दुर्गा जी की आरती सनातन हिंदू परंपरा में शक्ति, सुरक्षा और मातृत्व की सबसे जाग्रत और लोकप्रिय स्तुति है। जब भी घर-आंगन या मंदिरों में धूप, दीप, शंख और घंटों के नाद के साथ ‘जय अम्बे गौरी’ का गान गूंजता है, तो मन का हर संशय, भय और अकेलापन मिटकर एक अद्भुत आत्मिक बल में बदल जाता है। यह आरती केवल कुछ शब्दों का जोड़ नहीं, बल्कि हर भक्त का अपनी जगतजननी माँ के चरणों में संपूर्ण समर्पण है।
माँ दुर्गा अपने बच्चों के जीवन से ‘दुर्गम’ अर्थात कठिन से कठिन बाधाओं को हरने वाली ममतामयी शक्ति हैं। आज की तनावभरी और अनिश्चित ज़िंदगी में जब हम इस पावन आरती को उसके एक-एक शब्द के आत्मीय भाव के साथ गाते हैं, तो भीतर नकारात्मकता की जगह नई ऊर्जा, साहस और सकारात्मक विचारों का संचार होने लगता है।
📌 त्वरित तथ्य: माँ दुर्गा व पावन आरती
- पहचान व उपाधि: आदिपराशक्ति, महिषासुरमर्दिनी, दुर्गतिनाशिनी, जगदम्बा।
- माता का पावन रूप: सिंह पर सवार, अष्टभुजा (आठ हाथ), रक्त वर्ण वस्त्र (लाल चुनरी), मस्तक पर चंद्रकला और चेहर पर अभय देने वाला वात्सल्य।
- आरती के रचयिता / रचनाकार: पारंपरिक एवं लोक-प्रचलित (Traditional Folk) — उत्तर भारतीय शक्ति उपासना परंपरा में यह आरती सदियों से साधकों और भक्तों द्वारा गाई जा रही सर्वमान्य पारंपरिक स्तुति है।
- मुख्य अस्त्र व प्रतीक: त्रिशूल, चक्र, खड्ग, धनुष-बाण, शंख और कमल।
- आरती का श्रेष्ठ समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय और संध्याकाल (गोधूलि वेला) में कर्पूर या घी के दीपक के साथ।
- प्रिय भोग / प्रसाद: हलवा-पूरी, चना, बताशे, पंचमेवा और लाल अनार।
- आरती पाठ का सबसे बड़ा लाभ: भय व अज्ञात चिंताओं का नाश, शत्रुओं पर विजय, घर में सुख-समृद्धि और मानसिक शांति।
दुर्गा जी की आरती: संपूर्ण पद, 100% शब्दार्थ व आत्मीय भावार्थ
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
ॐ जय अम्बे गौरी…
शब्दार्थ: गौरी = गौर वर्ण (उज्ज्वल रूप) वाली पार्वती माँ; मैया = प्यारी माँ; श्यामा = श्याम वर्ण (गंभीर शक्ति) वाली माँ काली का रूप; निशिदिन = रात और दिन (सदा); ध्यावत = ध्यान करते हैं; हरि = भगवान विष्णु; ब्रह्मा = सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी; शिवरी = भगवान शिव।
भावार्थ: हे जगदम्बा माँ, हे ममतामयी अम्बे गौरी, आपकी सदा ही जय-जयकार हो! हे मैया, आप ही सौम्य गौरी हैं और आप ही संहारक श्यामा हैं; आपके इस परम तेज का ध्यान तो स्वयं त्रिदेव—विष्णु, ब्रह्मा और शिवजी भी दिन-रात करते हैं, फिर मुझ अज्ञानी बालक को अपनी शरण में क्यों न स्वीकार करोगी!
आध्यात्मिक रहस्य: ‘अम्बा’ सृष्टि की उत्पत्ति, ‘गौरी’ उसका पोषण और ‘श्यामा’ विकारों का संहार है; त्रिदेव भी जिस शक्ति के अधीन होकर सृष्टि का संचालन करते हैं, वह साक्षात् माँ दुर्गा ही हैं।
मांग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥
ॐ जय अम्बे गौरी…
शब्दार्थ: विराजत = सुशोभित है, चमक रहा है; टीको = तिलक, बिंदिया; मृगमद = कस्तूरी (सुगंधित कस्तूरी तिलक); दोउ = दोनों; नैना = आँखें, नेत्र; चन्द्रवदन = चंद्रमा जैसा सुंदर और शांत मुख; नीको = अत्यंत सुंदर, मनमोहक।
भावार्थ: हे माँ, आपकी मांग में सौभाग्य का लाल सिंदूर चमक रहा है और ललाट पर कस्तूरी का सुगंधित तिलक कितना सुंदर लग रहा है! आपके दोनों नेत्र करुणा से जगमगा रहे हैं और आपका चंद्रमा जैसा सौम्य मुखमंडल देखकर मन के सारे दुख पलभर में दूर हो जाते हैं।
आध्यात्मिक रहस्य: सिंदूर सौभाग्य व जीवन शक्ति का प्रतीक है, कस्तूरी आंतरिक पवित्र सुगंध का और चंद्रमा जैसा मुख यह संकेत देता है कि चाहे बाहर कितना भी संघर्ष हो, साधक का मन भीतर से हमेशा शांत रहना चाहिए।
जीवन से जुड़ाव: माँ के इस शांत और करुणामयी स्वरूप को मन में बसाने से क्रोध, आवेश और मानसिक तनाव तुरंत शांत हो जाते हैं।
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥
ॐ जय अम्बे गौरी…
शब्दार्थ: कनक = शुद्ध सोना; समान = की तरह; कलेवर = शरीर, देह स्वरूप; रक्ताम्बर = लाल रंग के पावन वस्त्र; राजै = शोभा पा रहे हैं; रक्तपुष्प = लाल रंग के फूल (जैसे गुड़हल); गल = गले में; माला = पुष्पहार; कण्ठन = सुंदर कंठ, गले; पर = पर; साजै = सज रही है, अत्यंत प्रिय लग रही है।
भावार्थ (हृदय की पुकार): हे मैया, आपका पावन शरीर कुंदन यानी शुद्ध सोने की भांति दमक रहा है और उस पर लाल रंग के वस्त्र अत्यंत शोभायमान हैं! आपके गले में लाल फूलों की सुंदर माला सजी हुई है, जो आपकी तेजस्वी आभा को और भी मनमोहक बना रही है।
आध्यात्मिक रहस्य: ‘कनक’ शुद्ध चेतना का प्रतीक है जिस पर कोई विकार नहीं ठहरता, और ‘लाल रंग’ गतिशीलता, साहस और समस्त बुराइयों को भस्म करने वाली ऊर्जा का द्योतक है।
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥
ॐ जय अम्बे गौरी…
शब्दार्थ: केहरि = सिंह, शेर; वाहन = सवारी; राजत = शोभायमान हैं, आरूढ़ हैं; खड्ग = तलवार; खप्पर = खप्पर (असुर संहार का पात्र); धारी = धारण करने वाली; सुर = देवता; नर = मनुष्य; मुनिजन = ऋषि-मुनि, तपस्वी; सेवत = सेवा व स्तुति करते हैं; तिनके = उन सभी के; दुखहारी = कष्टों और दुखों को हर लेने वाली।
भावार्थ: हे माँ, आप निर्भय होकर सिंह की सवारी करती हैं और दुष्टों का नाश करने के लिए हाथों में खड्ग व खप्पर धारण किए हैं! देवता, मनुष्य और तपस्वी मुनि—जो भी सच्चे मन से आपकी सेवा करते हैं, आप पलक झपकते ही उनके सारे दुखों का अंत कर देती हैं।
आध्यात्मिक रहस्य: सिंह हमारे अनियंत्रित अहंकार और पाशविक प्रवृत्तियों का प्रतीक है; माँ का उस पर सवार होना सिखाता है कि जब हम अपने अहंकार को नियंत्रित करते हैं, तभी आंतरिक शक्ति जागृत होती है।
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥
ॐ जय अम्बे गौरी…
शब्दार्थ: कानन = कानों में; कुण्डल = दिव्य स्वर्ण कुंडल; शोभित = सुशोभित हैं; नासाग्रे = नासिका के अग्रभाग (नाक की नथ) पर; मोती = चमकीला मोती; कोटिक = करोड़ों; चन्द्र = चंद्रमा; दिवाकर = सूर्य देवता; सम = के समान; राजत = शोभा पा रही है; ज्योति = दिव्य प्रकाश व आभा।
भावार्थ: हे माँ, आपके कानों में दिव्य कुंडल झिलमिला रहे हैं और नासिका पर सुंदर मोती दमक रहा है! आपके मुखमंडल से करोड़ों सूर्यों का तेज और करोड़ों चंद्रमाओं की शीतलता एक साथ बरस रही है, जिसकी पावन ज्योति से पूरा ब्रह्मांड आलोकित हो रहा है।
आध्यात्मिक रहस्य: सूर्य ज्ञान के तीव्र प्रकाश का और चंद्रमा शांति का प्रतीक है; माँ दुर्गा का यह स्वरूप दर्शाता है कि सच्चा ज्ञानी वही है जिसके पास ज्ञान का तेज भी हो और स्वभाव में चंद्रमा जैसी सौम्यता भी।
शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥
ॐ जय अम्बे गौरी…
शब्दार्थ: शुम्भ-निशुम्भ = शुंभ और निशुंभ नामक दैत्य; बिदारे = चीर डाला, अंत कर दिया; महिषासुर = महिषासुर राक्षस; घाती = वध करने वाली; धूम्र विलोचन = धूम्रलोचन दैत्य (तथा धुंधली दृष्टि वाले दोष); नैना = नेत्रों से भस्म करने वाली; निशिदिन = सदा; मदमाती = ब्रह्मानंद व ईश्वरीय शक्ति में लीन रहने वाली।
भावार्थ: हे जगतजननी माँ, आपने शुंभ-निशुंभ और क्रूर महिषासुर जैसे बड़े-बड़े दैत्यों का संहार करके धर्म और सज्जनों की रक्षा की! आपने धूम्रलोचन का मान मर्दन किया; हे माँ, आप सदा अपने दिव्य आनंद और भक्तों की रक्षा के संकल्प में मगन रहती हैं।
आध्यात्मिक रहस्य: शुंभ-निशुंभ वास्तव में ‘अहंकार’ और ‘ममत्व’ (मेरा-तेरा) हैं, महिषासुर अज्ञान और जड़ता है, तथा धूम्रलोचन भ्रामक दृष्टि है; माँ दुर्गा हमारे अंतःकरण के इन सभी मानसिक विकारों का नाश करती हैं।
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
ॐ जय अम्बे गौरी…
शब्दार्थ: चण्ड-मुण्ड = चंड और मुंड नामक असुर; संहारे = वध किया; शोणित बीज = रक्तबीज दैत्य; हरे = नष्ट किया, समाप्त किया; मधु-कैटभ = मधु और कैटभ दैत्य; दोउ = दोनों को; मारे = मार गिराया; सुर = देवताओं को; भयहीन = निडर, भयमुक्त; करे = बना दिया।
भावार्थ: हे माँ चामुंडा, आपने चंड-मुंड का संहार किया और रक्त की हर बूंद से नया असुर पैदा करने वाले रक्तबीज का समूल नाश कर दिया! आपने मधु और कैटभ जैसे भयंकर असुरों को समाप्त कर स्वर्ग के देवताओं को पूरी तरह निडर कर दिया, वैसे ही हमारे जीवन के भय को भी दूर करो माँ!
आध्यात्मिक रहस्य: ‘रक्तबीज’ अनगिनत इच्छाओं और बुरे विचारों का प्रतीक है, जो एक कटने पर दूसरा पैदा हो जाता है; केवल माँ भगवती की कृपा ही इन अनंत वासनाओं को पूरी तरह शांत कर सकती है।
ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥
ॐ जय अम्बे गौरी…
शब्दार्थ: ब्रह्माणी = ब्रह्मा जी की शक्ति माँ सरस्वती; रुद्राणी = भगवान शिव की शक्ति पार्वती/रुद्राणी; तुम = आप ही; कमला रानी = कमल पर विराजने वाली माँ महालक्ष्मी; आगम = तंत्र शास्त्र; निगम = वेद शास्त्र; बखानी = आपका ही गुणगान करते हैं; तुम = आप; शिव = महादेव की; पटरानी = मुख्य अर्धांगिनी।
भावार्थ: हे माँ, आप ही ज्ञान स्वरूपा ब्रह्माणी (सरस्वती) हैं, आप ही शक्ति स्वरूपा रुद्राणी हैं और आप ही धन-वैभव देने वाली कमला (लक्ष्मी) हैं! वेद और तंत्र-शास्त्र निरंतर आपकी ही महिमा गाते हैं; आप ही देवाधिदेव महादेव की प्रधान शक्ति व पटरानी हैं।
आध्यात्मिक रहस्य: ज्ञान (सरस्वती), धन (लक्ष्मी) और बल (पार्वती)—जीवन के इन तीनों आधारभूत तत्वों का मूल केंद्र माँ दुर्गा ही हैं; उनकी कृपा से साधक को सर्वांगीण पूर्णता मिलती है।
चौंसठ योगिनी मंगल गावैं, नृत्य करत भैरूं।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥
ॐ जय अम्बे गौरी…
शब्दार्थ: चौंसठ योगिनी = चौंसठ दिव्य मातृ-शक्तियां; मंगल = शुभ स्तुति, कल्याणकारी गीत; गावैं = गाती हैं; नृत्य करत = आनंद से झूमकर नाचते हैं; भैरूं = भगवान कालभैरव/बटुक भैरव; बाजत = बज रहे हैं; ताल = करताल व झांझ; मृदंगा = पखावज/मृदंग; अरु = और; डमरू = शिवजी का डमरू।
भावार्थ : हे माँ, आपके पावन दरबार में चौंसठ योगिनियां मंगल गान कर रही हैं और वीर भैरव जी आनंदित होकर नृत्य कर रहे हैं! ताल, मृदंग और डमरू की दिव्य ध्वनि गूंज रही है; हे मैया, आपके इस आनंदमय दरबार का दर्शन कर हमारा मन प्रफुल्लित हो उठता है।
आध्यात्मिक रहस्य: डमरू और मृदंग का नाद सृष्टि के मूल कंपन (नाद ब्रह्म) का प्रतीक है; माँ की उपासना से जीवन की नकारात्मक ध्वनियां शांत होकर आत्मा में दिव्य आनंद का ताल बजने लगता है।
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुख हरता, सुख सम्पति करता॥
ॐ जय अम्बे गौरी…
शब्दार्थ: भरता = पालन-पोषण करने वाली; हरता = हर लेने वाली
भावार्थ: हे माँ, सचमुच आप ही इस पूरे जगत को जन्म देने वाली माता हैं और आप ही हम सबका भरण-पोषण करने वाली हैं! आप अपने शरणागत भक्तों के सारे दुखों को पलभर में हर लेती हैं और उनके जीवन को सुख और सच्ची संपत्ति से भर देती हैं।
भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥
ॐ जय अम्बे गौरी…
शब्दार्थ: भुजा = हाथ; चार = चारों (चतुर्भुज रूप); अति = अत्यंत; शोभित = सुशोभित हैं; वरमुद्रा = वरदान व अभय देने वाली मुद्रा; धारी = धारण करने वाली
भावार्थ: हे माँ, आपकी भुजाएं अत्यंत सुशोभित हैं और आपका कर-कमल सदा भक्तों को अभय और वरदान देने की मुद्रा में उठा रहता है! जो भी नर-नारी सच्चे प्रेम से आपकी सेवा करते हैं, वे अपनी हर मनोकामना का मनचाहा फल प्राप्त कर लेते हैं।
आध्यात्मिक रहस्य: ‘वरमुद्रा’ का अर्थ है अभय—माँ कहती हैं कि “डरो मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ”; चारों भुजाएं जीवन के चार पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि की प्रतीक हैं।
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥
ॐ जय अम्बे गौरी…
शब्दार्थ: कंचन = सोने का; थाल = पूजा की थाली; विराजत = सज रही है; अगर = अगरबत्ती/सुगंधित धूप; कपूर = पावन कर्पूर; बाती = दीपक की ज्योत; श्री मालकेतु = माँ का पावन शक्तिपीठ/पर्वत शिखर (अथवा मुकुट का केंद्र); में = में; राजत = सुशोभित है; कोटि = करोड़ों; रतन = मणियों, रत्नों की; ज्योती = दिव्य जगमगाहट।
भावार्थ: हे माँ, सोने की थाली में अगरबत्ती और कर्पूर की पावन बाती प्रज्वलित हो रही है! आपके पावन धाम और मुकुट में करोड़ों बहुमूल्य रत्नों की ज्योति जगमगा रही है; हे मैया, हम प्रेमपूर्वक आपकी यह पावन आरती उतारते हैं।
आध्यात्मिक रहस्य: कर्पूर की बाती बिना कोई अवशेष छोड़े जलकर समाप्त हो जाती है, जो यह सिखाती है कि भक्त को अपना अहंकार पूरी तरह मिटाकर माँ की ज्योति में विलीन हो जाना चाहिए।
श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावै।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावै॥
ॐ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
शब्दार्थ: श्री = पावन, आदरणीय; अम्बे जी = माँ दुर्गा; की = की; आरती = वंदना, दीप-स्तुति; जो कोई = जो भी व्यक्ति; नर = मनुष्य; गावै = प्रेम से गाता है; कहत = कहते हैं; शिवानन्द स्वामी = संत स्वामी शिवानन्द जी (भक्ति परंपरा के साधक); सुख-सम्पत्ति = आत्मिक शांति व वैभव; पावै = प्राप्त करता है।
भावार्थ (हृदय की पुकार): हे माँ अम्बे, जो कोई भी मनुष्य आपकी इस पावन आरती को नित्य नियम और श्रद्धा से गाता है, संतजन कहते हैं कि वह जीवन में सभी प्रकार के सुख, शांति और अक्षय संपत्ति को सहज ही प्राप्त कर लेता है!
आध्यात्मिक रहस्य: नियमित आरती केवल एक कर्मकांड नहीं है, यह मन के दर्पण को रोज साफ करने की साधना है, जिससे चित्त शांत होकर परम आनंद में स्थित हो जाता है।
जीवन से जुड़ाव: प्रतिदिन परिवार के साथ यह आरती गाने से घर में प्रेम, आपसी तालमेल बढ़ता है और क्लेश का हमेशा के लिए अंत होता है।

माँ दुर्गा का प्राकट्य, आरती के रचयिता का संदर्भ व युवाओं के लिए सीख
1. माँ दुर्गा का प्राकट्य और महिषासुर वध
श्रीमद्देवीभागवत और श्रीदुर्गासप्तशती के अनुसार, जब महिषासुर नामक असुर ने अपने वरदान के घमंड में तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया और देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया, तब भगवान शिव, श्रीहरि विष्णु और ब्रह्मा जी सहित सभी देवताओं के मुख से एक दिव्य तेज (ऊर्जा) प्रकट हुआ। सभी देवताओं के सम्मिलित तेज से आदिपराशक्ति माँ दुर्गा का प्राकट्य हुआ। शिवजी ने उन्हें त्रिशूल, विष्णुजी ने चक्र, वरुण देव ने शंख और इंद्र ने वज्र भेंट किया। हिमालय राज ने उन्हें सवारी के लिए सिंह अर्पित किया। माँ दुर्गा ने नौ दिनों तक महिषासुर की सेना से युद्ध कर दसवें दिन उसका वध किया और समस्त सृष्टि को उसके आतंक से मुक्त कराया।
2. आरती के रचयिता व रचनाकाल का संदर्भ
‘जय अम्बे गौरी’ आरती के अंतिम पद में ‘कहत शिवानन्द स्वामी’ का उल्लेख मिलता है। भक्ति साहित्य के इतिहासकारों के अनुसार, यह आरती उत्तर भारतीय संत परंपरा के स्वामी शिवानन्द जी द्वारा रचित मानी जाती है, जिसे सदियों से शक्तिपीठों, मंदिरों और घरों में पारंपरिक एवं लोक-प्रचलित (Traditional Folk) रूप में गाया जाता रहा है। समय के साथ यह आरती पूरे सनातन समाज में माँ दुर्गा की सबसे प्रामाणिक और प्रिय आरती बन गई।
3. आज की युवा पीढ़ी के लिए व्यावहारिक संदेश
माँ दुर्गा का चरित्र आज के युवाओं को सिखाता है कि जीवन में बुराई, अन्याय और मानसिक कमजोरियों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए। महिषासुर बाहर का कोई दैत्य होने से पहले हमारे भीतर का ‘आलस्य’ और ‘अहंकार’ है। यदि हम अपने भीतर की शक्तियों को एकाग्र (समन्वित) कर लें, तो किसी भी कठिन परिस्थिति पर विजय पाई जा सकती है।
विस्तृत पौराणिक संदर्भ के लिए आप माँ दुर्गा का पौराणिक इतिहास व शक्ति रूप पढ़ सकते हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs – माँ दुर्गा आरती)
Q1. दुर्गा जी की आरती ‘जय अम्बे गौरी’ के रचयिता कौन हैं?
आरती के अंतिम पद के अनुसार इसके रचयिता संत स्वामी शिवानन्द जी माने जाते हैं। यह आरती सदियों से उत्तर भारत में पारंपरिक एवं लोक-प्रचलित रूप में गाई जा रही है।
Q2. दुर्गा आरती करने की सही दिशा और नियम क्या हैं?
आरती करते समय साधक का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। थाली को माता के चरणों से प्रारंभ करते हुए घड़ी की सुई की दिशा में (दक्षिणावर्त) घुमाना चाहिए।
Q3. दुर्गा आरती में कर्पूर जलाना क्यों शुभ माना जाता है?
कर्पूर पूरी तरह जलकर वाष्पीकृत हो जाता है, जो अहंकार के पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। इसके साथ ही कर्पूर की सुगंध से घर की नकारात्मक ऊर्जा और सूक्ष्म कीटाणु नष्ट होते हैं।
Q4. क्या महिलाएं मासिक धर्म के समय यह आरती गा सकती हैं?
मासिक धर्म के दौरान मंदिर में जाकर दीपक जलाने व पूजन का निषेध रहता है, परंतु मानसिक रूप से मन ही मन माँ का स्मरण और आरती का भाव गान किया जा सकता है।
Q5. दुर्गा आरती करने का सबसे उत्तम समय क्या है?
प्रातःकाल पूजा के पश्चात तथा संध्याकाल में सूर्यास्त के समय (गोधूलि वेला) आरती करना सबसे श्रेष्ठ और कल्याणकारी माना गया है।
Q6. ‘जय अम्बे गौरी’ आरती रोज गाने से क्या लाभ मिलता है?
नित्य आरती गाने से घर में मौजूद भय, नकारात्मकता और कलह दूर होती है, आत्मविश्वास बढ़ता है और परिवार पर माँ का रक्षा-कवच बना रहता है।
🌸 माँ भगवती की यह पावन आरती और इसका आत्मीय अर्थ अपने परिजनों और मित्रों के साथ अवश्य साझा करें!
धार्मिक डिस्क्लेमर: यह आलेख सनातन शक्ति परंपरा, पौराणिक शास्त्रों (दुर्गासप्तशती) और संतों के प्रामाणिक वचनों पर आधारित है। कठिन शब्दों के अर्थ व भावार्थ को आधुनिक पाठकों की समझ हेतु सरल व आत्मीय हिंदी में ढाला गया है। पूजा-अनुष्ठान अपनी पारिवारिक परंपरा और निष्काम श्रद्धा से ही करें।
