॥ श्री बृहस्पति देव चालीसा: सटीक शब्दार्थ एवं भावार्थ सहित ॥
नवग्रहों में देवताओं के पूज्य गुरु और ज्ञान, बुद्धि, शिक्षा, विवाह तथा सुख-समृद्धि के अधिष्ठाता देव बृहस्पति देव (गुरु ग्रह) हैं। कुंडली में गुरु दोष शांति, वैवाहिक बाधा दूर करने और बुद्धि-विवेक की प्राप्ति के लिए गुरुवार के दिन इस चालीसा (Brihaspati Dev Chalisa) का पाठ अमोघ (जिसका प्रभाव पक्का हो) माना गया है। यहाँ चालीसा के प्रत्येक पद का कठिन शब्दों के अर्थ और संपूर्ण भावार्थ के साथ अध्ययन करें।
गुरु पद पंकज धोय चढ़ाय, सिर पर नयनन बीच।
शब्दार्थ: पद पंकज = (कमल के समान कोमल चरण) | धोय चढ़ाय = (धोकर चरणामृत लेना / स्पर्श करना) | नयनन बीच = (आंखों और माथे से लगाना)
ज्ञान दान मोहि दीजिए, हरि ॐ गुरु चरणन कीच॥
शब्दार्थ: ज्ञान दान = (सद्बुद्धि और विवेक का उपहार) | कीच = (चरणों की पावन धूल / रज)
भावार्थ (हे देवगुरु): हे गुरुदेव! मैं आपके कमल रूपी पावन चरणों का प्रक्षालन कर उसकी पावन धूलि को अपने शीश और नेत्रों पर धारण करता हूँ। हे प्रभु, मुझ अज्ञानी को ज्ञान और विवेक का दान दीजिए।
गणपति शारद सुर असुर, सबहिं नवावत माथ।
शब्दार्थ: सुर असुर = (देवता और दानव दोनों) | नवावत माथ = (मस्तक झुकाकर प्रणाम करते हैं)
देवगुरु तुमको नमन, सदा रहहु मम साथ॥
शब्दार्थ: मम साथ = (मेरे साथ / मेरे जीवन में सहायक बनकर)
भावार्थ (हे देवगुरु): भगवान श्री गणेश, माता सरस्वती तथा समस्त देव और दानव आपके ज्ञान के आगे मस्तक झुकाते हैं। हे देवगुरु बृहस्पति! मैं आपको बारंबार नमन करता हूँ, आप सदैव कृपा कर मेरे साथ रहें।
जय जय जय श्री गुरु देवा। करि कृपा मोहि दीजै सेवा॥
शब्दार्थ: करि कृपा = (दया करके) | दीजै सेवा = (मुझे अपनी भक्ति व सेवा का अवसर प्रदान करें)
देवाधिपति देव गुरु ज्ञानी। सकल लोक में महिमा जानी॥
शब्दार्थ: देवाधिपति = (देवताओं के पूज्य स्वामी) | सकल लोक = (समस्त लोकों व संसार में)
भावार्थ (हे देवगुरु): हे देवगुरु बृहस्पति! आपकी सदा जय हो। मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि कीजिए और मुझे अपनी पावन सेवा का अधिकार दीजिए। आप देवताओं के श्रेष्ठ गुरु और परम ज्ञानी हैं, आपकी महिमा संपूर्ण तीनों लोकों में विख्यात है।
पीताम्बर धरि अंग विराजे। कंचन मुकुट शीश पर साजे॥
शब्दार्थ: पीताम्बर = (पीले रंग के दिव्य वस्त्र) | कंचन मुकुट = (स्वर्ण / सोने का मुकुट) | साजे = (सुशोभित होना)
गले पुष्प माला छवि भारी। दर्शन करत मिटे संसारी॥
शब्दार्थ: छवि भारी = (अति मनमोहक व भव्य रूप) | मिटे संसारी = (संसार के समस्त कष्ट व ताप दूर होना)
भावार्थ (हे देवगुरु): आपके पावन अंगों पर पीले वस्त्र सुशोभित हैं और मस्तक पर स्वर्ण मुकुट शोभा पा रहा है। आपके गले में सुगंधित फूलों की भव्य माला विराजमान है, जिसके दर्शन मात्र से संसार के सारे दुख दूर हो जाते हैं।
चार भुजा अतिशय सुखकारी। अस्त्र शस्त्र कर में सब धारी॥
शब्दार्थ: अतिशय = (अत्यधिक / असीम) | कर = (हाथों में) | धारी = (धारण किए हुए)
दण्ड कमण्डल वर मुद्रा में। ध्यान धरत सब सुख पावैं॥
शब्दार्थ: दण्ड = (ज्ञान व न्याय का प्रतीक दंड) | कमण्डल = (जलपात्र) | वर मुद्रा = (वरदान और आशीर्वाद देने की मुद्रा)
भावार्थ (हे देवगुरु): आप चार भुजाओं वाले सुखदाता प्रभु हैं। आप अपने हाथों में ज्ञान का दंड, कमंडल और वरमुद्रा धारण किए हैं। आपका ध्यान लगाने से साधक को सभी सुखों की प्राप्ति होती है।
सुवर्ण वर्ण तन अति मनभावन। रूप अनुपम पावन पावन॥
शब्दार्थ: सुवर्ण वर्ण = (सोने के समान पीला व चमकीला वर्ण) | मनभावन = (मन को आनंदित करने वाला)
ऋषि अंगिरा कुल अवतारा। जग के तारन काज संभारा॥
शब्दार्थ: ऋषि अंगिरा कुल = (महर्षि अंगिरा के पुत्र) | काज संभारा = (कल्याण का कार्य संभालना)
भावार्थ (हे देवगुरु): आपका शरीर स्वर्ण की भांति चमकता हुआ और मनमोहक है। आप महर्षि अंगिरा के तेजस्वी कुल में अवतरित हुए हैं और आपने संपूर्ण जगत के उद्धार व धर्म रक्षा का भार संभाला हुआ है।
देव सभा में आदर पावैं। इंद्र आदि सब शीश नवावैं॥
शब्दार्थ: इंद्र आदि = (स्वर्ग के राजा इंद्र और सभी देवतागण) | शीश नवावैं = (सिर झुकाकर आदर देना)
वेद पुरानन के तुम ज्ञाता। बुद्धि विवेक के भाग्य विधाता॥
शब्दार्थ: वेद पुरानन = (समस्त वेद और पुराण) | भाग्य विधाता = (ज्ञान और सौभाग्य प्रदान करने वाले)
भावार्थ (हे देवगुरु): देवराज इंद्र सहित सभी देवता आपकी सभा में हाथ जोड़कर शीश झुकाते हैं। आप समस्त वेदों और पुराणों के परम ज्ञाता हैं तथा मनुष्यों को बुद्धि और विवेक देकर उनका भाग्य संवारते हैं।
गुरु ग्रह जब अनुकूल विचरते। निर्धन जन को राजा करते॥
शब्दार्थ: अनुकूल विचरते = (कुंडली में शुभ स्थिति में गोचर करना) | निर्धन जन = (दरिद्र / गरीब व्यक्ति)
विद्या बुद्धि मान यश पावे। जो नित गुरु के ध्यान लगावे॥
शब्दार्थ: मान यश = (समाज में प्रतिष्ठा और कीर्ति) | नित = (प्रतिदिन)
भावार्थ (हे देवगुरु): जब आपकी कृपा दृष्टि कुंडली में शुभ होती है, तो निर्धन व्यक्ति भी राजा के समान ऐश्वर्यशाली बन जाता है। जो साधक आपका नित्य ध्यान करता है, उसे उच्च शिक्षा, विवेक, सम्मान और यश प्राप्त होता है।
गुरु की वक्र दृष्टि जब होई। सकल पदारथ खोवे सोई॥
शब्दार्थ: वक्र दृष्टि = (अशुभ या प्रतिकूल दृष्टि / गुरु दोष) | सकल पदारथ = (समस्त धन-संपत्ति व सुख साधन)
रोग दोष अरु कष्ट सतावे। गुरु कृपा बिन पार न पावे॥
शब्दार्थ: अरु = (और) | पार न पावे = (कष्टों से छुटकारा न मिलना)
भावार्थ (हे देवगुरु): जब कुंडली में गुरु की स्थिति अशुभ होती है, तो मनुष्य अपनी संचित संपत्ति और प्रतिष्ठा खोने लगता है। उसे रोग और संकट घेर लेते हैं; आपकी कृपा के बिना इन कष्टों से मुक्ति नहीं मिल सकती।
पीत वस्त्र पीताम्बर भावे। चना दाल चन्दन मन लावे॥
शब्दार्थ: पीत वस्त्र = (पीले वस्त्र) | भावे = (प्रिय लगना) | मन लावे = (प्रसन्नता प्रदान करना)
केसर युक्त मिठाई पावैं। श्रद्धा पूर्वक भोग लगावैं॥
शब्दार्थ: केसर युक्त = (केसर मिले पीले मिष्ठान जैसे लड्डू या पेड़े)
भावार्थ (हे देवगुरु): आपको पीले वस्त्र, चने की दाल और पीला चंदन अत्यंत प्रिय हैं। जब भक्तजन श्रद्धा भाव से आपको केसर युक्त पीली मिठाइयों और फलों का भोग लगाते हैं, तो आप तत्काल प्रसन्न हो जाते हैं।
पुखराज रत्न अति प्यारा। स्वर्ण धातु पर तेज उज्यारा॥
शब्दार्थ: पुखराज = (येलो सफायर / गुरु का प्रिय रत्न) | स्वर्ण धातु = (सोना) | तेज उज्यारा = (दिव्य चमक)
ईशान दिशा के तुम हो स्वामी। घट-घट के प्रभु अंतरयामी॥
शब्दार्थ: ईशान दिशा = (उत्तर-पूर्व कोण / देवताओं की दिशा) | अंतरयामी = (हृदय की बात जानने वाले)
भावार्थ (हे देवगुरु): आपको पीला पुखराज रत्न और स्वर्ण धातु अति प्रिय हैं। आप वास्तु शास्त्र के अनुसार सबसे पवित्र ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) के अधिपति हैं और प्रत्येक प्राणी के मन की बात जानने वाले अंतर्यामी हैं।
गुरुवार व्रत जो जन करही। संकट ताके सब परिहरही॥
शब्दार्थ: परिहरही = (नष्ट होना / दूर भाग जाना)
कथा श्रवण कर दीप जलावैं। मनवांछित फल निश्चय पावैं॥
शब्दार्थ: कथा श्रवण = (बृहस्पतिवार की व्रत कथा सुनना) | निश्चय पावैं = (निश्चित रूप से प्राप्त करना)
भावार्थ (हे देवगुरु): जो साधक श्रद्धा से गुरुवार का व्रत रखता है, उसके जीवन के समस्त संकट कट जाते हैं। जो आपकी व्रत कथा सुनकर घी का दीपक जलाते हैं, वे अपनी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण कर लेते हैं।
पुत्र हीन को सुत दे स्वामी। निर्धन को धन अंतरयामी॥
शब्दार्थ: सुत = (संतान / पुत्र)
विवाह बाधा सब कट जाई। जो गुरु शरण में शीश नवाई॥
शब्दार्थ: विवाह बाधा = (शीघ्र विवाह में आने वाली अड़चनें)
भावार्थ (हे देवगुरु): आप संतानहीन को उत्तम संतान का सुख देते हैं और दरिद्र को धन-धान्य से भर देते हैं। जो भी आपकी शरण में आता है, उसके विवाह में आने वाली समस्त रुकावटें समाप्त हो जाती हैं।
चालीसा जो नित्य सुनावे। ताहि न कबहूं दुख सतावे॥
शब्दार्थ: ताहि = (उसे / उस साधक को) | कबहूं = (कभी भी)
प्रेम सहित जो ध्यान लगावे। सो जन भवसागर तर जावे॥
शब्दार्थ: भवसागर तर जावे = (सांसारिक कष्टों से पार होकर सद्गति पाना)
भावार्थ (हे देवगुरु): जो मनुष्य नित्य इस बृहस्पति चालीसा का पाठ करता है या सुनता है, उसे कभी कोई दुःख नहीं सताता। सच्चे प्रेम से आपका ध्यान धरने वाला व्यक्ति इस संसार रूपी सागर से सहज ही पार हो जाता है।
बृहस्पति देव दयाल प्रभु, हरहु सकल संताप।
शब्दार्थ: दयाल = (कृपालु) | संताप = (मानसिक, शारीरिक व आर्थिक कष्ट)
ज्ञान बुद्धि बल दीजिए, मेटहु तीनहुं ताप॥
शब्दार्थ: तीनहुं ताप = (दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट)
भावार्थ (हे देवगुरु): हे परम दयालु बृहस्पति देव! आप मेरे सभी कष्टों का हरण कीजिए। मुझे उत्तम ज्ञान, सद्बुद्धि और आत्मबल प्रदान कीजिए तथा जीवन के तीनों प्रकार के संतापों को हमेशा के लिए समाप्त कर दीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्र. 1: देवगुरु बृहस्पति कौन हैं?
उ: देवगुरु बृहस्पति महर्षि अंगिरा के पुत्र हैं और नवग्रहों में सबसे शुभ व सात्विक ग्रह माने जाते हैं। वे स्वर्ग के समस्त देवताओं के आध्यात्मिक गुरु, पुरोहित और ज्ञान के मुख्य दाता हैं।
प्र. 2: बृहस्पति देव चालीसा का पाठ किस दिन और समय करना चाहिए?
उ: इस चालीसा का पाठ विशेष रूप से गुरुवार (बृहस्पतिवार) के दिन सूर्योदय के समय पीले वस्त्र धारण करके करना सबसे उत्तम माना जाता है। नित्य पाठ करने से भी गुरु ग्रह मजबूत होता है।
प्र. 3: कुंडली में गुरु दोष होने पर क्या लक्षण दिखाई देते हैं?
उ: जब कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर होता है, तो व्यक्ति को शिक्षा में बाधा, विवाह में अत्यधिक देरी, मान-सम्मान में कमी, आर्थिक तंगी और पेट या लिवर से संबंधित परेशानियां होने लगती हैं।
प्र. 4: बृहस्पति देव को प्रसन्न करने के लिए क्या भोग अर्पित करें?
उ: बृहस्पति देव को पीले फल (केला), चने की दाल, गुड़, केसर युक्त बेसन के लड्डू या पेड़े का भोग लगाना चाहिए। ध्यान रहे कि गुरुवार के व्रत में स्वयं केले का सेवन नहीं किया जाता।
प्र. 5: गुरुवार के दिन केले के पेड़ की पूजा क्यों की जाती है?
उ: शास्त्रों के अनुसार केले के वृक्ष में साक्षात भगवान श्री हरि विष्णु और देवगुरु बृहस्पति का वास माना गया है। गुरुवार को केले की जड़ में जल और चने की दाल अर्पित करने से गुरु दोष शांत होता है।
प्र. 6: शीघ्र विवाह के लिए बृहस्पति चालीसा कैसे फलदायी है?
उ: ज्योतिष शास्त्र में गुरु ग्रह को विवाह और वैवाहिक सुख का कारक माना गया है। नियमित 11 या 21 गुरुवार तक व्रत रखकर चालीसा पाठ करने से विवाह मार्ग की समस्त रुकावटें समाप्त हो जाती हैं।
प्र। 7: श्री बृहस्पति देव चालीसा के रचयिता कौन हैं और इसका पौराणिक आधार क्या है?
उ: पारंपरिक देवगुरु बृहस्पति चालीसा के किसी एक व्यक्ति विशेष रचयिता का नाम शास्त्रों में दर्ज नहीं है। यह मध्यकाल के सनातन साधु-संतों द्वारा रचित लोक-परंपरा की रचना है। इसका मूल आधार ऋग्वेद और स्कंद पुराण में वर्णित महर्षि अंगिरा के पुत्र देवगुरु बृहस्पति के सूक्त और स्तुतियां हैं, जिन्हें गीताप्रेस गोरखपुर व प्रामाणिक नवग्रह संग्रह पुस्तकों में संकलित किया गया है।
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निष्कर्ष
श्री बृहस्पति देव चालीसा केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि जीवन में ज्ञान, सकारात्मक ऊर्जा और आत्म-विश्वास बढ़ाने का एक दिव्य माध्यम है। जब साधक प्रत्येक पंक्ति का वास्तविक अर्थ समझकर देवगुरु की आराधना करता है, तो उसके भीतर का अज्ञान समाप्त होता है और निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि होती है। यदि आपकी कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर है या जीवन में रुकावटें आ रही हैं, तो गुरुवार के दिन पूर्ण श्रद्धा से इस चालीसा का पाठ अवश्य करें।
✨ ॐ बृं बृहस्पतये नमः ✨
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस लेख में दी गई जानकारी ज्योतिषीय मान्यताओं, पारंपरिक ग्रंथों और धार्मिक नियमों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल श्रद्धालुओं को धार्मिक ज्ञान और चौपाइयों के अर्थ से अवगत कराना है।
