी?)
- सदाशिवं भजामि अहम्: जब मैं सदाशिव का सच्चे मन से भजन कर सकूंगा।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे समदर्शी देवाधिदेव! वह शुभ घड़ी मेरे जीवन में कब आएगी जब मैं कठोर पत्थर और कोमल बिस्तर में, विषधर सांप और मोतियों के हार में, मूल्यवान रत्न और मिट्टी के ढेले में, मित्र और शत्रु में कोई भेद नहीं देखूंगा? हे सदाशिव! मुझे ऐसा समभाव और आध्यात्मिक ज्ञान दीजिए ताकि मैं बिना किसी राग-द्वेष के निरंतर केवल आपका ही ध्यान कर सकूं।
श्लोक १३: कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्…
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥ १३॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- कदा: कब?
- निलिम्प-निर्झरी: देवनदी मां गंगा का पावन किनारा।
- निकुञ्ज-कोटरे: शांत लताओं के कुंजों या गुफाओं में।
- वसन्: निवास करते हुए।
- विमुक्त-दुर्मतिः: मन के सारे बुरे विचारों और कुटिलता से मुक्त होकर।
- सदा: हमेशा।
- शिरःस्थम्-अञ्जलिम्-वहन्: सिर पर दोनों हाथ जोड़कर वंदना मुद्रा बनाए हुए।
- विमुक्त-लोल-लोचनः: चंचल आंखों और सांसारिक भटकाव को त्यागकर।
- ललाम-भाल-लग्नकः: मस्तक पर सुंदर त्रिपुंड तिलक लगाकर।
- शिव इति मन्त्रम्-उच्चरन्: केवल “शिव… शिव…” महामंत्र का उच्चारण करते हुए।
- सुखी भवामि अहम्: मैं सच्चा सुख और परम शांति प्राप्त करूंगा।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे काशीपति भोलेनाथ! वह पावन दिन कब आएगा जब मैं मां गंगा के पावन तट की किसी कुटिया में निवास करूंगा? कब मेरे मन के सारे दुर्विचार, लोभ और वासनाएं मिटेंगी और मैं दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुकाए केवल “शिव… शिव… ॐ नमः शिवाय” का जप करते हुए परम आनंद और मुक्ति को प्राप्त कर सकूंगा?
श्लोक १४: इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं…
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठनस्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति संततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥ १४॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- इमम्: इस।
- हि: निश्चय ही।
- नित्यम्: प्रतिदिन, नियमपूर्वक।
- एवम्-उक्तम्: इस प्रकार कहे गए।
- उत्तमोत्तमं स्तवम्: सर्वश्रेष्ठ और पावन स्तोत्र को।
- पठन्: पढ़ने वाला।
- स्मरन्: स्मरण और ध्यान करने वाला।
- ब्रुवन्: मुख से उच्चारण करने वाला।
- नरः: मनुष्य।
- विशुद्धिम्-एति: पूर्ण अंतःकरण की पवित्रता को प्राप्त करता है।
- संततम्: निरंतर, सदा।
- हरे गुरौ: महादेव और सद्गुरु के पावन चरणों में।
- सुभक्तिम्-आशु-याति: शीघ्र ही सच्ची और निश्छल भक्ति पा लेता है।
- न अन्यथा गतिम्: उसकी कोई अन्य दुर्गति नहीं होती।
- विमोहनम् हि: मोह-माया और अज्ञान का नाश करने वाला है।
- देहिनाम्: समस्त देहधारी प्राणियों के लिए।
- सुशङ्करस्य चिन्तनम्: कल्याणकारी भगवान शंकर का चिंतन।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे दयासागर! जो भी प्राणी आपके इस उत्तम से उत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, उसका स्मरण करता है या एकाग्रचित्त होकर सुनता है, उसकी अंतरात्मा पूरी तरह पवित्र हो जाती है। उसे सद्गुरु और आपमें परम निष्काम भक्ति मिलती है तथा जीवन के सारे भ्रम और मोह-माया दूर हो जाते हैं। हे शंभू, हमें भी यह पावन फल प्राप्त हो।
श्लोक १५: पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं…
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥ १५॥
प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ:
- पूजा-अवसान-समये: दैनिक पूजा अथवा आरती की समाप्ति के समय।
- दश-वक्त्र-गीतम्: दस सिर वाले रावण द्वारा गाई गई इस स्तुति को।
- यः: जो कोई भी भक्त।
- शम्भु-पूजन-परम्: भगवान शिव की पूजा में लीन होकर।
- पठति: पाठ करता है।
- प्रदोषे: प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय)।
- तस्य: उसको, उसके घर में।
- स्थिराम्: सदा टिकने वाली स्थाई।
- रथ-गजेन्द्र-तुरङ्ग-युक्ताम्: रथ, हाथी, घोड़ों और वाहनों से संपन्न।
- लक्ष्मीम्: सुख-समृद्धि और धन-धान्य।
- सदैव: हमेशा।
- सुमुखीम्: अनुकूल और प्रसन्न रहने वाली लक्ष्मी।
- प्रददाति: प्रदान करते हैं।
- शम्भुः: दयालु भोलेनाथ।
करबद्ध प्रार्थना-भावार्थ: हे आशुतोष शिव! रावण द्वारा गाए गए इस सिद्ध स्तोत्र का पाठ जो भी भक्त अपनी नियमित पूजा के अंत में या प्रदोष काल में श्रद्धापूर्वक करता है, आप उसके घर में स्थाई सुख, यश, मान-सम्मान और धर्मानुकूल धन-समृद्धि प्रदान करते हैं। हे काशी विश्वनाथ! हमारे घर में भी अपनी इस पावन कृपा की वर्षा बनाए रखिए।
काशी विश्वनाथ में तांडव स्तोत्र पाठ के नियम व लाभ (Daily Rules & Benefits)
काशी विश्वनाथ मंगला आरती के समय शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से साधक को असीम मानसिक शांति और आत्मबल प्राप्त होता है:
- भय व शत्रु बाधा का निवारण: यदि मन में किसी भी प्रकार का अनजाना भय, अवसाद या कार्यों में रुकावट आ रही हो, तो इस स्तोत्र के नित्य पाठ से तुरंत मानसिक दृढ़ता मिलती है।
- ग्रह दोष शांति: ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव की इस तेजस्वी स्तुति से कुंडली के क्रूर ग्रहों का दुष्प्रभाव शांत होता है।
- वाणी में ओज व आत्मविश्वास: इस स्तोत्र के छंदों में नाद-ब्रह्म का वास है। इसका स्पष्ट उच्चारण करने से वाणी दोष दूर होते हैं और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
- नियम: तांडव स्तोत्र का पाठ हमेशा स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण करके, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके ही करना चाहिए। पाठ के अंत में भगवान शिव को सफेद चंदन, बेलपत्र और जल अर्पित करना शुभ माना जाता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (Frequently Asked Questions – FAQ)
1. क्या शिव तांडव स्तोत्र का पाठ घर में किया जा सकता है?
हां, शिव तांडव स्तोत्रम् (Shiv Tandav Stotram) का पाठ घर के मंदिर में बिल्कुल किया जा सकता है। बस यह ध्यान रखें कि मन में पवित्रता हो, उच्चारण शुद्ध हो और इसे भय पैदा करने के लिए नहीं बल्कि भोलेनाथ की प्रेममयी स्तुति के रूप में किया जाए।
2. काशी विश्वनाथ मंगला आरती का समय क्या होता है?
काशी विश्वनाथ मंदिर में मंगला आरती (Mangala Aarti) प्रतिदिन भोर 3:00 बजे से 4:00 बजे के बीच ब्रह्ममुहूर्त में संपन्न होती है। इसमें शामिल होने के लिए मंदिर ट्रस्ट की आधिकारिक वेबसाइट से पहले से टिकट बुक कराना अनिवार्य होता है।
3. शिव तांडव स्तोत्र का सबसे उत्तम समय कौन सा माना गया है?
इस स्तोत्र के अंतिम श्लोक में स्वयं उल्लेख है कि इसका पाठ प्रातःकाल पूजा के अंत में या फिर सूर्यास्त के समय प्रदोष काल में करना सबसे अधिक फलदायी होता है। सोमवार और महाशिवरात्रि पर इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
4. क्या शिव तांडव स्तोत्र का पाठ महिलाएं कर सकती हैं?
हां, शिव तांडव स्तोत्रम् (Shiv Tandav Stotram) का पाठ महिलाएं भी पूर्ण श्रद्धा और शुद्धि के साथ कर सकती हैं। भगवान शिव आशुतोष और सबके पिता हैं, वे केवल भक्त के प्रेम और निष्कपट भाव को देखते हैं। बस मासिक धर्म के दिनों में इसका पाठ न करें।
5. शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करते समय किस दिशा में मुख होना चाहिए?
शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करते समय पूर्व दिशा (East) या उत्तर दिशा (North) की ओर मुख करके बैठना सबसे शुभ और फलदायी माना जाता है। उत्तर दिशा को भगवान शिव की दिशा (कैलाश पर्वत की दिशा) माना गया है, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।
6. क्या बिना संस्कृत ज्ञान के इसका पाठ करने से कोई दोष लगता है?
नहीं, भगवान भोलेनाथ भाव के भूखे हैं। यदि संस्कृत के क्लिष्ट शब्दों के उच्चारण में कोई अनजानी त्रुटि हो भी जाए, तो अंत में “ॐ नमः शिवाय” बोलकर क्षमा-प्रार्थना कर लें। मन में श्रद्धा और समर्पण होना सबसे आवश्यक है, शिवजी किसी भी भक्त से रुष्ट नहीं होते।
7. काशी विश्वनाथ मंगला आरती में तांडव स्तोत्र का श्रवण करने से क्या विशेष फल मिलता है?
मान्यता है कि काशी विश्वनाथ की भोर की मंगला आरती (Kashi Vishwanath Mangala Aarti) में शिव तांडव स्तोत्र सुनने मात्र से जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं, मानसिक तनाव दूर होता है और साधक को भय व अकाल मृत्यु के डर से मुक्ति (अभय दान) मिलती है।
यदि आपको यह पावन शिव तांडव स्तोत्र और इसका सरल भावार्थ कल्याणकारी लगा, तो इसे अपने परिवार और मित्रों के साथ अवश्य साझा करें!


