सनातन धर्म की शक्ति उपासना में दस महाविद्याओं का स्थान सर्वोपरि माना गया है। इनमें द्वितीय महाविद्या के रूप में पूजी जाने वाली भगवती तारा को ‘तारिणी’ अर्थात संसार के हर घोर संकट से तारने वाली देवी कहा जाता है। माँ तारा की आरती (Maa Tara Devi Aarti) का नित्य पाठ करने से मनुष्य के जीवन में आने वाली सबसे बड़ी बाधाएं, अकाल मृत्यु का भय और कर्ज जैसे भारी संकट पलभर में दूर हो जाते हैं।
माँ तारा का मुख्य धाम पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित प्रसिद्ध ‘तारापीठ’ शक्तिपीठ है। भगवती तारा के तीन प्रमुख रूप हैं—एकजटा, उग्रतारा और नीलसरस्वती। जो भक्त सच्चे हृदय से माता के पावन रूप के सामने दीप जलाकर इस पावन आरती का गान करता है, माता रानी उसे वाणी की सिद्धि, अथाह धन-धान्य और मोक्ष का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।
त्वरित तथ्य: माँ तारा की आरती (Quick Fact Box)
- देवी का नाम: भगवती तारा (द्वितीय महाविद्या – तारिणी)
- प्रमुख स्वरूप: उग्रतारा, एकजटा और नीलसरस्वती
- मुख्य तीर्थ धाम: तारापीठ मंदिर (पश्चिम बंगाल) व तारा देवी (हिमाचल प्रदेश)
- भैरव स्वरूप: अक्षोभ्य शिव (भगवान शिव का हलाहल विष पीने वाला रूप)
- पूजा का मुख्य फल: घोर संकट, शत्रु बाधा, दरिद्रता से मुक्ति व वाक्-सिद्धि
- आधिकारिक संदर्भ: तारा (देवी) – विकिपीडिया
माँ तारा के प्राकट्य का पौराणिक इतिहास (Sacred History)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए भयंकर हलाहल विष पिया, तो उनके कंठ में असहनीय जलन होने लगी। तब महादेव की पीड़ा को शांत करने के लिए आदिशक्ति ने ‘माँ तारा’ का रूप धारण किया और भगवान शिव को अपने शिशु के समान गोद में लेकर अपना अमृतमयी दुग्ध पिलाया, जिससे विष का ताप शांत हो गया।
एक अन्य कथा के अनुसार, सर्वप्रथम महर्षि वशिष्ठ ने तारापीठ में माता की कठिन आराधना कर सिद्धि प्राप्त की थी। माँ तारा की यह आरती सदियों से सनातन लोक-परंपरा में गाई जा रही एक सिद्ध रचना है, जिसका गान तारापीठ सहित देशभर के शक्ति मंदिरों में श्रद्धापूर्वक किया जाता है।
माँ तारा का सिद्ध बीज मंत्र व मूल मंत्र (Mool Mantra & Beej Mantra)
आरती आरंभ करने से पूर्व माता के सिद्ध बीज मंत्र का 11 या 21 बार जप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:
माँ तारा बीज मंत्र: “ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्”
माँ तारा गायत्री मंत्र: “ॐ तारायै विद्महे महोग्रायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्”
जपने के लाभ: इन उग्र मंत्रों के प्रभाव से वाक्-सिद्धि (कही गई बात का सच होना) प्राप्त होती है, बुद्धि कुशाग्र होती है और बड़े से बड़े शत्रुओं का भय तुरंत समाप्त हो जाता है।
माँ तारा की आरती: संपूर्ण पाठ, पद-अनुसार शब्दार्थ व संवादात्मक भावार्थ (Maa Tara Devi Aarti Lyrics & Meaning)
प्रथम पद: मंगलाचरण व मनोकामना पूर्ति
जय तारा माता, मैया जय तारा माता।
जो कोई तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥
॥ जय तारा माता… ॥
सरल शब्दार्थ: तारा माता (भवसागर और संकटों से तारने वाली माँ), ध्याता (सच्चे मन से ध्यान करने वाला), मनवांछित फल (मन की सोची हुई हर पवित्र इच्छा)।
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे मेरी करुणामयी तारा माता! आपकी सदा जय हो। हे माँ! इस संसार में जो भी भक्त सच्चे मन से आपके पावन रूप का ध्यान करता है, आप उसकी हर मनोकामना पूरी कर देती हैं। हे दयालु मैया! मैं भी आपके द्वार पर आया हूँ, मेरी पुकार सुन लीजिए।
द्वितीय पद: द्वितीय महाविद्या व नीलवर्ण छवि
द्वितीय महाविद्या तुम, संकट हरने वाली।
नीलवर्ण तन सोहे, अद्भुत छवि निराली॥
॥ जय तारा माता… ॥
सरल शब्दार्थ: द्वितीय महाविद्या (दस महाविद्याओं में दूसरी प्रमुख महाशक्ति), नीलवर्ण (आकाश के समान गहरा नीला रंग), छवि निराली (अनोखा रूप)।
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे जगदम्बे! आप दस महाविद्याओं में दूसरी सर्वोच्च शक्ति हैं और भक्तों के बड़े से बड़े संकट को पलभर में हरने वाली हैं। आपके पावन रूप का रंग गहरा नीला है और आपकी यह छवि मन को मोह लेती है। हे संकटहारिणी माँ! मेरे जीवन के दुखों को भी मिटा दीजिए।
तृतीय पद: माता के अस्त्र-शस्त्र व अक्षोभ्य शिव
खड्ग, खप्पर, कर कैंची, नीलकमल धारी।
अक्षोभ्य शिव शीश विराजे, मुंडमाल प्यारी॥
॥ जय तारा माता… ॥
सरल शब्दार्थ: खड्ग (तलवार), कर कैंची (हाथ में बंधन काटने वाली कैंची), अक्षोभ्य शिव (हलाहल विष पीने वाले भगवान शिव जो माता की जटा में हैं)।
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे महामाया! आपने अपने हाथों में खड्ग, खप्पर, नीलकमल और दिव्य कैंची धारण की है। आपकी जटाओं में महादेव विराजते हैं। हे माँ! अपने हाथ की इस दिव्य कैंची से मेरे जीवन के सारे अज्ञान, मोह, कर्ज और बुरे कर्मों के बंधनों को हमेशा के लिए काट दीजिए।
चतुर्थ पद: शिव का विष-ताप हरने वाली माँ
जब शिव ने विष पिया, तुमने ताप हरा।
अमृत पय पिलाकर, शंकर को अमर करा॥
॥ जय तारा माता… ॥
सरल शब्दार्थ: विष (कालकूट जहर), ताप हरा (जलन शांत की), अमृत पय (पावन दुग्ध)।
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे वात्सल्यमयी माँ! जब भोलेनाथ ने भयंकर विष पिया था, तब आपने ही माँ का रूप धरकर उन्हें अपना अमृतमयी दुग्ध पिलाया और उनके कंठ की जलन शांत की। हे जननी! मैं तो आपका अबोध बालक हूँ; मेरे जीवन के सारे संताप और दुखों को भी शांत कर दीजिए।
पंचम पद: माता के तीन दिव्य रूप
उग्रतारा, एकजटा, तुम नीलसरस्वती माता।
भवसागर से तारो, तुम ही भाग्य विधाता॥
॥ जय तारा माता… ॥
सरल शब्दार्थ: उग्रतारा (उग्र संकट नाश करने वाली), एकजटा (एकाग्रता और मोक्ष देने वाली), नीलसरस्वती (अद्भुत ज्ञान व वाणी की देवी), भवसागर (दुनिया के दुखों का समुद्र)।
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे तारिणी माँ! विपत्तियों को नष्ट करने के लिए आप ‘उग्रतारा’ हैं, मोक्ष देने के लिए ‘एकजटा’ हैं और सद्बुद्धि देने के लिए आप ही ‘नीलसरस्वती’ माता हैं। हे मेरी भाग्य विधाता! मेरी जीवन नैया डगमगा रही है, मेरी पतवार थामकर मुझे हर संकट से पार लगाइए।
षष्ठ पद: तारापीठ धाम व सिद्ध भक्त
तारापीठ विराजे, वशिष्ठ मुनि ध्यावे।
बामदेव सम सेवक, चरणन में सुख पावे॥
॥ जय तारा माता… ॥
सरल शब्दार्थ: तारापीठ (बंगाल का प्रसिद्ध शक्तिपीठ), वशिष्ठ मुनि (भगवान राम के कुलगुरु), बामदेव (तारापीठ के महान संत बामाखेपा)।
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे तारापीठ की महारानी! आपके पावन धाम में महर्षि वशिष्ठ ने घोर तपस्या कर आपके दर्शन पाए थे। आपके अनन्य भक्त संत बामाखेपा ने सारा जीवन आपकी गोद में परम सुख पाया। हे माँ! मुझे भी अपने सेवकों की तरह श्रीचरणों की सच्ची प्रीति प्रदान कीजिए।
सप्तम पद: रोग, भय व दरिद्रता निवारण
रोग, शोक, भय भंजन, दारिद्र्य दहन करी।
शत्रु बाधा मिटाती, भक्तन की पीर हरी॥
॥ जय तारा माता… ॥
सरल शब्दार्थ: भय भंजन (डर को तोड़ने वाली), दारिद्र्य दहन करी (गरीबी को जलाकर भस्म करने वाली), पीर हरी (दर्द दूर करने वाली)।
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे कष्ट निवारिणी माँ! आप अपने भक्तों के असाध्य रोगों और हर प्रकार के डर का नाश करने वाली हैं। आप घर की दरिद्रता को जलाकर राख कर देती हैं। हे माँ! मेरे गुप्त और प्रत्यक्ष शत्रुओं की बाधाओं को शांत कीजिए और मेरे परिवार की पीड़ा हर लीजिए।
अष्टम पद: आरती की फलश्रुति व समर्पण
तारा मात की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख-संपत्ति पावे॥
॥ जय तारा माता… ॥
सरल शब्दार्थ: नर गावे (जो भी मनुष्य श्रद्धा से पाठ करता है), सुख-संपत्ति (परिवार की खुशहाली और शांति)।
संवादात्मक प्रार्थना भावार्थ: हे जगजननी तारा माँ! जो भी भक्त सुबह-शाम सच्चे मन से आपकी यह पावन आरती गाता है, उसके घर में सुख, शांति और लक्ष्मी का वास होता है। हे माँ! मेरी इस छोटी सी पूजा को स्वीकार कर मेरे परिवार पर अपनी कृपा की छांव बनाए रखिए।
माँ तारा की आरती व पूजन की सरल विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
घर के मंदिर में सात्विक भाव से माँ तारा की उपासना और आरती करने के लिए इन सरल नियमों का पालन करें:
- स्नान व संकल्प: प्रातःकाल या संध्या प्रदोष काल में स्नान कर लाल, सफेद या पीले वस्त्र धारण करें।
- स्थापना: लाल कपड़ा बिछाकर माता का चित्रपट स्थापित करें और घी का दीपक जलाएं।
- पुष्प व भोग: माता को नीले अपराजिता के फूल, लाल गुड़हल, अक्षत और अनार या पंचमेवा का भोग अर्पित करें।
- मंत्र जप: आरती शुरू करने से पहले स्फटिक या रुद्राक्ष की माला से ‘ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्’ मंत्र का 21 बार जप करें।
- क्षमा प्रार्थना: श्रद्धापूर्वक माता की आरती उतारें और अंत में भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1: माँ तारा की आरती (Maa Tara Devi Aarti) करने से क्या लाभ होता है?
माँ तारा की आरती करने से व्यक्ति को गंभीर रोगों, कर्ज और अकाल मृत्यु के भय से तुरंत मुक्ति मिलती है। उग्रतारा के रूप में माता अपने भक्तों के जीवन में आने वाली हर शत्रु बाधा को शांत करके स्थिर सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं।
प्रश्न 2: माँ तारा का सबसे शक्तिशाली बीज मंत्र क्या है?
माँ तारा को प्रसन्न करने का सबसे सिद्ध बीज मंत्र “ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्” है। इस मंत्र का नियमित जाप करने के बाद माता की आरती उतारने से अद्भुत वाक्-सिद्धि प्राप्त होती है।
प्रश्न 3: क्या गृहस्थ लोग घर पर माँ तारा की आरती कर सकते हैं?
हाँ, गृहस्थ लोग पूरी तरह से सात्विक भाव से घर पर माँ तारा की पूजा और आरती कर सकते हैं। इसके लिए किसी जटिल तांत्रिक विधि की आवश्यकता नहीं होती, केवल श्रद्धापूर्वक घी का दीपक जलाकर आरती गाना ही पर्याप्त है।
प्रश्न 4: माँ तारा को कौन सा फूल और भोग सबसे प्रिय है?
माँ तारा को नीला कमल, अपराजिता के नीले फूल और लाल गुड़हल अत्यंत प्रिय हैं। भोग के रूप में माता को नारियल, पंचमेवा और दूध से बनी शुद्ध मिठाई या खीर अर्पित करना बहुत शुभ माना जाता है।
प्रश्न 5: माँ तारा की पूजा किस दिन करना विशेष फलदायी होता है?
माता की आरती प्रतिदिन की जा सकती है, लेकिन मंगलवार, शुक्रवार, अमावस्या तिथि और चैत्र शुक्ल नवमी (तारा जयंती) के दिन माँ तारा (Maa Tara) की विशेष आराधना करना सबसे अधिक फलदायी होता है।
प्रश्न 6: माँ तारा और माँ काली में क्या मुख्य अंतर है?
माँ काली प्रथम महाविद्या हैं जो काल (समय) और संहार की प्रतीक हैं, जबकि माँ तारा द्वितीय महाविद्या हैं जो भवसागर से तारने (उद्धार करने) और ज्ञान (नीलसरस्वती) की देवी मानी जाती हैं। माँ तारा के हाथों में कैंची और नीला कमल होता है।
प्रश्न 7: तारापीठ में माँ तारा की पूजा कैसे की जाती है?
पश्चिम बंगाल के तारापीठ में माँ तारा की वाममार्गी और दक्षिणमार्गी दोनों तरीकों से पूजा होती है। यहाँ माता को प्रात:काल स्नान कराकर सिंदूर लेपन किया जाता है और विशेष तांत्रिक अनुष्ठानों के साथ भोग अर्पित किया जाता है।


